मिथिलांचल की सांस्कृतिक धरोहर और भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक सामा-चकेवा पर्व शुक्रवार की रात पूरे हर्षोल्लास और उत्साह के साथ मनाया गया। सहरसा में महिलाओं और युवतियों ने अपने आंगन और खेतों में सामा-चकेवा की परंपरा को जीवंत रखते हुए भाइयों की दीर्घायु और समृद्धि की कामना की।
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भाई और बहनों ने मनाया सामा-चकेवा पर्व
- फोटो : अमर उजाला
पर्व की परंपराएं
रात्रि में महिलाओं ने पारंपरिक गीत गाते हुए सामा, चकेवा, चुगला और अन्य मूर्तियों वाले डाले को सजाया। फिर चुगला को जलाकर सामा-चकेवा का विसर्जन किया। इस दौरान, भाइयों ने अपनी बहनों को उपहार देकर उनके प्रति प्रेम और कृतज्ञता प्रकट की। बहनों ने अपने भाइयों के दीर्घायु जीवन की कामना करते हुए सामा को उनके बाएं घुटने से फोड़वाया और आंचल में लिया।
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भाई और बहनों ने मनाया सामा-चकेवा पर्व
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चुगला को जलाने का महत्व
सामा-चकेवा की कथा में चुगला एक नकारात्मक पात्र है, जिसे जलाने की परंपरा चुगलखोरी और बुरी प्रवृत्तियों का अंत करने का संदेश देती है। यह पर्व आधुनिक समाज में भी सामूहिकता, प्रेम और नैतिकता का प्रतीक बना हुआ है।
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भाई और बहनों ने मनाया सामा-चकेवा पर्व
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ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में उत्साह
गांवों से लेकर शहर तक, देर रात तक महिलाएं और युवतियां सामा-चकेवा के गीत, सोहर और समदाउन गाती रहीं। खेतों में सामूहिक विसर्जन के दौरान बच्चों ने पटाखे फोड़कर अपनी खुशी जताई। महिलाओं ने मिट्टी से चुगला और वृंदावन की मूर्तियां बनाकर इस परंपरा को जीवंत बनाए रखा।