Dussehra 2022: बुराई पर अच्छाई की जीत का त्योहार दशहरा ( Dussehra 2022) देशभर में धूमधाम मनाया जाता है। भगवान श्रीराम ने इसी दिन अहंकारी रावण का वध किया था। इस दिन जगह-जगह रावण का पुतला दहन किया जाता है। हालांकि भारत में कुछ ऐसी जगहे हैं जहां पर रावण दहन नहीं किया जाता है बल्कि उसकी पूजा होती। उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित एक गांव में रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता है।
मेरठ के इस गांव का नाम गगोल है। इस गांव में दशहरा नहीं मनाने की एक खास वजह है। दरअसल इस गांव में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी। इसके बाद से आज तक उनकी याद में दशहरा का त्योहार नहीं मनाया जाता है। अंग्रेजी हुकुमत ने दशहरे के दिन पीपल के पेड़ पर क्रांतिकारियों को लटका दिया था। यह पीपल का पेड़ आज भी गांव के बाहर स्थित है। इस पीपल के पेड़ पास ही एक मठ है जिसका नाम भूमिया है।
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मेरठ के इस गांव में नहीं मनाया जाता है दशहरा
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मेरठ में कई प्राचीन मंदिर भी है जिसमें प्राचीन बिल्वेश्वर नाथ मंदिर की एक अलग पहचान है। मान्यता है कि त्रेता युग में रावण की पत्नी मंदोदरी इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आती थी। भगवान शंकर ने मंदोदरी की तपस्या से प्रसन्न होकर बिल्वेश्वर नाथ मंदिर में ही दर्शन दिए थे और वरदान मांगने के लिए कहा था। मंदोदरी दानवों के राजा मयदानव की पुत्री थी।
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मेरठ के इस गांव में नहीं मनाया जाता है दशहरा
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इसके बाद मंदोदरी ने भगवान शिव से वर मागा कि उसका पति धरती पर सबसे बलशाली और विद्वान हो। मान्यता है कि इस मंदिर में रावण और मदोदरी मिले थे और दोनों की शादी हुई। रावण पुलस्त्य मुनि का पौत्र था और विश्रवा ऋषि का पुत्र था।
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जानिए क्या है इतिहास
गगोल गांव मेरठ जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां पर विजयादशमी के दिन रावण नहीं जलाने की वजह दूसरी जगहों से काफी अलग है। इस गांव में दशहरे के दिन मायूसी छाई रहती है। बताया जाता है कि लोग इस दिन लोगों के घर में चूल्हा भी नहीं जलता है।
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दरअसल जिन क्रांतिकारियों को फांसी पर लटकाया गया था उनमें इस गांव के लोग भी शामिल थे। शहीदों की याद में गांव वालों ने जिस पीपल पर लोगों को फांसी दी गई थी वहां उनकी याद में मंदिर बनवाया है। दशहरा के दिन इस मंदिर में गांव वाले शहीदों की पूजा करते हैं और उनके बलिदान को याद करते हैं।