बाराकोट के मिर्तोली गांव के त्रिलोक सिंह (30, पुत्र कल्याण सिंह) अपनी जीप छोड़ कर कभी दूसरे के वाहन को ड्राइव नहीं करते थे। हालात ऐसे बने कि च्यूरानी (बसान मोड़) में दुर्घटनाग्रस्त हुई पिकअप जीप का स्टीयरिंग उनके हाथ में आ गया। इस जीप को न उन्होंने चलाना था और नहीं वह जीप उनकी थी। इस जीप के पीछे चल रही मार्शल जीप के वे स्वामी थे और अक्सर इसी मार्शल जीप को वे चलाते भी थे। रविवार को हादसे में मारे गए 6 लोगों का सोमवार को बाराकोट पीएससी में पोस्टमार्टम हुआ। सोमवार को बाराकोट बाजार बंद रहा। दुर्घटना में मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार का खर्च बाराकोट की लड़िधुरा मंदिर समिति उठाएगी। हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल में पहुंचकर वित्त मंत्री प्रकाश पंत ने दुर्घटना के घायलों का हाल जाना।
उत्तराखंड: रविवार को हुए हादसे का ये बड़ा सच आया सामने, आठ लोगों की हुई थी दर्दनाक मौत
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मिर्तोली के ग्राम प्रधान लक्ष्मी दत्त जोशी के मुताबिक यह पिकअप बाराकोट के दीनू की है। पिकअप का ड्राइवर रविवार को उपलब्ध नहीं था। मार्शल जीप के स्वामी त्रिलोक सिंह ने दीनू से कहा था कि पिकअप वह खुद ड्राइव कर लेगा। पिकअप को त्रिलोक सिंह चला रहे थे। वहीं कुछ लोग अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए मार्शल जीप से भी चल दिए। इस मार्शल जीप को जीप स्वामी त्रिलोक के बजाय एक ट्रक ड्राइवर लक्ष्मण चला रहा था। ग्राम प्रधान बताते हैं कि त्रिलोक बेहद कुशल ड्राइवर थे। गांव के लोगों का कहना है कि त्रिलोक कभी अपने वाहन को छोड़ दूसरा वाहन नहीं चलाते थे। अब त्रिलोक की मौत से परिवार में मातम छाया है। उनके परिवार में माता-पिता के अलावा दो छोटे बेटे हैं। जबकि तीन भाई बाहर निजी क्षेत्र में नौकरी करते हैं।
महज पांच साल पूर्व तक रामेश्वर शमशान घाट जाने के लिए गांव के लोग पैदल रास्ते का इस्तेमाल करते थे। ग्राम प्रधान लक्ष्मी दत्त जोशी और अन्य ग्रामीणों के मुताबिक पांच साल पहले तक सिंगदा होते हुए जंगल के रास्ते पैदल जाकर रामेश्वर घाट पहुंचा जाता था। यहां से शमशान घाट भी महज दो किमी दूर था और खर्च भी नहीं होता था। खराब रास्तों और असुविधा से बचने के लिए अब सड़क मार्ग का उपयोग किया जा रहा है। प्रधान का कहना है कि उन्होंने पैदल रास्तों को ठीक भी कराया। इसके बावजूद अब लोग बाराकोट से खोलक होते हुए 25 किमी की दूरी तय कर रामेश्वर शमशान घाट पहुंचते हैं। इसके लिए गांव के लोग आपस में मिलकर जीप का खर्च वहन करते हैं।
जिंदादिल और हंसता मुस्कराता बाराकोट का मिर्तोली गांव रविवार को गमगीन हो गया। जीप हादसे के बाद हर आंख नम थी। महिलाओं से लेकर बच्चे और गांव के सयानों की आंखों में आंसू थे। रविवार रात को गांव में कहीं भी चूल्हा नहीं जला। हर घर के लोग आठ जिंदगियों के अकाल मौत में जाने से दुखी थे। हादसे की भनक लगते ही गांव की काफी महिलाएं अनहोने की आशंका में गांव छोड़कर घटना स्थल पर पहुंच गई।
च्यूरानी में हुई दुर्घटना ने एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी। डाक्टरों की कमी को किसी तरह से दूर कर लिया गया था लेकिन उपकरण और अन्य व्यवस्थाएं नहीं हो पाईं। यहां अभी तक ट्रॉमा सेंटर स्थापित नहीं हो पाया और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के हाल यह हैं कि यहां एक्सरे तक की सुविधा नहीं है। हादसे के घायलों को जिस लोहाघाट अस्पताल लाया गया, वहां एक अस्थि रोग विशेषज्ञ तक नहीं है। सर्जन और निश्चेतक के पद लंबे समय से रिक्त हैं। अस्पताल में अभी डॉक्टरों के 11 पदों में से पांच रिक्त हैं।