उत्तराखंड में कोरोना महामारी के पैर फैलाते ही मौत का आंकड़ा बढ़ गया है। ऐसे में अपनों के बीच दूरियां बढ़ रही है। स्थिति ये हैं कि किसी खास की मौत पर भी लोग शोक जताने नहीं जा रहे हैं। दाह-संस्कार में गिने-चुने लोग रिश्तेदार ही पहुंच रहे हैं। ऐसे में अंतिम संस्कार की मात्र औपचारिकता निभाई जा रही है।
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संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए यह जरूरी भी है। इन परिस्थितियों में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो सेवाभाव से मुक्तिधाम (श्मशान गृह) के सफर के सारथी की भूमिका निभा रहे हैं। यह लोग कोरोना पॉजिटिव मृतकों का अंतिम संस्कार कराने में आगे आ रहे हैं।
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वैश्विक महामारी कोरोना से खुद को बचाकर किसी संक्रमित व्यक्ति का दाह संस्कार कराना जोखिम भरा काम है। मगर इस काम में कनखल के कई लोग आगे आकर अपनी जिंदगी की परवाह न करते हुए मानवता की मिसाल पेश कर रहे हैं। कनखल के बंगाली अस्पताल के पास रहने वाले भूपेंद्र कुमार व्यापारी हैं, मगर कोरोना की इस घड़ी में हर किसी के साथ खड़े हुए नजर आ रहे हैं।
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हरिद्वार में कोरोना संक्रमित के शव को एंबुलेंस से उतारते लोग
- फोटो : अमर उजाला
कोरोना संक्रमितों के अंतिम संस्कार के लिए उन पर लगातार फोन आ रहे हैं। इधर फोन की घंटी बजती नहीं कि भूपेंद्र कुमार तुरंत श्मशान घाट पहुंचकर संक्रमितों का अंतिम संस्कार करा रहे हैं।
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हरिद्वार में कोरोना संक्रमितों का दाह संस्कार कर रहे लोग
- फोटो : अमर उजाला
वहीं पहाड़ी बाजार के रहने वाले अजय राजपूत बिजली का काम करते हैं। वह भी एक फोन पर तुरंत ही संक्रमितों का अंतिम संस्कार कराने के लिए पहुंच रहे हैं। इसके साथ ही कुम्हारगढ़ा कनखल के रहने वाले देवेंद्र प्रजापति ट्रेवल्स कारोबारी हैं।
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हरिद्वार में अंतिम संस्कार
- फोटो : अमर उजाला
वह भी कोरोना संक्रमितों के अंतिम संस्कार में पूरा फर्ज निभा रहे हैं। जहां परिजन उन्हें कंधा भी नहीं दे रहे हैं। वहीं यह लोग मानवता को अपना पहला धर्म मानकर अपना फर्ज निभाने में जुटे हुए हैं। इन लोगों का कहना है कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं है।
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हरिद्वार में अंतिम संस्कार
- फोटो : अमर उजाला
इन सभी मददगारों ने क्षेत्र के श्मशान घाट पर अपना नाम और नंबर लिखकर तख्ती लटका रखी है। इसपर लिखा हुआ है कि यदि किसी को अंतिम संस्कार संबंधित किसी प्रकार की मदद की जरूरत है तो वह नंबर पर फोन कर संपर्क कर सकता है।