चौदह अक्तूबर, 1945 को प्योंगयांग के स्टेडियम में रेड आर्मी का स्वागत करने के लिए एक जनसभा बुलाई गई थी। सोवियत अफसरों से घिरे किम इल संग ने उस दिन अपने जीवन का पहला भाषण दिया। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 33 साल की थी। अपने दोनों हाथों में अपने भाषण का आलेख पकड़े वो बहुत नर्वस दिखाई दे रहे थे। उनके बाल बहुत छोटे कटे हुए थे और वो नीले रंग का बहुत ही तंग सूट पहने हुए थे।जाहिर है उन्होंने सूट को उस मौके के लिए किसी से उधार लिया था। वहां मौजूद एक शख्स की नजरों में वो 'किसी चीनी ढाबे के डिलिवरी ब्वॉय जैसे दिख रहे थे। उस पर तुर्रा ये था कि उन्हें कोरियाई ज़ुबान भी ढंग से बोलनी नहीं आती थी, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के 33 सालों में से 26 साल निर्वासन में बिताए थे।
उत्तर कोरिया में किम जोंग उन के दादा किम इल संग ने कैसे रखी तानाशाही की नींव
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वैसे भी कोरिया में नेतृत्व के लिए सोवियत प्रशासन की पहली पसंद चो मान सिक थे। किम इल संग का पहला भाषण फ्लॅप साबित हुआ था। लेकिन किम के भाग्य ने उनका साथ नहीं छोड़ा क्योंकि स्टालिन की टीम को जल्द ही पता चल गया कि चो न तो कम्युनिस्ट थे और न ही उन्हें कठपुतली की तरह नचाया जा सकता था। चो ने देश को चलाने के लिए रूसियों से खीज दिलाने वाली मांगे शुरू कर दी थीं।अचानक रूसियों को लगने लगा कि किम इल संग उनके लिए कहीं लाभप्रद और कहना मानने वाले विकल्प हैं। बहरहाल 9 सितंबर, 1948 को डेमोक्रेटिक पीपल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया की स्थापना हुई और किम इल संग को उसका नेता बनाया गया।
- दक्षिण कोरिया पर चढ़ाई
उन्होंने तुरंत जापान के खिलाफ संघर्ष में भाग लेने वाले लोगों को शामिल कर कोरियन पीपल्स आर्मी बना डाली। मॉस्को जा कर उन्होंने दक्षिण कोरिया पर हमला करने के लिए स्टालिन की मदद लेने की कोशिश शुरू कर दी। स्टालिन ने उनसे साफ-साफ कह दिया कि उत्तर कोरिया को तभी जवाब देना चाहिए, जब उस पर हमला किया जाए।ब्रैडली मार्टिन अपनी किताब 'अंडर द लविंग केयर ऑफ द फादरली लीडर' में लिखते हैं, "किम की पेशकश के एक साल बाद स्टालिन इस हमले के लिए राजी हुए, बशर्ते माओ भी इसके लिए रजामंद हों।किम ने 1950 में बीजिंग जा कर माओ को हमले के लिए मनाया। 25 जून, 1950 को तड़के उत्तरी कोरिया के सैनिक 150 टी- 34 रूसी टैकों के साथ दक्षिणी कोरिया में घुस गए। कुछ ही दिनों में उत्तरी कोरियाई सैनिकों ने बुसान के पास कुछ इलाके को छोड़ कर पूरे देश पर कब्ज़ा कर लिया।"
- अमेरिका की भयानक बमबारी
जापान में अमेरिकी सेना के कमांडर जनरल डगलस मेकार्थर इस हमले से थोड़े आश्चर्यचकित जरूर हुए, लेकिन उन्होंने तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए सोल के पश्चिम में इंचियान के पास अमेरिकी सैनिक उतार दिए। छह महीने बाद उत्तरी कोरिया की सेना वापस उसी स्थान तक धकेल दी गई, जहां से उसने शुरुआत की थी। ढाई वर्षों तक दोनों पक्ष एक दूसरे पर हमला करते रहे, लेकिन कोई भी निर्णायक जीत नहीं हासिल कर पाया।
ब्रूस क्यूमिंग्स अपनी किताब 'द कोरियन वॉर: अ हिस्ट्री' में लिखते हैं, "हिरोशिमा और नागासाकी की बर्बादी के पांच साल बाद मेकार्थर ने बहुत गंभीरता से उत्तरी कोरिया पर परमाणु बम गिराने के बारे में विचार किया था, लेकिन जल्द ही इस विकल्प को त्याग दिया गया। लेकिन इसके बदले में अमेरिका ने उत्तरी कोरिया पर 6 लाख 35 हजार टन वजन के बम गिराए। इसमें से दो लाख बम अकेले प्योंगयांग शहर पर गिराए गए, यानी शहर के हर एक नागरिक के लिए एक बम।" इस बर्बादी के बाद जब ये जाहिर हो गया कि न तो उत्तरी कोरिया और न ही दक्षिण कोरिया की स्पष्ट जीत हो सकती है तो दोनों पक्ष 27 जुलाई, 1953 को युद्ध विराम के लिए सहमत हो गए।
- लोगों पर निगरानी
लड़ाई समाप्त होने के बाद किम इल संग ने युद्ध से तहस नहस उत्तरी कोरिया में अपनी स्थिति मजबूत कर ली। अगले 10 सालों तक एक पार्टी की सरकार ने अपने लोगों पर इस हद तक नियंत्रण किया कि सरकार तय करने लगी कि लोग क्या पढ़ेंगे, क्या कहेंगे, कहां रहेंगे और कहां की यात्रा करेंगे।आंद्रे लानकोव अपनी किताब 'द रियल नॉर्थ कोरिया: लाइफ एंड पॉलिटिक्स इन फेल्ड स्टालिनिस्ट यूटोपिया' में लिखते हैं, "सुरक्षा जासूसों ने हर एक शख्स को अपनी निगरानी में रखना शुरू कर दिया। जो भी विरोध करता उसे उत्तरी पहाड़ियों के दूरदराज और दुर्गम इलाकों में बने लेबर कैंपों में काम करने के लिए भेज दिया जाता। उत्तरी कोरिया 'घेराबंदी की मानसिकता' वाला देश बन गया, जहां हमेशा इस बात का खतरा बना रहता कि सरकारी सैनिक जब भी चाहें किसी की भी निजता का अतिक्रमण कर सकते थे।"