उत्तराखंड से अक्सर बादल फटने की खबर सामने आती रहती है। कुछ दिन पहले ही चकराता के आसपास बादल फटा था। बादलों के फटने से जान-माल को काफी नुकसान पहुंचता है। दरअसल, बादल फटना बारिश का चरम रूप है, जिसके कारण कम समय में ही काफी धुंआधार बारिश होती है। कभी-कभी बादलों के फटने से ओले भी पड़ते हैं। आज हम आपको इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि बादल क्यों फटते हैं?
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
सामान्य तौर पर बादलों के फटने से मूसलाधार से भी ज्यादा तेज बारिश होती है। इस दौरान क्षेत्र में बाढ जैसे हालात बन जाते हैं। अमूमन बादल फटने की घटना पृथ्वी से करीब 15 किलोमीटर के ऊंचाई पर होती है और इस दौरान लगभग 100 मिलीमीटर प्रति घंटा की दर से बारिश होती है। बारिश इतनी तेज होती है कि प्रभावित क्षेत्र में बाढ़ जैसे हालात हो जाते हैं।
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आपको ये जानकर हैरानी होगी कि सबसे तेज बारिश होने के कारण 'बादल फटना' एक भाषा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। क्योंकि वैज्ञानिकों के मुताबिक, ऐसा कुछ नहीं होता कि बादल किसी गुब्बारे की तरह फटता हो। मौसम विज्ञान के अनुसार, बादलों में जब आर्द्रता की मात्रा बढ़ जाती है, तो उनकी आसमानी चाल में कोई बाधा आ जाती है। ऐसे में बहुत तेजी से संघनन होने लगता है और एक सीमित इलाके में कई लाख लीटर पानी पृथ्वी पर गिरता है।
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पानी का बहाव तेज होने के कारण संरचनाओं और चीजों को काफी नुकसान पहुंचता है। भारत के लिहाज से समझे, तो मानसून के मौसम में नमी से भरपूर बादल, जब उत्तर की तरफ बढ़ते हैं, तो हिमालय उनके रास्ते में एक बड़े अवरोधक के रूप में होता है। इतना ही नहीं नमी से भरपूर बादल जब गर्म हवाओं के झोंकों से टकराते हैं, तब भी बादल फटने जैसी घटना हो सकती है।
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साल 2005 में बादलों के गर्म हवा से टकराने के कारण ही भीषण बारिश हुई थी। साल 2010 में लेह में सिलसिलेवार ढंग से फटे कई बादलों के कारण लगभग पूरा शहर तबाह हो गया था। इस घटना में कई लोग की जान चली गई थी। आखिरकार साल 2013 में 16 और 17 जून को केदारनाथ में बादल फटने से भारी तबाही हुई थी।