जैसे-जैसे हमारी कारें और गाड़ियां हाई-टेक हो रही हैं, उनमें सॉफ्टवेयर और इंटरनेट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन इसके साथ ही गाड़ियों के हैक होने या सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी का खतरा भी बढ़ गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने एक बड़ा कदम उठाया है।
Cybersecurity: कनेक्टेड और ऑटोनॉमस वाहनों के लिए सरकार ला रही है नए साइबर सुरक्षा नियम, हैकिंग होगी बंद!
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने ऐसे मसौदा नियम जारी किए हैं, जिनके लागू होने के बाद पहली बार कुछ श्रेणी के मोटर वाहनों के लिए साइबर सुरक्षा और सॉफ्टवेयर अपडेट मैनेजमेंट कानूनी रूप से अनिवार्य हो जाएंगे। इस पहल के साथ भारत उन देशों की श्रेणी में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जहां ऐसे नियम पहले से लागू हैं। इनमें यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया शामिल हैं।
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नियम 125-T क्या है और यह साइबर सुरक्षा को कैसे मजबूत करेगा?
यह नियम पूरी तरह से वाहनों की साइबर सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए तैयार किया गया है:
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इन गाड़ियों पर होगा लागू: यह नियम कैटेगरी M (यात्री वाहन), N (माल ढुलाई वाले वाहन) और T (ट्रैक्टर) के उन सभी वाहनों पर लागू होगा जिनमें कम से कम एक इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट (ECU) लगी है। इसके अलावा, लेवल 3 ऑटोमेशन या उससे ऊपर की तकनीक वाले कैटेगरी L7 वाहनों के लिए भी यह अनिवार्य होगा।
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AIS-189 का पालन जरूरी: इन सभी गाड़ियों को भारत के घरेलू साइबर सुरक्षा मानक AIS-189 का पालन करना होगा।
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साइबर सिक्योरिटी मैनेजमेंट सिस्टम (CSMS): कंपनियों को अपने वाहनों के लिए एक व्यवस्थित 'साइबर सिक्योरिटी मैनेजमेंट सिस्टम' बनाए रखना होगा। यह एक ऐसी संरचित प्रक्रिया होगी जिसके जरिए गाड़ी के पूरे जीवनकाल के दौरान सुरक्षा से जुड़े खतरों की पहचान की जाएगी और उन्हें ठीक किया जाएगा।
नियम 125-U क्या है और सॉफ्टवेयर अपडेट को लेकर इसके क्या निर्देश हैं?
गाड़ियों में आने वाले सॉफ्टवेयर अपडेट्स को सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए यह नियम लाया जा रहा है:
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दायरा है काफी बड़ा: यह नियम साइबर सुरक्षा वाले नियम से भी अधिक श्रेणियों पर लागू होगा, जिसमें M, N, T, A, और C कैटेगरी के वाहन शामिल हैं।
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AIS-190 मानक की अनिवार्यता: इन वाहनों को AIS-190 मानक का पालन करना होगा। यह मानक तय करता है कि किसी गाड़ी में सॉफ्टवेयर अपडेट को कैसे डिलीवर किया जाएगा। और एक 'सॉफ्टवेयर अपडेट मैनेजमेंट सिस्टम' (SUMS) के जरिए उसे कैसे ट्रैक किया जाएगा।
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BIS के नियमों तक ही वैध: ये दोनों ही घरेलू मानक (AIS-189 और AIS-190) केवल तब तक प्रभावी रहेंगे जब तक कि भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) इस संबंध में अपने खुद के औपचारिक और नए विनिर्देश (स्पेसिफिकेशंस) जारी नहीं कर देता। जैसे ही BIS के नियम आएंगे, वे इनकी जगह ले लेंगे।
वैश्विक स्तर पर भारत कहां खड़ा होगा?
इस नए कदम के जरिए भारत खुद को वैश्विक वाहन सुरक्षा मानकों के बराबर लाने की कोशिश कर रहा है:
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यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क से तालमेल: यह नया नियम भारत को सीधे यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क (संयुक्त राष्ट्र के ढांचे) के समकक्ष ले आएगा। यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित बाजारों में गाड़ियों के टाइप अप्रूवल यानी बिक्री की मंजूरी के लिए CSMS और SUMS सर्टिफिकेशन होना पहले से ही कानूनी रूप से अनिवार्य है।
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ऑप्शनल फीचर नहीं, कानूनी शर्त: उन विदेशी बाजारों में साइबर सुरक्षा को किसी गाड़ी का कोई वैकल्पिक फीचर नहीं, बल्कि गाड़ी बेचने की एक अनिवार्य कानूनी शर्त माना जाता रहा है, और अब भारत भी इसी राह पर है।
इन नियमों को देश में कब और कैसे लागू किया जाएगा?
सरकार इन नियमों को एक साथ सभी गाड़ियों पर थोपने के बजाय, उनके रिस्क एक्सपोजर (जोखिम की संभावना) के आधार पर अलग-अलग चरणों में लागू करेगी:
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लेवल 3 ऑटोमेशन और उससे ऊपर के वाहन: चूंकि इन गाड़ियों में जोखिम सबसे ज्यादा होता है, इसलिए इनके लिए सबसे पहले की डेडलाइन तय की गई है। नए मॉडल्स के लिए यह नियम अक्तूबर 2026 से और मौजूदा (बाजार में पहले से बिक रहे) मॉडल्स के लिए अप्रैल 2027 से अनिवार्य हो जाएगा।
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ओवर-द-एयर (OTA) अपडेट वाले वाहन: जिन वाहनों में इंटरनेट के जरिए सीधे अपडेट (OTA) आते हैं, वे इसके अगले चरण में शामिल होंगे। उनके नए मॉडल्स के लिए अप्रैल 2028 और पुराने मॉडल्स के लिए अक्तूबर 2028 की समयसीमा तय की गई है।
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बाकी सभी वाहन: ऐसी अन्य सभी गाड़ियां जिनमें किसी भी प्रकार की सॉफ्टवेयर अपडेट की क्षमता मौजूद है (चाहे वह ओटीए हो या न हो), उनके लिए अंतिम डेडलाइन अक्तूबर 2029 तय की गई है।