सबको खुश रखने की कोशिश करता एक देश, यहां की फिजा में घुली है संगीत की मिठास
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दक्षिण कोरिया जो कार्यक्रम शुरू कर रहा है, वह फील-गुड प्रोग्राम जैसा नहीं है। सांस्कृतिक बदलावों को कानूनी जामा पहनाया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र और ओईसीडी (OECD), दोनों संगठन दुनिया भर में खुशहाली पर सालाना रिपोर्ट बनाते हैं। किसी देश की खुशहाली को मापने के लिए सामाजिक और आर्थिक पैमाने, जैसे प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद, जीवन प्रत्याशा, शिक्षा और भ्रष्टाचार देखे जाते हैं। इसमें एक और पैमाना जोड़ा गया है। यह है सब्जेक्टिव वेल-बीइंग (SWB), यानी लोग खुद को कितना सुखी समझते हैं। संपन्न होने का मतलब सुखी होना नहीं है। दक्षिण कोरियाई नागरिकों के पास बीएमडब्ल्यू कार से लेकर रिमोट कंट्रोल वाले टॉयलेट तक हैं, लेकिन संतुष्टि का स्तर ओईसीडी (OECD) देशों के औसत से बहुत नीचे है। राष्ट्रपति मून जे-इन इस हालात को बदलना चाहते हैं।
मून ने नये साल पर प्रेस कांफ्रेंस में कहा था, "दक्षिण कोरिया की प्रतिव्यक्ति आय इस वर्ष 30 हजार अमरीकी डॉलर हो जाएगी, लेकिन यह आमदनी महत्वपूर्ण नहीं है। अहम यह है कि लोग अच्छी जिंदगी जी सकें।" सरकार लोगों को काम से निकालकर उनके तन-मन की सेहत दुरुस्त करना चाहती है। सप्ताह में काम करने की अधिकतम सीमा 68 घंटे से घटाकर 52 घंटे कर दी गई है। जो इसे नहीं मान रहे, उनके लिए 2 साल की जेल का प्रावधान किया गया है। सरकार ने न्यूनतम मजदूरी भी बढ़ा दी है। मां या पिता बनने पर मिलने वाली छुट्टियां बढ़ाई गई हैं। बच्चों की परवरिश पर सब्सिडी शुरू की गई है। पेंशन बढ़ाई गई है।
पहले से चले आ रहे हैप्पीनेस फंड को भी जारी रखा गया है। यह फंड लोगों को व्यक्तिगत कर्जों से छुटकारा दिलाने में मदद करता है। सिओल की एक टायर कंपनी के क्वालिटी मैनेजर चा को लगता है कि सरकार वही कर रही है जिसकी उनके देश को जरूरत है। कुछ समस्याएं, जैसे जन्म दर कम होना, इतनी बड़ी हो गई हैं कि उनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जीवन-स्तर सुधरने के कई फायदे हैं। कम आय-वर्ग वाले मजदूरों के पास ज्यादा पैसा होगा तो कई तरह के प्रोडक्ट और सेवाओं की मांग बढ़ेगी। फुरसत में काम आने वाली चीजों की भी मांग बढ़ेगी। आत्महत्याएं घटेंगी और लोग ज्यादा बच्चे पैदा करेंगे, लेकिन क्या यह सब इतना सीधा-सादा है?
कानून बनाकर खुशियां लाना जटिल है। किसी देश की खुशी कई चीजों पर निर्भर करती है। राजनीतिक आजादी और पर्यावरण वगैरह की भी भूमिका होती है। संयुक्त राष्ट्र की वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट के सह-लेखक और कोरिया डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर शुन वांग को लगता है कि नीतियां बनाने वाले लोग अर्थशास्त्रियों की सुनेंगे। "वे लोगों से यह नहीं कहते कि कैसे खुश रहा जाए, बल्कि वे सरकार से कहते हैं कि किस तरह की नीतियां खुशी का स्तर बढ़ाने या घटाने में कारगर होती हैं।" मिसाल के लिए, सांख्यिकी में हुए शोध बताते हैं कि बेरोजगारी बढ़ती है तो देश की खुशी घट जाती है।
2008 की मंदी के दौरान, दक्षिण कोरिया सरकार ने नौकरियां बढ़ाने पर जोर दिया था, भले ही उसमें तनख्वाह कम हो या काम अस्थायी हो। नतीजा यह रहा कि दक्षिण कोरिया में संतुष्टि का स्तर स्थिर रहा, जबकि ग्रीस और स्पेन जैसे यूरोपीय देशों में यह धराशायी हो गया और आज तक नहीं सुधर पाया है। दक्षिण कोरिया नागरिकों की खुशी बढ़ाने के लिए नीतियां बनाने वाला अकेला देश नहीं है। इंग्लैंड भी 2012 से ही घरेलू खुशियों को रिकॉर्ड कर रहा है और इसके आंकड़े मानसिक सेहत, रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
संयुक्त अरब अमीरात ने 2021 तक सबसे सुखी मुल्क बनने का लक्ष्य रखा है और इसके लिए एक राज्यमंत्री की नियुक्ति की है। भूटान ने 2008 में ही आर्थिक विकास की जगह सकल घरेलू खुशी पर ध्यान देने की नीति बना ली थी। भूटान ने राष्ट्रीय स्तर पर खुशहाली मापने के लिए एक पैमाना भी बनाया है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून ने 2016 में भूटान का दौरा किया था। समझा जाता है कि उन्हें वहीं से प्रेरणा मिली है। मून की नीतियां सरल हैं और देश की समस्याओं पर केंद्रित हैं। उन पर अमल करने के परिणाम भी दिखने लगे हैं, लेकिन सफलता की गारंटी नहीं है।
2018 में दक्षिण कोरिया में न्यूनतम मजदूरी 16.4 फीसदी बढ़ी। 2019 में इसमें 10.9 फीसदी इजाफा होना तय है। न्यूनतम मजदूरी बढ़ने से नौकरियों पर संकट खड़ा हो गया है। कुछ बस कंपनियों ने सेवाएं बंद करने की धमकी दी है, जबकि कुछ अन्य कंपनियां मजदूरों से कम घंटे काम करा हैं, ताकि लागत घटाई जा सके।
साप्ताहिक काम के घंटे कम करना भी मुश्किल है। दक्षिण कोरियाई लोग तय समय पर काम खत्म करने लिए जाने जाते हैं। काम के घंटे घटाने से उन पर कम समय में उतना ही काम करने का दबाव बढ़ेगा। यानी खुश होना आसान नहीं है। योन्शी यूनिवर्सिटी के हैप्पीनेस एंड कल्चरल साइकॉलजी लैब के डायरेक्टर यून्कुक एम. सुह कहते हैं कि अलग-अलग सभ्यताओं में खुशी के मायने अलग हैं।
अमरीका और ब्रिटेन जैसी व्यक्तिवादी सभ्यताओं में हर व्यक्ति खुशी के अपने पैमाने बनाता है, लेकिन कोरिया जैसी समष्टिवादी सभ्यताओं में खुशी समाज से जुड़ी होती है। "यहां मैं अपनी जिंदगी के बारे में क्या सोचता हूं, यह मायने नहीं रखता। मेरे बारे में दूसरों के खयाल क्या हैं, यह मायने रखता है।"
सुह कहते हैं, "आपको यह दिखाना पड़ता है कि आपकी जिंदगी खुश होने के काबिल है। इसके लिए कुछ सबूत की जरूरत होती है। जैसे किसी अच्छी यूनिवर्सिटी की डिग्री, कोई महंगी कार या फिर बड़ा घर। "दक्षिण कोरिया में यूनिवर्सिटी में दाखिला आसान नहीं है। सरकारी नौकरियां भी सीमित हैं। ऐसे में बहुत कम लोगों को ही वह खुशी मिल पाती है, जिसे आदर्श समझा जाता है।
राष्ट्रपति मून लोगों के सामने उदाहरण पेश करने के लिए हर छुट्टी लेते हैं। वे यह दिखाते हैं कि यदि एटमी ताक़त वाले पड़ोसी उत्तर कोरिया के साथ शांति प्रयास करते हुए भी वे छुट्टी ले सकते हैं तो सभी लोग ऐसा कर सकते हैं। लेकिन विशेषज्ञों को लगता है कि ज्यादा छुट्टी देने से समस्या आधी ही सुलझेगी। यह देखना होगा कि खाली समय का वे क्या करते हैं। जेजू तट पर मछलियां मार रहे सांग-दाई चा 15 साल से एक ही नौकरी कर रहे हैं। उनको लगता है कि काम और जिंदगी के बीच उन्होंने सही संतुलन बना रखा है।
चा की कंपनी हफ्ते में 40 घंटे काम लेती है। ओवरटाइम कभी-कभी ही करना पड़ता है और चा हर छुट्टी इंज्वॉय करते हैं। वे कहते हैं, "मेरी कंपनी ऐसा कहती है। मेरी पत्नी भी ऐसा ही कहती है।" चा को लगता है कि काम और छुट्टी के बारे में अगर कानून बनता है तो हो सकता है कि लोगों को बुरा लगे। अगर यह बदलाव कंपनियां खुद लाएं तो लोगों को ज्यादा आसानी होगी। लेकिन क्या चा को लगता है कि देश सही दिशा में जा रहा है? जवाब में वे कहते हैं, "हां, भविष्य और बेहतर होगा।"