क्या वाकई हम किसी सुपर कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में जी रहे हैं? या हमारी सच्चाई कुछ और नहीं बल्कि एक सिमुलेशन का हिस्सा है? ये सवाल लंबे समय से वैज्ञानिकों को परेशान किए हुए है। मशहूर बिजनेस मैन एलन मस्क का कहना है कि बिलियन में केवल एक बार ही ये संभावना हो सकती है कि हमारी दुनिया की ये सच्चाई किसी सुपर कंप्यूटर सिमुलेशन या कहें मेट्रिक्स का हिस्सा ना हो।
वहीं दूसरी तरफ मशहूर खगोलविद नील डिग्रेस टाइसन भी इस बात की पूरी संभावना जताते हैं कि हम एक आभासी दुनिया में जी रहे हैं। तो क्या वाकई हम किसी सच्चाई में ना जीकर एक सिमुलेशन में हैं? क्या हमारा रहना, खाना, सोचना, समझना, लड़ना, झगड़ना सब कुछ एक कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का हिस्सा है? क्या हमारी वास्तविकता भ्रम के सिवा कुछ और नहीं है। ऐसे में इसको लेकर एक बहुत बड़ी बहस वैज्ञानिकों के बीच हो रही है। इसी कड़ी में आइए जानते हैं इस बारे में विस्तार से -
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एलन मस्क
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एलन मस्क अपने एक इंटरव्यू में कहते हैं - "आज से 40 साल पहले हमारे पास 2D पोंग गेम था। आज 40 साल बाद तकनीकी उन्नति के चलते कई बेहतरीन वर्चुअल रियलिटी वाले 3D गेम्स हमारे पास आ गए हैं, जिसे करोड़ों लोग एक साथ खेल रहे हैं। ये गेम्स दिन प्रतिदिन बेहतर होते जा रहे हैं। इसी गति से हमारी कंप्यूटेशनल पॉवर बढ़ती गई तो एक समय ऐसा आएगा जब वीडियो गेम्स की रियलिटी और वास्तविक दुनिया की रियलिटी में फर्क करना काफी मुश्किल काम होगा।
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मैट्रिक्स
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मस्क का मानना है कि इसकी बहुत बड़ी संभावना है कि हम खुद भी एक एडवांस्ड सिविलाइजेशन के प्रोग्रामिंग में जी रहे हैं। हमारी ये दुनिया भी एक गेम की तरह एक भ्रम या कहें सिमुलेशन का हिस्सा है। ऐसा नहीं है कि एलन मस्क ने ही इस अवधारणा को सबसे पहले सामने रखा है। साल 2003 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर निक बॉस्ट्रोम ने भी अपने एक पेपर (Are we living in a Computer Simulation) के माध्यम से सिमुलेशन की इस संभावना को देश दुनिया में काफी लोकप्रिय किया।
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अपने लोकप्रिय शो स्टार टॉक में नील डिग्रेस टाइसन कहते हैं कि अगर हमारी ये वास्तविकता वाकई एक कंप्यूटर सिमुलेशन है, तो ये हमारी अपनी और पूरी दुनिया की मांग के मुताबिक बदलती है। अर्थात जो हम चाहते हैं वही हमको मिलता है।
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मैट्रिक्स
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कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस सच्चाई में हम जी रहे हैं उसे एक हाइपर इंटेलिजेंट प्रजाति ने डिजाइन किया है। आप क्या सोचते हैं इस बारे में? क्या हमारी ये वास्तविकता महज एक सिमुलेशन प्रोग्रामिंग का हिस्सा है? या ऐसा कुछ भी नहीं है हम एक वास्तविक दुनिया में जी रहे हैं? इस रहस्यमय सवाल का हमारे पास अभी तक कोई उत्तर नहीं है। हालांकि सिमुलेशन हाइपोथेसिस को लेकर वैज्ञानिक जगत काफी उत्सुक दिख रहा है।