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पूरब में बागी बन सकते हैं बड़े सियासी दलों के लिए सिरदर्द

Tue, 21 Feb 2017 06:52 PM IST
सुधीर कुमार सिंह/अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
सुधीर कुमार सिंह/अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Updated Tue, 21 Feb 2017 06:52 PM IST
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rebels can be headache for their political parties
पूर्वांचल में नामांकन की प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही तकरीबन सभी सीटों पर प्रत्याशियों की स्थिति साफ हो गई है। कई सीटों पर बागी उम्मीदवार बड़े सियासी दलों के लिए सिरदर्द साबित हो सकते हैं। ऐसे कई उम्मीदवार हैं जो भाजपा, बसपा, कांग्रेस और सपा जैसे दलों से टिकट न मिलने पर बागी उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। इसी तरह कई रसूखदार उम्मीदवार भी अपनी विरासत बचाने के लिए छोटे दलों की दामन थामक र चुनाव मैदान में उतरे हैं। माना जा रहा है कि बागी प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने वाले कई उम्मीदवार बड़ी पार्टियों का समीकरण बिगाड़ सकते हैं।
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दरअसल इस बार के चुनाव में भाजपा, बसपा और सपा जैसे दलों ने बहुत से ऐसे लोगों को टिकट नहीं दिया है जो पार्टी से लंबे समय से जुड़े हैं और टिकट की उम्मीद में काफी समय से चुनावी तैयारियों में जुटे थे। भाजपा व सपा ने तो कुछ आयातित नेताओं को एडजस्ट करने के लिए अपने कई सिटिंग विधायकों तक केटिकट काट दिए हैं। इसी तरह कई ऐसे बाहुबली और रसूखदार नेता भी हैं, जिन्हें किसी बड़े दल से टिकट नहीं मिला तो वह छोटे दलों का सहारा लेकर चुनाव मैदान में उतर गए हैं।
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माना जा रहा है कि ऐसे चर्चित या प्रभावशाली उम्मीदवार किसी बड़े दल के बैनर से चुनाव भले ही न लड़ रहे हों, लेकिन उनकी मौजूदगी ही उन सीटों के चुनावी समीकरणों को प्रभावित जरूर करेगी। माना जा रहा है कि बेस वोट नहीं होने के चलते ऐसे उम्मीदवारों की जीत भले ही पक्की न हो, लेकिन भाजपा, सपा-कांग्रेस व बसपा के उम्मीदवारों की राह में रोड़ तो अटका ही सकते हैं। कई कई ऐसी सीटें हैं, जहां पर जीत का अंतर 2 से 5 हजार के बीच ही होता है। इसलिए कहा जा रहा है कि ऐसी कई सीटों पर ‘वोटकटवा’ उम्मीदवारों की भूमिका मायने रखेगी। कई ऐसी सीटें भी हैं, जहां बागी होकर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार बाजी पलट भी सकते हैं। 
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इन प्रमुख चेहरों के बीच है कुर्सी की जंग

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महेश नारायण तिवारी
भाजपा के पुराने काडर के नेता रहे महेश नारायण तिवारी को पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो बागी होकर गोंडा सदर से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में है। इनका क्षेत्र में काफी अच्छा प्रभाव है। इनके चुनाव लड़ने से इस सीट केचुनावी समीकरणों पर असर पड़ने की पूरी संभावना है।

राजेश्वर मिश्रा
भाजपा के पुराने नेताओं में शुमार राजेश्वर भी भाजपा के बागी उम्मदीवार केरूप में बलरामपुर के तुलसीपुर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। माना जा रहा है कि राजेश्वर का इस क्षेत्र में बेहतर नेटवर्क अन्य दलों के लिए मुसीबत खड़ा कर सकता है।

दिनेश मिश्रा
भाजपा सांसद भैरो प्रसाद मिश्रा के भाई रमेश मिश्रा चित्रकूट के मानिकपुर सीट से बागी उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं। माना जा रहा है इनके चुनाव लड़ने से इस सीट पर अन्य दलों केचुनावी समीकरण पर असर पड़ सकता है। 

धनंजय सिंह
जौनपुर के मल्हनी सीट पर चुनाव लड़ रहे धनंजय बसपा से सांसद व विधायक रह चुके हैं। इसलिए इस इलाके में इनका अच्छा खासा प्रभाव है। निषाद पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। इसलिए माना जा रहा है कि यह सीट जितना बड़े दलों के लिए आसान नहीं होगा।

विजय मिश्रा
सिटिंग विधायक होने के बाद भी सपा से टिकट कटने के बाद विजय मिश्रा भदोही के ज्ञानपुर सीट से निषाद पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं। इस सीट के साथ इनका जिले में बड़ा प्रभाव माना जाता है। इसलिए इस सीट पर चुनावी समीकरण पर विजय की मौजूदगी असर पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है।

यशभद्र सिंह
सुल्तानपुर की इसौली सीट से इस बार रालोद केटिकट पर चुनाव लड़ रहे यशभद्र सिंह के पिता इन्द्रभद्र सिंह और बड़े भाई चन्द्रभद्र सिंह दो-दो बार बसपा और सपा से विधायक रह चुके हैं। दोनों भाई भाजपा में थे, लेकिन भाजपा ने टिकट नहीं दिया तो यशभद्र रालोद के पाले में जाकर चुनाव मैदान में हैं।

दिलीप कांत यादव
बाहुबली व पूर्व सांसद उमाकांत यादव के पुत्र दिनेशकांत यादव जौनपुर की शाहगंज सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा से टिकट नहीं मिला तो रालोद के सहारे विधायक बनने की जुगत में हैं। इस सीट पर इनकी भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सीमा सिंह
माफिया डान मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह जौनपुर की मडियाहू सीट से मैदान में हैं। इसी विधानसभा क्षेत्र के रहने वाले माफिया की पत्नी होने के साथ-साथ सीमा इस क्षेत्र में कई सालों से सक्रिय हैं। कृष्णा पटेल की अगुवाई वाले अपना दल केटिकट लड़ रहीं सीमा की मौजूदगी को कम नहीं आंका जा सकता है।

ये बागी भी बिगाड़ सकते हैं समीकरण

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सुरजीत सिंह टीका, रिबु श्रीवास्तव
वैसे तो पूर्वी यूपी के सभी जिलों में बागियों की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन कुछ ऐसी सीटें हैं जहां से ऐेसे नेता चुनाव लड़ रहे हैं, जिन्हे प्रभावशाली माना जा रहा है। कुशीनगर के तुमकुहीराज सीट पर तीन बागियों के चुनाव लड़ने से सभी दलों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इस सीट पर दो बार के विधायक रहे नंदकिशोर मिश्र के अलावा भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे श्रीकांत मिश्र भी चुनाव लड़ रहे हैं। जबकि रामकोला सीट से डॉ. पीके राय की उम्मीदवारी भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

इसी तरह वाराणसी की उत्तरी सीट से भाजपा के बागी सुजीत सिंह टीका व सेवापुरी से विभूतिनारायण राय के ताल ठोंकने से भाजपा को नुकसान पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। जबकि गठबंधन में कांग्रेस कोटे की कैंट सीट से रिबू श्रीवास्तव के उतरने से गठबंधन को ही नुकसान होने की संभावना है। माना जा रहा है कि अगर ये ‘बागी’ 5 से 15 हजार तक भी वोट काट देंगे तो चुनावी समीकरण बदल सकता है। 
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