उत्तराखंड के चमोली जनपद के केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग के जंगल में एक ऐसा दुर्लभ प्रजाति का पौधा मिला है, जो मच्छर और कीड़े खा जाता है। इस अत्यधिक दुर्लभ पौधे का नाम अट्रीकुलेरिया फर्सेलाटा है। इस पौधे की खोज केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग के शोध विंग के एसीएफ हरीश नेगी और शोधकर्ता मनोज सिंह ने की है।
शोध कर्ताओं ने बताया कि यह पौधा कांचुलाखर्क के समीप मिला है। इस मासांहारी पौधे को स्थानीय और सामान्य भाषा में ब्लैडरवॉर्ट्स कहते हैं। यह पौधा मच्छरों और कीड़े मकोड़ों को खा जाता है।अट्रीकुलेरिया फर्सेलाटा एक बेहद जटिल पौधा है। इसकी शारीरिक सरंचना अन्य पौधों से अलग होती है। ये प्रोटोजोआ (एक कोशिकीय जीव), कीड़े, लार्वा, मच्छर को खा जाता है।
यह वैक्यूम क्रिएट करके निगेटिव प्रेशर पैदा कर देता है। जिससे कीड़े इसके अंदर फंसकर खत्म हो जाते हैं। यह गीली मिट्टी और साफ पानी के आसपास पनपता है। उत्तराखंड वन अनुसंधान की इस मेहनत को 106 साल पुरानी जापानी शोध पत्रिका जरनल ऑफ जापानीज बॉटनी में जगह मिली है।
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उत्तराखंड में मिला मांसाहारी पौधा
- फोटो : अमर उजाला
अट्रीकुलेरिया फर्सेलाटा को अखिरी बार 1986 में सिक्किम व दार्जिलिंग में देखा गया था, उसके बाद यह कहीं देखा नहीं गया। आमतौर पर अट्रीकुलेरिया फर्सेलाटा ऐसी जगह पर पनपता है, जहां पर मिट्टी की उर्वरक क्षमता कम होती है।
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उत्तराखंड में मिला मांसाहारी पौधा
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इस पौधे के न दिखने की सबसे बढ़ी वजह जंगलों में मानवीय हस्तक्षेप अधिक हो रहा है। साथ ही पर्यटन का विस्तार हो रहा है। एसीएफ हरीश नेगी बताते हैं कि अट्रीकुलेरिया फर्सेलाटा के मेडिकल के क्षेत्र में भी अच्छी डिमांड है।
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उत्तराखंड में मिला मांसाहारी पौधा
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केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग जैव विविधता से भरा हुआ है। प्रभाग के जंगलों में दुर्लभ वन्य प्राणियों के साथ ही बहुमूल्य वनस्पतियां मौजूद हैं। वर्ष 2019 में सप्तकुंड ट्रैक पर दुर्लभ प्रजाति का फूल लिपरिस पैगमई खिला था। देश में इस फूल के दीदार 124 साल बाद हुए थे।
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वर्ष 2020 में गोपेश्वर के समीप मंडल घाटी में वन प्रभाग की शोध शाखा औैर भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के विज्ञानियों के शोध दल ने आर्किड पौधे की एक दुर्लभ प्रजाति खोजी है, जो भारत में पहली बार देखी गई है। आर्किड की इस नई प्रजाति की पहचान सिफलंथेरा इरेक्टा के रूप में की गई।