देवस्थानम बोर्ड: धर्म की सियासत में सीएम धामी का बड़ा दांव, विपक्ष से चुनावी मुद्दा छीनकर एक तीर से साधे दो निशाने

अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Wed, 01 Dec 2021 12:14 PM IST
सीएम पुष्कर सिंह धामी
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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड को भंग करने का एलान करके धर्म की सियासत में बड़ा दांव चला है। तय वक्त पर वादा निभाकर उन्होंने रूठे तीर्थ पुरोहितों को न सिर्फ मनाने का काम किया, बल्कि कांग्रेस के हाथों से मुद्दा छीनकर एक तीर से दो निशाने साधे।

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सत्ता की बागडोर हाथों में आने के दिन से ही धामी पर देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड को भंग करने का दबाव था। अधिनियम के विरोध में आंदोलित तीर्थ पुरोहित, पंडा समाज उनके समक्ष पहुंचे थे। उनसे पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने भी वादा किया था, लेकिन वादा पूरा करने से पहले उनकी सत्ता से विदाई हो गई। 

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विधानसभा चुनाव तीर्थ पुरोहितों के लिए सरकार पर दबाव बनाने का बड़ा हथियार बना। मुख्यमंत्री ने पूर्व राज्यसभा सांसद  मनोहर कांत ध्यानी की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति गठित की। समिति चारों धामों के  पंडा पुरोहित समाज के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया। समिति को अंतरिम और अंतिम रिपोर्ट देने में तीन महीने लग गए।
अनिल बलूनी
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इस बीच पंडा पुरोहित समाज के लोग और अधिक आक्रामक हो गए। उन्होंने दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी से मसला उठाया। बलूनी ने उन्हें कानून वापस लेने के संकेत दिए। केदारनाथ में पीएम मोदी के आगमन से पहले तीर्थ पुरोहितों ने पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को मंदिर में दर्शन नहीं करने दिया। नाराज पुरोहितों को मनाने के लिए धामी ने कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल को भेजा। 
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विरोध प्रदर्शन करते तीर्थ पुरोहित
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अगले दिन मुख्यमंत्री दो कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत और सुबोध उनियाल को लेकर केदारनाथ पहुंचे और नाराज तीर्थ पुरोहितों से यह वादा करके लौटे कि सरकार 30 नवंबर तक देवस्थानम बोर्ड भंग करने का फैसला ले लेगी। तब सरकार ने 29 व 30 नवंबर को विधानसभा सत्र बुलाया था। लेकिन तीर्थ पुरोहितों ने अपना आंदोलन जारी रखा। देहरादून तक पहुंचे और भाजपा और संघ के स्तर पर भी दबाव बनाने का प्रयास किया।  
सुब्रह्मण्यम स्वामी
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सूत्रों के मुताबिक, हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा के लिए चुनाव से ठीक पहले पंडा, पुरोहित और साधु संत समाज की नाराजगी चिंता की वजह मानी जा रही थी। सियासी जानकारों के मुताबिक, उत्तरकाशी, चमोली जिले की आठ विधानसभा सीटों पर तीर्थ पुरोहितों के आंदोलन का प्रभाव था। उधर, पार्टी के वरिष्ठ नेता राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी देवस्थानम प्रबंधन  अधिनियम के विरोध में मोर्चा खोल दिया था। 
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पीएम मोदी को खून से पत्र लिखते तीर्थ पुरोहित
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उन्होंने न्यायालय में एक्ट को चुनौती तक दे डाली थी। इधर, पार्टी की ब्राह्मण लॉबी भी केंद्रीय व प्रांतीय नेतृत्व को यह समझाने में जुट गई कि संख्या बल में तीर्थ पुरोहित बेशक सीधे तौर पर चुनाव में नुकसान का दमखम नहीं रखते हों, लेकिन उनके प्रति साधु संत समाज और एक खास वर्ग में सहानुभूति का वातावरण बन गया तो इसका पार्टी सियासी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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