फूड इंडस्ट्री और दूसरी मांगों के बढ़ने को देखते हुए ग्रेगसन की फर्म यूरोप और उत्तरी अमरीका में समुद्री शैवालों की कतार के बीचोंबीच है। वो कहते हैं, "आपके पास बायोमास है, जिसका इस्तेमाल खाने और खिलाने के लिए किया जा सकता है। साथ ही यह जीवाश्म आधारित उत्पादों की भी जगह ले सकता है।"
वो समुद्री घास, जो भविष्य में खाना और ईंधन दोनों में आ सकती है काम
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लेकिन कंपनी तेजी से बढ़ रही है और इसकी क्षमता को इस साल दोगुना किये जाने की योजना है। हालांकि इससे तुंरत अभी पैसा नहीं बन रहा है लेकिन ऐसी उम्मीद है कि बहुत जल्दी ही इससे पैसा भी मिलने लगेगा। ग्रेगसन कहते हैं, "हम देख सकते हैं कि हम इसे कैसे इसका मशीनीकरण कर सकते हैं और कैसे हम इसे एक बड़े पैमाने की गतिविधि बना सकते हैं।"
सौंदर्य प्रासाधन और दवाइयां
समुद्री शैवाल को तुरंत प्रोसेस करने की जरूरत होती है। फारोइस गांव में एक छोटे से प्लांट में, कटाई के बाद लाए गए समुद्री शैवाल को साफ किया जाता है। कुछ को सुखा दिया जाता है और फूड मैन्युफैक्चरर को भेज दिया जाका है। इसके बाद जो बचता है कि उसे फर्मन्टेड (किण्वित) किया जाता है और पशु चारा बनाने वाली कंपनियों को भेज दिया जाता है।
समुद्री शैवाल की खेती का एक बड़ा हिस्सा खाने के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है लेकिन इसके अर्क का इस्तेमाल कई तरह की चीजों में किया जाता है। चाहे वो टूथपेस्ट हो, कॉस्मेटिक हो, दवाइयां हो या फिर पालतू जानवरों के खाने में। इन सभी में हाइड्रोकोलॉयड्स होता है जोकि समुद्री शैवाल से ही आता है। इसके अलावा इसका इस्तेमाल अब टेक्सटाइल्स और प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर, वॉटर कैप्सूल बनाने में और ड्रिंकिंग स्ट्रॉ के तौर पर भी किया जा रहा है। समुद्री शैवाल का उत्पादन इस समय अपने चरम पर है।
साल 2005 से 2015 के बीच इसकी मात्रा दोगुनी हो गई है। संयुक्त राष्ट्र के फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, सलाना 30 मिलियन टन समुद्री शैवाल का उत्पादन किया जा रहा है। दुनिया भर में इसका व्यापार 6 अरब डॉलर से भी अधिक का है। बावजूद इसके एशिया के बाहर के कुछ ही हिस्सों में इसकी खेती होती है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि यह श्रम प्रधान गतिविधि है।
बहुत अधिक श्रम की जरूरत
डेनमार्क में आरहस यूनिवर्सिटी में वरिष्ठ वैज्ञानिक एनेट ब्रह्न कहती हैं, "यूरोप में मजदूरी काफी महंगी है। इसलिए यह एक बहुत बड़ी वजह है।" इसकी पैदावार को किफायती बनाने की बात पर वो कहती हैं, "इसके लिए पैदावार बढ़ाने की जरूरत है और लागत कम करने की।"