लड़की होने के कारण इस बेटी ने लोगों के ताने सुनते-सुनते कुछ कर दिखाने की ठानी और छोटी उम्र में लेफ्टिनेंट बनकर विरोधियों को करारा जवाब दिया।
वाकई इस बेटी का जज्बा हैरान करने वाला है। लोग ताने मारते थे, कहते थे छोरियां घर की चार दिवारी में अच्छी लगती हैं। लेकिन मैं भी हार मानने वाली नहीं थी, मां-बाप ने आगे बढ़ने का हौंसला दिया और मैंने लेफ्टिनेंट बनकर जवाब दिया। कड़े संघर्ष की ये कहानी है, सॉर्ड ऑफ ऑनर जीतने वाली देश की तीसरी महिला लेफ्टिनेंट प्रीति चौधरी की, जिन्होंने छोटी उम्र में ही लेफ्टिनेंट बनकर मां-बाप, प्रदेश और देश का नाम रोशन कर दिया।
इस सफलता के बाद प्रीति ने अमर उजाला से खास बातचीत में कहा कि यह अचीवमेंट उनके लिए एक सपने जैसा है, जिसे वह शब्दों से बयां नहीं कर सकती हैं। बचपन से ही लेफ्टिनेंट बनने का सपना देख रही थीं, जो आज पूरा हुआ है। उन्होंने कहा कि वे उनके पिता भी आर्मी ऑफिसर हैं, उनकी यूनिफार्म को देखकर वह भी उनकी तरह आर्मी को ज्वाइन करनी चाहती थीं। पापा की वर्दी पहनकर कहती थी मैं भी फौजी बनूंगी और बन गई।
हरियाणा में पानीपत जिले के गांव बिंझौल गांव की रहने वाली 20 वर्षीय प्रीति चौधरी कहती हैं कि पिता से प्रेरणा लेकर ही मैंने पढ़ाई के साथ-साथ एनसीसी में समय दिया और इस मेहनत का फल तब मिला, जब ऑल इंडिया एनसीसी स्पेशल एंट्रेंस के तहत मेरा चयन हुआ। 2016 दिल्ली में गणतंत्र दिवस समारोह में हरियाणा की टुकड़ी में भी मैं शामिल हुईं और मुझे देश की बेस्ट 144 लड़कियों में मुझे ऑल इंडिया बेस्ट कैडेट चुना गया और प्रधानमंत्री से सम्मान मिला था।
प्रीति चौधरी बताती हैं कि जब मैं छोटी थी और बाहर जाती थी तो गांव में लोग ताने मारते थे। सुनने को मिलता था कि बेटियां तो घर में काम करने के लिए होती हैं। माता-पिता को भी लोग समझा कर जाते थे कि लड़की को ज्यादा बाहर मत भेजो। पारिवारिक स्थिति भी ज्यादा अच्छी नहीं थी। पिता आर्मी से बहुत कम छुट्टी ले पाते थे। ऐसे में मां ने हर कदम पर साथ दिया। सारे खर्च उठाए और बाहर भी भेजा।