नोटबंदी को एक साल हो गया, लेकिन न तो अर्थव्यवस्था पटरी पर आ सकी और न ही भ्रष्टाचार पर लगाम लगी। अब यहां क्लिक करके जानिए, इसके फायदे और नुकसान।
अनिल चड्ढा, चार्टर्ड एकाउंटेंट, चंडीगढ़ से बातचीत से लगता है कि एक साल बाद भी रियल इस्टेट, सर्विस सेक्टर, व्यापारी और उद्यमी नोटबंदी से जूझ रहे हैं। इसके होने से देश की अर्थव्यवस्था में कोई चामत्कारिक परिणाम नहीं दिखाई दिया। नोटबंदी प्लास्टिक मनी तो लाई पर एक सीमित से वर्ग में। रियल इस्टेट सेक्टर हो या फिर रिटेल सेक्टर और सर्विस सेक्टर सभी इसके प्रभावों से अब तक जूझ रहे हैं। एक वर्ष पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की।
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नोटबैन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
एकदम से बाजार में चलने वाले पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों पर रोक लग गई। इसका सीधा असर यह हुआ कि अर्थव्यवस्था में भूचाल आया, हड़कंप मचा और एक नया बाजार तैयार हो गया। यह तो त्वरित असर था। कालाधन हो या सफेद धन.. एक अरसे से अपने नोट को सिर्फ खरीददारी का माध्यम मानने वाले लोगों को एकदम से अपने इसी नोट का ख्याल आया।
नोटबंदी का फैसला एकदम ठीक माने तो उसके लिए सरकार को आगामी स्टेप के लिए पहले से इंतजाम करना चाहिए था? लेकिन हुआ क्या एक ओर आम जनता बैंकों में नोट जमा करवाने के लिए लाइन में लगी थी और दूसरी ओर कुछ कारपोरेट्स अपने नोट एक्सचेंज करवाने में लग गए। ऐसी खबरें भी सामने आईं। कोई भी स्टेप लेने के पहले यदि पहले से हम उसके विपरीत और दुष्प्रभावों को समझ लेते तो ज्यादा बेहतर होता।
नोटबंदी का सबसे ज्यादा प्रभाव हुआ रियल इस्टेट सेक्टर पर। नोटबंदी के पहले इस सेक्टर में कैश का फ्लो ज्यादा था। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदी के असर से यह सेक्टर पहले से ही जूझ रहा था। नतीजा यह हुआ कि नोटबंदी के बाद ट्राईसिटी के कई प्रोजेक्ट ठप पड़ गए। ऐसे सेक्टरों के लिए एक साल में रिकवरी संभव नहीं। औसतन पचास फीसदी प्रोजेक्ट पर नोटबंदी की गाज गिरी। यह तो था नोटबंदी से बिल्डरों पर हुआ असर।