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अगर दुनिया खत्म हुई तो भी जिंदा रहेगा ये इकलौता पेड़
राजेश सैनी
Updated Wed, 16 May 2018 10:05 AM IST
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अगर कभी धरती पर प्रलय आया और दुनिया तबाह हुई तो भी एक वृक्ष ऐसा है जो जिंदा बचा रहेगा। इस वृक्ष के बारे में अगर आपको कोई जानकारी नहीं है तो जान लीजिए ये आपके लिए जरूरी साबित हो सकती है।
great banyan tree
यह वृक्ष कोलकाता के आचार्य जगदीशचंद्र बोस बोटैनिकल गार्डन में है। यह पेड़ 250 साल पुराना बताया जाता है। आप इसके क्षेत्रफल को जानकर ही हैरान रह जाएंगे। यह वृक्ष 14,500 वर्गमीटर में फैला है। यह अकेला वृक्ष है जो इतने बड़े दायरे में सदियों से फल-फूल रहा है।
आप सोच रहे होंगे कि इसकी जानकारी हमें कैसे..? चलिए इस राज से भी परदा उठा देते हैं। दरअसल, पौराणिक कथाओं में इस वृक्ष का जिक्र है। कथा में बताया गया है कि वट वृक्ष परमात्मा का प्रतीक कहा गया है। इसमें बताया गया है कि प्रलय में जब दुनिया जल में डूब जाती है, तब भी वटवृक्ष बचा रह सकता है।
आप सोच रहे होंगे कि इसकी जानकारी हमें कैसे..? चलिए इस राज से भी परदा उठा देते हैं। दरअसल, पौराणिक कथाओं में इस वृक्ष का जिक्र है। कथा में बताया गया है कि वट वृक्ष परमात्मा का प्रतीक कहा गया है। इसमें बताया गया है कि प्रलय में जब दुनिया जल में डूब जाती है, तब भी वटवृक्ष बचा रह सकता है।
पौराणिक कथाओं में वृक्ष का जिक्र
कथा में इस बात का जिक्र किया गया है कि अक्षय वट कहे जाने वाले इस वृक्ष के पत्तों में साक्षात देवता निवास करते हैं। इसलिए इस पर कभी मुसीबत नहीं आ सकती। कहते हैं कि इस वृक्ष पर बाल गोपाल की कृपा है। ईश्वर यहां मौजूद रहकर सृष्टि का अवलोकन करते रहते हैं।
वहीं रामकथा के अनुसार, राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के समय जब यमुना पार कर दूसरे तट पर उतरते हैं, तो वहीं विशाल वटवृक्ष के पेड़ को प्रणाम करते हैं। ज्ञात हो प्रयाग में गंगा तट पर स्थित अक्षय वट को तुलसीदास जी ने तीर्थराज का छत्र कहा है। वटवृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति को पुनर्जीवित किया था, तब से यह वृक्ष ‘वट सावित्री’ के नाम से भी जाना जाता है।
कथा में इस बात का जिक्र किया गया है कि अक्षय वट कहे जाने वाले इस वृक्ष के पत्तों में साक्षात देवता निवास करते हैं। इसलिए इस पर कभी मुसीबत नहीं आ सकती। कहते हैं कि इस वृक्ष पर बाल गोपाल की कृपा है। ईश्वर यहां मौजूद रहकर सृष्टि का अवलोकन करते रहते हैं।
वहीं रामकथा के अनुसार, राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के समय जब यमुना पार कर दूसरे तट पर उतरते हैं, तो वहीं विशाल वटवृक्ष के पेड़ को प्रणाम करते हैं। ज्ञात हो प्रयाग में गंगा तट पर स्थित अक्षय वट को तुलसीदास जी ने तीर्थराज का छत्र कहा है। वटवृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति को पुनर्जीवित किया था, तब से यह वृक्ष ‘वट सावित्री’ के नाम से भी जाना जाता है।
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यह वृक्ष पर्यावरण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण
यह वृक्ष पर्यावरण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसकी जड़ें मिट्टी को पकड़ कर रखती हैं और पत्तियां हवा को शुद्ध रखती हैं। कहते हैं कि पेड़ एक दिन में 20 घंटों से ज्यादा समय तक ऑक्सीजन बनाता है। पत्तियां तक एक घंटे में पांच मिली ऑक्सीजन बनाती हैं। जितनी ज्यादा पत्तियां, उतनी ज्यादा वृक्ष प्राणदायी है। अकाल में इसके पत्ते जानवरों को खिलाए जाते हैं।
यह वृक्ष पर्यावरण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसकी जड़ें मिट्टी को पकड़ कर रखती हैं और पत्तियां हवा को शुद्ध रखती हैं। कहते हैं कि पेड़ एक दिन में 20 घंटों से ज्यादा समय तक ऑक्सीजन बनाता है। पत्तियां तक एक घंटे में पांच मिली ऑक्सीजन बनाती हैं। जितनी ज्यादा पत्तियां, उतनी ज्यादा वृक्ष प्राणदायी है। अकाल में इसके पत्ते जानवरों को खिलाए जाते हैं।
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वृक्ष के पत्तों से इंसानी बीमारियां भी होती है ठीक
वटवृक्ष के पत्ते कफ-पित्त नाशक, रक्त शोधक, गर्भाशय शोधक होते हैं। इसके पत्तों और जटाओं को पीसकर बनाया गया लेप, कई तरह की त्वचा संबंधी बीमारियों से निजात दिलाते हैं। इसके अलावा, इसके पत्तों को तेल में पका कर उपयोग करने से बालों से संबंधित विकार भी दूर होते हैं। जले हुए स्थान पर इसके कोमल पत्तों को पीसकर दही में मिलाकर लगाने से जलन कम हो जाती है। वटवृक्ष का दूध लगाने से जलन कम हो जाती है। इसका दूध लगाने से फोड़े-फुंसी शीघ्र फूट जाते हैं, वहीं इस दूध को लगाते रहने से गांठ का घाव भी भर जाता है। वटवृक्ष की जड़ों में एंटीऑक्सीडेंट सबसे ज्यादा पाया जाता है।
वटवृक्ष के पत्ते कफ-पित्त नाशक, रक्त शोधक, गर्भाशय शोधक होते हैं। इसके पत्तों और जटाओं को पीसकर बनाया गया लेप, कई तरह की त्वचा संबंधी बीमारियों से निजात दिलाते हैं। इसके अलावा, इसके पत्तों को तेल में पका कर उपयोग करने से बालों से संबंधित विकार भी दूर होते हैं। जले हुए स्थान पर इसके कोमल पत्तों को पीसकर दही में मिलाकर लगाने से जलन कम हो जाती है। वटवृक्ष का दूध लगाने से जलन कम हो जाती है। इसका दूध लगाने से फोड़े-फुंसी शीघ्र फूट जाते हैं, वहीं इस दूध को लगाते रहने से गांठ का घाव भी भर जाता है। वटवृक्ष की जड़ों में एंटीऑक्सीडेंट सबसे ज्यादा पाया जाता है।