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बिहार चुनाव: राहुल की तालाब में छलांग...बिहार में सियासी घमासान

Mon, 03 Nov 2025 08:39 AM IST
Rajkishor राजकिशोर
Updated Mon, 03 Nov 2025 08:39 AM IST
सार

सन ऑफ मल्लाह सहनी के साथ राहुल का निषाद वोटरों को साधने का प्रयास, भाजपा ने ड्रामा करार दिया, कांग्रेस ने कहा-ऐसा जन नेता ही कर सकता है।

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Bihar Elections Rahul Gandhi jump into pond...political turmoil in state politics at a glance before voting
बिहार में सियासी गतिविधियों के बीच राहुल गांधी और मुकेश सहनी स्थानीय लोगों के साथ तालाब में दिखे - फोटो : एक्स@rahulgandhi

विस्तार

मतदाता अधिकार यात्रा के बाद राहुल गांधी ने बिहार में जो सरगर्मी पैदा की थी, वह टिकट बंटवारे में बवाल के बाद ठंडी पड़ गई थी। कांग्रेस का माहौल फिर से तैयार करने के लिए रविवार को राहुल ने तालाब में छलांग लगा दी... बेगूसराय में मछली पकड़ने के लिए...। खुद को सन आफ मल्लाह कहने वाले वीआईपी पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी राहुल के साथ थे। निषाद और मल्लाह समुदाय को साधने के लिहाज से देखे जा रहे इस घटनाक्रम ने बिहार में लोगों का ध्यान आकर्षित तो किया है।
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हालांकि, राहुल का प्रयास आलोचना का सबब भी बना हुआ। उन्होंने छठ पर पीएम नरेंद्र मोदी के घाट पर जाने को ड्रामा कहा था, तो वही शब्द अब भाजपा उनके लिए इस्तेमाल कर रही है। भाजपा ने इसे चुनावी पर्यटन व ड्रामा करार दिया। वहीं, कांग्रेस का दावा है कि जिस तरह से राहुल लोगों से जुड़ते हैं, वह उनकी जन-नेता की छवि को मजबूत करता है। सच यह है कि इसका वास्तविक असर तभी दिखेगा जब यह प्रतीकवाद स्थायी वोट में तब्दील हो।
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प्रतीकवाद और विश्वास : संतुलन साधने का प्रयास
राहुल का यह अभियान आम लोगों के बीच जाकर जमीन से जुड़ाव दिखाने की कोशिश है। कुछ समाजशास्त्री मानते हैं कि मछुआरा समुदाय के लोगों के साथ तालाब में राष्ट्रीय नेता का उतरना उनकी पेशेवर पहचान और अस्तित्व को सम्मान देने जैसा है। यह भावनात्मक जुड़ाव इस समुदाय के लिए एक सकारात्मक संदेश हो सकता है। इस दौरान वीआईपी पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी का होना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। सहनी को उप मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर महागठबंधन ने निषाद/मल्लाह समुदाय को सत्ता में ठोस भागीदारी का वादा किया है, जो केवल भावनात्मक प्रतीकों से कहीं आगे का संदेश है। हालांकि एनडीए का तर्क है कि एक दिन का मौसमी जुड़ाव उस समुदाय का स्थायी विश्वास नहीं जीत सकता, जिसे गरीबी, रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर कंक्रीट, दीर्घकालिक समाधान चाहिए।


40-50 सीटों पर है निषाद वोटों का प्रभाव
  • बिहार की 40 से 50 सीटों पर निषाद या मल्लाह वोटों का खासा प्रभाव माना जाता है। बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, सहरसा, खगड़िया व दरभंगा जैसे जिलों में यह समुदाय निर्णायक हो सकता है। कांग्रेस के रणनीतिकार कहते हैं कि महागठबंधन भागीदारी के वादे को प्रचारित कर पाया, तो यह बड़े समुदाय के वोटों को एनडीए से अपने पाले में ला सकता है।
  • इसके सीमित प्रभाव का जोखिम भी है। यदि मतदाता इसे चुनाव के समय का दिखावा मानते हैं, या एनडीए जातीय समीकरण और महिला केंद्रित योजनाओं से इस समुदाय को साधने में सफल रहता है, तो महागठबंधन का दांव कमजोर पड़ सकता है। देखना है कि मतदाता इस प्रतीकवाद को वास्तविक राजनीतिक मंशा के रूप में स्वीकार करते हैं, या इसे केवल एक सुंदर चुनावी तस्वीर मानकर खारिज कर देते हैं। 
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