वर्ष 1915 के कुंभ में हरिद्वार आए महात्मा गांधी यह देखकर आश्चर्य चकित रह गए कि आवागमन के बहुत कम साधनों के बावजूद 17 लाख श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचे। बापू ने आत्मकथा में लिखा है कि वह उस समय धर्म-कर्म पर विश्वास नहीं करते थे। अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले के बुलावे पर वह भारत लौटे थे। गोखले ने उन्हें हरिद्वार जाकर स्वामी श्रद्धानंद से मिलने का निर्देश दिया था। श्रद्धानंद उस समय गंगा पार कांगड़ी में गुरुकुल स्थापित कर अंग्रेजों के खिलाफ शिक्षा क्रांति का बिगुल बजा रहे थे। आत्मकथा में बापू ने लिखा है कि भले वे स्वयं धर्मकर्म में विश्वास नहीं रखते थे, लेकिन कुंभ का पुण्य लेने आए 17 लाख श्रद्धालुओं की आस्था गलत नहीं हो सकती। बहुत से कुंभ स्नानार्थी ऊंटों, घोड़ों और बैलगाड़ियों पर सवार होकर आए थे। तब आवागमन का एकमात्र साधन रेलगाड़ियां थीं। वह भी काफी कम संख्या में चलती थीं। बापू ने लिखा कि तीर्थ और गंगा के प्रति लोगों की आस्था अद्भुत है। बापू ने इसी आस्था को स्वाधीनता के प्रति आस्था बनाने का संकल्प गंगा तट पर लिया था। उन्होंने स्वयं भी शराब, तंबाकू और हिंसा से आजीवन दूर रहने का संकल्प लिया। हरिद्वार के कुंभ से ही बापू को आजीवन अहिंसा की प्रेरणा मिली। देश में व्याप्त गरीबी और लंबी गुलामी के बावजूद मूल्यों के प्रति समर्पित रहने की जिजीविषा का दर्शन बापू को हरिद्वार कुंभ में हुआ। उन्होंने अति समृद्ध रहे भारत को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों को आत्मबल के आधार पर भगा देने की प्रेरणा गंगाजल से ली। कुंभ की भीड़ ने ही महात्मा को एक स्थान पर लघु भारत का दर्शन करा दिया था।
हरिद्वार कुंभ 2021ः महात्मा गांधी ने देखे थे कुंभ में आए 17 लाख श्रद्धालु, आत्मकथा में किया जिक्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हरिद्वार
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Fri, 05 Mar 2021 01:09 PM IST
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