महिला दिवस पर पढ़िए वर्जनाओं को तोड़कर सफलता की नई इबारत लिखने वाली 64 साल की पद्मश्री बसंती बिष्ट की कहानी...
Women's Day: 40 साल की उम्र में मिला मंच, फिर लिखी सफलता की ऐसी इबारत कि दुनिया में हो गया नाम
बसंती बिष्ट का जन्म उत्तराखंड के एक सीमांत गांव ल्वाणी में हुआ। यह गांव नंदा देवी राजजात यात्रा के मार्ग पर स्थित है। नंदा देवी को क्षेत्र के लोग अपनी बेटी की तरह पूजते हैंए इसलिए यहां वर्षों से नंदा देवी के जागर गायन की परंपरा विद्यमान है। जागर गायन को मूलत: पुरुषों का कार्य माना जाता था। इसलिए बचपन में जब बसंती ने जागर गाने की अपनी इच्छा जाहिर की तो उनके खुद के परिवार ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी।
बसंती का मन बचपन से गायन में रमता था लेकिन सामाजिक वर्जनाओं की बेड़ियों के चलते के चलते उनकी यह हसरत पूरी नहीं हो सकी। विवाह के बाद उनके पति रणजीत सिंह ने उन्हें प्रोत्साहित किया लेकिन समाज बार.बार बसंती की राह में रोड़ा बनकर खड़ा होता रहा।
40 वर्ष की उम्र में पहली बार बसंती को मंच पर चढ़ने का मौका मिला। उस दौरान राज्य आंदोलन चरम पर था। बसंती ने राजधानी के परेड मैदान भर में गढ़वाल सभा के कार्यक्त्रस्म के जरिए मंच पर अपना सफर शुरू किया और उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
देश और दुनिया के अलग.अलग हिस्सों में महिला सशक्तिकरण का संदेश देते हुए बसंती ने सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ा। उन्होंने समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए हर मोर्चे पर लड़ाई लड़ी। जागरों के माध्यम से उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके विकास का मुद्दा उठाया।