फलित ज्योतिष में छाया ग्रहों के प्रभाव का सर्वाधिक महत्व है क्योंकि, जन्मकुंडली में छाया ग्रहों की स्थिति के ही अनुसार मनुष्य को अपने आंतरिक भाव का बोध हो सकता है जिसके फलस्वरूप मनुष्य अपना जीवन यापन अधिक अर्थपूर्ण कर सकता है। केतु को रहस्यमयी कांति कथा गौरवशाली ज्योति किरण कहा गया है। अनेकों फलित ग्रंथों में कहा गया है कि मंगल, राहु, शनि, केतु तथा सूर्य पहाड़ों एवं जंगलों में घूमाते हैं इसका तात्पर्य यह है कि इन ग्रहों का दीक्षा संस्कार से संबंध बतलाना है। केतु का पर्यायवाची शब्द ध्वजा तथा शिखी है ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि केतु के प्रभाव से जातक दीक्षा की परीक्षा ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति एवं आत्मबोध में सफल होता है। किसी भी जातक की जन्मकुंडली में केतु जिस भाव में रहते हैं उस ग्रह के स्वामी के अनुसार फल देते हैं अथवा जिस ग्रह के साथ रहते हैं उस ग्रह के प्रभाव में वृद्धि करते हैं। यदि ग्रह शुभ हैं तो शुभता में और ग्रह अशुभ है तो अशुभता में वृद्धि करेंगे। छाया ग्रहों का यही प्रभाव रहता है। जन्म कुंडली के अनुसार आपके संपूर्ण जीवन में केतु का प्रभाव कैसा रहेगा इसका ज्योतिषीय विश्लेषण करते हैं।
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प्रथम भाव में केतु - जिन जातकों की जन्म कुंडलियों में केतु प्रथम भाव अर्थात लग्न में रहते हैं उनके चेहरे पर अलग तरह की आभा रहती है। अपने तेज और प्रभाव के द्वारा ऐसे लोग अलग से पहचाने जाते हैं किंतु संभव है चेहरे पर किसी तरह का निशान भी हो। ऐसे लोग विषम परिस्थितियों में भी अपना विकास कर लेते हैं।
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द्वितीय भाव में केतु- किसी भी व्यक्ति की जन्मकुंडली में यदि केतु लग्न से दूसरे भाव में हों तो ऐसा व्यक्ति गूढ़ विद्याओं का ज्ञाता होता है किंतु कहीं न कहीं धन के अभाव में उसे कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को आंख, कान अथवा गले संबंधी रोग भी हो सकता है। आकस्मिक धन प्राप्ति की भी योग रहते हैं।
तृतीय भाव में केतु- जिन जातकों की जन्मकुंडलियों में केतु लग्न कुंडली से तीसरे पराक्रम भाव में रहते हैं उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं है। हमेशा उनके साहस एवं ऊर्जा की वृद्धि करेंगे तथा निर्णय लेने की शीघ्र क्षमता प्रदान करेंगे। जातक को स्वावलंबी, महत्वाकांक्षी और दृढ़ संकल्प वाला बनाएंगे। भाइयों से मतभेद हो सकता है।