अमेरिका पर हुए गुब्बारे बम से हमले की कहानी, जिसकी सालों तक छुपाकर रखी गई जानकारी
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इतिहासकार रॉस कॉएन बीबीसी को बताते हैं कि, "द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अगर अमेरिका की जमीन पर कोई हमला हुआ था तो वो ये था। जिन लोगों पर ये गुब्बारे गिरे थे उनमें से कुछ उस वक्त पिकनिक मना रहे थे और ये इस कहानी को और भी दिलचस्प बना देता है।" इस मुद्दे पर रॉस कॉएन ने 'फू-गो: द क्यूरियस हिस्ट्री ऑफ द जापानीज बलून दैड ट्राएड टू बॉम्ब द यूएस' नाम की किताब लिखी है जो यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का ने प्रकाशित की है।
वो कहते है, "लेकिन ये अकेला हमला नहीं था बल्कि ये एक जटिल हमले की योजना का हिस्सा था जिसमें ऐसे हथियार भी शामिल थे जो प्रशांत महासागर पार कर अमेरिका पहुंच सकें और यहां लोगों में डर फैला सकें।" लेकिन ये योजना बनी कैसे और इसे लागू कैसे किया गया? ये हमला नाकाम कैसे साबित हुआ?
फू-गो गुब्बारा बम
अमेरिका और जापान दोनों ही लंबे वक्त से प्रशांत महासागर पर नियंत्रण चाहते थे। उनकी ये महत्वाकांक्षा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी रही। ऐसे में जापान की इंपीरियल आर्मी के नेतृत्व कर रहे जनरल दुश्मन पर हमला करने के नए तरीकों के बारे में विचार कर रहे थे। कॉएन कहते हैं, "जापान को प्रशांत महासागर में चलने वाले वायु प्रवाह की और अमेरिका के पश्चिमी तट और इस इलाके की भौगोलिक स्थिति के बारे में अच्छी जानकारी थी।"
अमेरिकी सेना के दस्तावेजों के अनुसार जापान का उद्देश्य था अमेरिका के पश्चिमी तट पर मौजूद जंगलों में आग लगाना ताकि इसे यहां की जनता के बीच डर फैल जाए। वो कहते हैं, उन्हें इस बात का यकीन था कि गुब्बारों के जरिए बारूद डालने का उनका तरीका काम करेगा। अमेरिकी नौसेना के पुराने दस्तावेजों के अनुसार ये बलून 10 मीटर चौड़े, 20 मीटर ऊंचे थे और इनमें हाइड्रोजन गैस भरी हुई थी। कॉएन कहते हैं, "ये गुब्बारे छोड़ते वक्त जापान ने प्रशांत महासागर के वायु प्रवाह का लाभ उठाया था। उन्हें पता था कि हवा इन्हें सीधे अमेरिका तक बहा ले जाएगी।"
अमेरिकी सेना के पुराने दस्तावेजों से पता चलता है कि ये गुब्बारे बेहद हल्के कागज से बने थे जिन पर सेन्सर लगे बम लगाए गए थे। इनकी ट्यूब्स में बारूद भरा गया था और साथ में एक एक्टिवेशन डिवाइस भी लगाया गया था। ये गुब्बारे 12 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ने में सक्षम थे और एक बार में 7,500 किलोमीटर तक की उड़ान भर सकते थे।
कॉएन कहते हैं, "उस वक्त के हिसाब से देखें तो ये एक तरह के इंटरओशिएनिक रॉकेट थे जो आज कुछ देशों के पास हैं। इस वक्त कोई भी इस तरह के हमले की कल्पना भी नहीं कर सकता था। इस हमले को बड़े पैमाने पर नाकाम कहा जा सकता है लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है इस कारण ओरेगॉन में छह लोगों की जान गई।" इन गुब्बारों पर लिखने वाले इतिहासकार ब्रेट वेबर के अनुसार मेजर तेईजी ताकाड़ा के नेतृत्व में जापानी सेना की नौवीं डिविशन की डिजाइन लेबोरेटरी में ये गुब्बारे बनाए गए थे।
कॉएन कहते हैं, "जापानियों ने इन गुब्बारों को नाम दिया फू-गो। फू जापानी शब्द फूशेन का पहला अक्षर था, जिसका अर्थ था गुब्बारा और गो एक कोड था जो इस लेबोरेटरी के बनाए सभी हथियारों के नाम के साथ लगाया जाता था। जापानी लोग बेवकूफ नहीं थे। कई महीनों तक वो हजारों गुब्बारे प्रशांत महासागर के पार इस उम्मीद में भेजते रहे कि कम से कम दस फीसदी गुब्बारे तो अमेरिकी जमीन पर पहुंच कर अपना उद्देश्य पूरा करेंगे।"
दस्तावेजों से पता चलता है कि जापान को इस बात की जानकारी थी कि नवंबर से मार्च के बीच महासागर पर वायु का प्रवाह सबसे तेज होता है। उन्होंने गुब्बारे छोड़ने के लिए यही वक्त चुना था। एक बार ये गुब्बारे जमीन पर गिरते तो फिर उनमें आग लग जाती और विस्फोट हो जाता। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार इस बारूद से जंगल में बड़ी आग लग सकती थी। उन्हें ये भी डर था कि ये गुब्बारे जैविक हथियार भी हो सकते हैं। हालांकि बाद में उनकी ये चिंता खत्म हो गई थी।