एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाने के लिए स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने यहां बुना थ ताना-बाना
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अटल बिहारी वाजपेयी 2002 में होली के दौरान 28 से 31 मार्च तक नैनीताल में रहे थे। उनका प्रवास नितांत निजी और एकांतवास का था, जिस दौरान उन्होंने अधिकांश वक्त चिंतन मंथन में ही व्यतीत किया।
लेकिन, उसके तुरंत बाद का घटनाक्रम बताता है कि उस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के चिंतन ने देश की राजनीति को नया मोड़ दिया। 2002 में राष्ट्रपति के रूप में एपीजे अब्दुल कलाम के नाम का चयन और गुजरात में राजधर्म के उनके प्रख्यात उपदेश का तानाबाना उन्होंने नैनीताल में ही बुना।
वाजपेयी गुजरात के गोधरा कांड और उसके बाद के दंगों से बेहद व्यथित थे। उन्होंने इन दंगों से दुखी होकर ही उस वर्ष होली न मनाने और होली का अवकाश एकांत में बिताने का निर्णय लिया था। इसके लिए उन्होंने नैनीताल को चुना। लेकिन, हालात बताते हैं कि वे यहां आराम करने नहीं बल्कि इन परिस्थितियों पर चिंतन कर आगामी नीति तय करने भी आए थे।
यहां से जाते वक्त यहां लिखी गई कविता पर पत्रकारों ने सवाल किया तो वे संकेतों में कह गए थे कि मन में बहुत कुछ उमड़ रहा है, जल्द ही वर्षा होगी। उनके विचारों की यह बारिश तीन दिन बाद गुजरात में बरसी, जब उन्होंने खुलेआम कहा कि वे इन दंगों से शर्मिंदा हैं और सात से 11 अप्रैल की अपनी प्रस्तावित सिंगापुर-कंबोडिया की यात्रा में वहां के लोगों को क्या मुंह दिखाएंगे।
गुजरात में 27 फरवरी 2002 को गोधरा में हिंदू तीर्थयात्रियों से भरी ट्रेन की बोगी में उपद्रवियों ने आग लगा दी थी, जिसमें 58 तीर्थयात्री जिंदा जल गए थे।
28 फरवरी से गुजरात में भीषण दंगे हुए, जिनमें 1044 लोग मारे गए। हजारों लोगों को शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा। गुजरात में तब भाजपा सरकार थी और मोदी मुख्यमंत्री। इन दंगों को लेकर मोदी और भाजपा पर गंभीर आरोप लगे और भाजपा की छवि एंटी मुस्लिम की बनने लगी।
‘पागलपन का जवाब पागलपन नहीं हो सकता, इसे रोको’
नैनीताल से वापसी के तीसरे दिन वाजपेयी अहमदाबाद के शाह आलम शरणार्थी कैंप गए, जहां 9000 मुस्लिम शरणार्थी थे।
इन दंगों पर वाजपेयी ने सार्वजनिक रूप से शर्मिंदगी जताई और पीड़ितों को पूरी सुरक्षा और न्याय का भरोसा दिलाया। उस रोज दी गई उनकी राजधर्म की नसीहत और ‘पागलपन का जवाब पागलपन नहीं हो सकता, इसे रोको’ जैसे बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए और सराहे गए।
15 जुलाई 2002 को राष्ट्रपति का चुनाव भी होना था। भाजपा महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल पीसी अलेक्जेंडर को उम्मीदवार बनाने को तैयार थी। इसके पीछे सोच भविष्य में सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोकना था क्योंकि तब सोनिया प्रयाग में स्नान और कई बार तिरुपति के दर्शन कर तेजी से सॉफ्ट हिंदुत्व की छवि बना रहीं थीं।
किसी मुस्लिम को राष्ट्रपति बनाने की रणनीति बनाई
गुजरात के दंगों से भाजपा की एंटी मुस्लिम छवि से उबरने के लिए सभी धर्मों में समान रूप से लोकप्रिय और स्वीकार्य रहे वाजपेयी ने नैनीताल से लौटते ही अपने विश्वस्त प्रमोद महाजन और ब्रजेश मिश्र से सलाह मशविरा कर अलेक्जेंडर के बजाय किसी मुस्लिम को राष्ट्रपति बनाने की रणनीति बनाई।
प्रमोद महाजन ने एपीजे अब्दुल कलाम का नाम सुझाया था। वहीं, सरकार में भाजपा के सहयोगी टीडीपी सहित वाम दल, पूर्व पीएम चंद्रशेखर आदि इसके लिए तत्कालीन उपराष्ट्रपति कृष्णकांत को चाहते थे।
अत: उनकी काट के लिए एपीजे अब्दुल कलाम का नाम सुझाने का जिम्मा वाजपेयी ने मुलायम सिंह यादव को सौंपा। लेफ्ट पार्टियों ने स्वतंत्रता सेनानी लक्ष्मी सहगल को कलाम के खिलाफ प्रत्याशी बनाया। चुनाव जीतकर कलाम देश के 11वें राष्ट्रपति बने थे।