बिहार के समस्तीपुर जिले का छोटा सा कस्बा ताजपुर, जहां आज भी जिंदगी की रफ्तार चाय के कपों में मापी जाती है, अब भारतीय क्रिकेट के नक्शे पर उभरता हुआ नाम बन चुका है। कभी शांत और साधारण रहा यह इलाका अब एक नई पहचान से जाना जाता है- वैभव सूर्यवंशी का घर। पेड़ों से घिरी सड़कों, खेतों और छोटे-छोटे घरों के बीच पला-बढ़ा यह लड़का आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है। मंगलवार को जब वैभव ने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज जसप्रीत बुमराह के एक ओवर में दो छक्के लगाए तो सब हैरान रह गए। वैभव को हमेशा से स्पेशल टैलेंट कहा जाता रहा है, लेकिन मंगलवार को उन्होंने इसे साबित भी किया। इस आईपीएल में वैभव को लेकर जो क्रेज है, शायद ही वैसा क्रेज किसी और को खेलते देखने के लिए है।
2 of 11
पीएम मोदी के साथ वैभव और उनके पिता
- फोटो : ANI
पिता का अधूरा सपना, बेटे ने किया पूरा
वैभव सूर्यवंशी की कहानी उनके पिता संजीव सूर्यवंशी के बिना अधूरी है। संजीव खुद क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन उस दौर में बिहार को बीसीसीआई से मान्यता नहीं मिलने के कारण उनका सपना अधूरा रह गया। संजीव ने अपने संघर्ष के दिनों में मुंबई का रुख किया। वहां उन्होंने शिपिंग यार्ड में काम किया, पोर्ट पर मेहनत की और कभी-कभी नाइट क्लब में बाउंसर तक बने।
उनके एक करीबी राजेश झा ने क्रिकेट मंथली को बताया, 'वैभव के पिता को एक्टिंग का भी शौक था, लेकिन जिंदगी चलाने के लिए उन्हें कई तरह के काम करने पड़े।' करीब एक दशक तक संघर्ष करने के बाद संजीव वापस ताजपुर लौट आए और पारिवारिक ज्वेलरी की दुकान संभालने लगे, लेकिन क्रिकेट के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ।
3 of 11
पीएम मोदी के साथ वैभव और उनका परिवार
- फोटो : ANI
100 किलोमीटर साइकिल और जुनून की मिसाल
संजीव के क्रिकेट प्रेम का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह अपने किशोर दिनों में हर साल 100 किलोमीटर साइकिल चलाकर पटना जाते थे, सिर्फ एक टूर्नामेंट का फॉर्म लेने के लिए। यही जुनून उन्होंने अपने बेटे में भी उतारा।
4 of 11
वैभव सूर्यवंशी
- फोटो : Twitter
चार साल की उम्र में हाथ में थमा बल्ला
वैभव को उनके चौथे जन्मदिन पर पहली बार बैट दिया गया। तभी से उनके खेल में कुछ अलग नजर आने लगा था। 2018 के आसपास जब उनकी प्रतिभा खुलकर सामने आई, तो संजीव ने फिर से वही संघर्ष शुरू किया, लेकिन इस बार बेटे के लिए।
5 of 11
वैभव सूर्यवंशी
- फोटो : IANS
200 किलोमीटर का रोजाना सफर: पिता का त्याग
संजीव ने एक सेकंड-हैंड एसयूवी खरीदी और हर दूसरे दिन ताजपुर से पटना के बीच 200 किलोमीटर का सफर तय करना शुरू किया। पटना के संपतचक में स्थित जेन नेक्स्ट क्रिकेट अकादमी में वैभव को ट्रेनिंग दिलाई जाती थी, जहां कोच मनीष कुमार ओझा उन्हें ट्रेनिंग देते थे। यह सफर आसान नहीं था। तीन घंटे का एकतरफा रास्ता, सुबह चार बजे उठना और देर रात घर लौटना, यही दिनचर्या बन चुकी थी। कोच ओझा ने क्रिकेट मंथली को बताया, 'हर दिन सुबह चार बजे उठकर 100 किलोमीटर आना, ट्रेनिंग करना और फिर लौटना, यह आसान नहीं था। लेकिन वैभव और उनके पिता ने कभी हार नहीं मानी।'