Jayadratha Vadh Mahabharat Story in Hindi: महाभारत के विशाल युद्ध में कई ऐसे प्रसंग हैं जिन्होंने युद्ध की दिशा और परिणाम को प्रभावित किया। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण घटना है जयद्रथ वध। यह वह प्रसंग है जब अर्जुन ने अपने पुत्र अभिमन्यु की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का प्रण लिया और भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य कौशल से उसे पूरा करने में सहायता की। जयद्रथ का नाम उसकी वीरता के साथ-साथ उसके छल, प्रतिशोध और उसके नाटकीय अंत के लिए भी याद किया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से संबोधन के दौरान भी इस घटना का उल्लेख किया, जिससे यह फिर से चर्चा में आ गई है। आइए जानते हैं जयद्रथ की पूरी कहानी, पांडवों से उसकी दुश्मनी का कारण और उसके वध की योजना।
Jayadratha Vadh: पीएम मोदी ने लाल किले से सुनाई जयद्रथ के वध की कहानी, जानें महाभारत का ये अद्भुत प्रसंग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से संबोधन के दौरान भी इस घटना का उल्लेख किया, जिससे यह फिर से चर्चा में आ गई है। आइए जानते हैं जयद्रथ की पूरी कहानी, पांडवों से उसकी दुश्मनी का कारण और उसके वध की योजना।
जयद्रथ और पांडवों की दुश्मनी
जयद्रथ सिंधु देश का राजा था और दुर्योधन का जीजा, क्योंकि उसका विवाह दुर्योधन की बहन दुशाला से हुआ था। पांडवों के 12 वर्ष के वनवास के दौरान एक बार जयद्रथ की नजर द्रौपदी पर पड़ी और उसने उसका हरण कर लिया। जिसके बाद पांडवों ने उसका पीछा कर उसे पराजित किया और उसका वध करने का निश्चय किया। तब अर्जुन ने भीम को याद दिलाया कि वह उनकी बहन का पति है, इसलिए उसकी हत्या करना उचित नहीं है। ऐसे में भीम ने क्रोध में उसका मुंडन कर दिया और सिर पर पांच चोटियां छोड़ दीं। यह अपमान जयद्रथ के हृदय में प्रतिशोध की आग की तरह भर गया।
अभिमन्यु की मृत्यु और अर्जुन की प्रतिज्ञा
महाभारत युद्ध में अभिमन्यु ने द्रोणाचार्य द्वारा रचित चक्रव्यूह में प्रवेश किया। उसे प्रवेश करना तो आता था, लेकिन निकलना नहीं आता था। जब अर्जुन अपने पुत्र की सहायता के लिए बढ़े, तो जयद्रथ ने उन्हें रोककर युद्ध में उलझा दिया। इस बीच अभिमन्यु कौरवों के हाथों मारा गया। इसे अपना व्यक्तिगत अपमान और पुत्रवध का कारण मानकर अर्जुन ने प्रतिज्ञा ली कि अगले दिन सूर्यास्त से पहले वह जयद्रथ का वध करेंगे, अन्यथा अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग देंगे।
कैसे हुआ जयद्रथ का अंत?
अर्जुन की प्रतिज्ञा के बारे में पता लगते ही कौरवों की पूरी सेना अगले दिन जयद्रथ को छिपाकर उसकी कड़ी सुरक्षा करने लगे। जब सूर्यास्त का समय आया, तो श्रीकृष्ण ने अपनी माया से सुदर्शन चक्र के द्वारा सूर्य को ढक दिया। ऐसे में अंधकार देख जयद्रथ निश्चिंत होकर बाहर आ गया। इसके बाद कृष्ण के संकेत पर अर्जुन ने तुरंत उसका वध कर दिया।
जयद्रथ का वरदान और उसका तोड़
जयद्रथ को वरदान था कि उसका सिर कटकर यदि जमीन पर गिरेगा, तो वध करने वाले का सिर भी फट जाएगा। इससे बचने के लिए श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आदेश दिया कि वह उसका सिर धड़ से अलग कर उसके पिता की गोद में गिरा दें। अर्जुन ने वैसा ही किया और इस प्रकार प्रतिज्ञा भी पूरी हुई और वरदान का प्रभाव भी निष्फल रहा।
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