आज भले ही बैरागी संतों अखाड़े उत्तर-पश्चिमी भारत में फैले हों, लेकिन वैराग्य चिंतन की अमृतधारा तो दक्षिण से उत्तर की ओर फैली। विष्णु के प्रमुख अवतारों की भूमि होने के बावजूद उत्तर में शैव और दक्षिण में वैष्णव भक्ति का फैलाव हुआ। दक्षिण के आलावर संतों ने खड़ताल हाथ में लेकर वैष्णवजन को जोड़ा तो दक्षिण के ही रामानुजाचार्य ने उत्तर भारत में 325 साल के भक्तिकाल की नींव रखी। आश्चर्य यह है कि तीन शताब्दियों के भक्ति आंदोलन में मुस्लिम फकीरों का भी बड़ा योगदान रहा। रामानंदाचार्य ने राम और वल्लभाचार्य ने कृष्णभक्ति की दुदुंभी बजाई। कुंभ मेले के मुख्य घटक बैरागी अखाड़े वस्तुत: जिस काल में उत्पन्न हुए, उसे गियर्सन ने स्वर्ण काल, आचार्य श्यामसुंदर दास ने स्वर्ण युग, रामचंद्र शुक्ल ने भक्ति काल और हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लोक जागरण कहा। इसी काल में सगुण भक्ति रामाश्रयी, कृष्णाश्रयी, ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी विचारधाराओं के रूप में अखंड भारत में सामने आई। माधवाचार्य, निंबकाचार्य, ज्ञानेश्वर, जयदेव, नानक, कबीर, तुलसी, सूर, मीरा, हरिदास, तुकाराम, समर्थ रामदास, रामकृष्ण परमहंस, त्यागराज, प्रभुपाद आदि के माध्यम से वैष्णव संप्रदाय को अपनी तीनों अणियों के माध्यम से घर-घर, गांव-गांव फैला दिया। कुंभनगरी के बैरागी द्वीप पर भक्तिकाल की देन बैरागी संस्कृति दूर-दूर तक फैली हुई है।
हरिद्वार कुंभ 2021 : 300 वर्ष के भक्तिकाल में दक्षिण से फैली बैरागी संतई की सरसधार
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, हरिद्वार
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Fri, 23 Apr 2021 01:59 PM IST
सार
आश्चर्य यह है कि तीन शताब्दियों के भक्ति आंदोलन में मुस्लिम फकीरों का भी बड़ा योगदान रहा। रामानंदाचार्य ने राम और वल्लभाचार्य ने कृष्णभक्ति की दुदुंभी बजाई।
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