‘ऐती मार पयी कुरलांदे, तैं की दर्द न आया’ यह सिर्फ एक वाक्य नहीं है बल्कि भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान भीषण हिंसा का शिकार हुए बुजुर्गों के दिल की पीड़ा है। विभाजन के दंश की कहानी सुनाते हुए उत्तरांचल पंजाबी महासभा के प्रदेश अध्यक्ष और पंचनग स्मारक ट्रस्ट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजीव घई भावुक हो गए।
भारत-पाक बंटवारा: 12 लाख हिंदुओं का कत्ल, माता-पिता ने घोंटा कलेजे के टुकड़ों का गला, पढ़ें-विभाजन की दास्तां
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घई बताते हैं कि देश बंटवारे की भयानक त्रासदी को बुजुर्गों के त्याग को युगों-युगों तक भुलाया नहीं जा सकता है। उनकी कुर्बानी, दुख-दर्द, क्रूर आतताइयों के अत्याचार की कहानी आज भी जहन में ताजा है। उस दौर में इतनी बड़ी संख्या में लोग मरे थे कि कई को अंतिम संस्कार तक नसीब नहीं हुआ। लाशों को गिद्ध नोंच कर खा गए। नन्हें बच्चों को आतताइयों ने भाले की नोक पर टांग कर हत्या कर दी। गुप्तांगों को गोद डाला गया, स्तन काटने जैसी वीभत्स और नारकीय यातनाएं हमारे बुजुर्गों को दी गईं।
उन्होंने कहा कि अगर हमारे पूर्वज खुदगर्ज होते तो कलमा पढ़ लेते लेकिन उन्होंने हिंदू धर्म और हिंदुस्तान के लिए अपनी कुर्बानी दे दी। प्राण न्योछावर कर दिए लेकिन कलमा नहीं पढ़ा। इसी को लेकर लगभग 12 लाख लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई। पाकिस्तान से आने वालों को उस दौरान शरणार्थी कहा गया। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में सबसे बड़ा शरणार्थी कैंप लगाया गया था। जो लोग भारत आने पर शरणार्थी कैंपों में रह रहे थे वह अपने क्षेत्र के संपन्न लोगों में रह चुके थे।
उस दौर में कोई अपने घर की चाबी पड़ोसी को देकर आया था और कोई अपने नौकर को, सोचा था कि कुछ दिन तक ऐसा चलेगा। इसके बाद वह दोबारा से पाकिस्तान वापस चले जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हो सका। एक बार आए लोग दोबारा जाने की स्थिति में कभी नहीं आ सके। अधिकांश शरणार्थी सिर्फ तीन कपड़ों में भारत आए थे। रावल पिंडी, मुल्तान, करांची और पंजाब में हुई थीं सर्वाधिक हत्याएं काशीपुर। राजीव घई बताते हैं कि उस दौर में आतताइयों ने रावल पिंडी, मुल्तान, करांची, लाहौर और अविभाजित पंजाब को अपना अड्डा बना लिया था। सबसे ज्यादा हत्याएं इन्हीं शहरों में हुईं। आतताइयों की भीड़ के हत्थे जो भी चढ़ा उसे काट डाला गया।
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घई बताते हैं कि हमारे समाज की शुरू से मांग है कि विभाजन के दौर में मारे गए लोगों को शहीद का दर्जा दिया जाए। क्योंकि यह लोग दिल से भारतीय थे। भारतीय रहना चाहते थे और इसी की सजा उन्हें मिली। अगर वह कलमा पढ़ लेते तो शायद उनके साथ ऐसी ज्यादती नहीं होती। उन्होंने कहा कि उस दौर की केंद्र सरकार ने पाकिस्तान के आतताइयों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। कई दौर की जांच हुई लेकिन उसका नतीजा कुछ भी नहीं निकला। भारत-पाकिस्तान के विभाजन के दौरान मारे गए 12 लाख लोगों के साथ अब जाकर न्याय हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने की घोषणा की है। इससे समाज के लोगों में खुशी है।