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पेट के कीड़े दो साल में चूस गए 22 लीटर खून

Tue, 09 Jan 2018 05:20 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Updated Tue, 09 Jan 2018 05:20 AM IST
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22 liters blood Suck in stomach worms in two years
प्रतीकात्मक तस्वीर
दो साल में पेट के कीड़े 22 लीटर खून पी गए। यह सुनकर शायद आपको विश्वास न हो, लेकिन यह सच है। 14 वर्षीय किशोर वर्ष 2015 से 50 यूनिट ब्लड चढ़वा चुका था, लेकिन उसकी बीमारी ठीक ही नहीं हो रही थी। कई जगह उपचार कराने के बाद उत्तराखंड के हल्द्वानी निवासी बच्चा दिल्ली स्थित सर गंगाराम अस्पताल पहुंचा तो डॉक्टरों ने गहन जांच की। इसके बाद इतनी मात्रा में रक्त की कमी होने का कारण समझ आया। उपचार के बाद फिलहाल बच्चा स्वस्थ है। 
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सर गंगाराम अस्पताल के डिपार्टमेंट ऑफ गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी के चेयरमेन डॉ. अनिल अरोड़ा बताते हैं कि छह महीने पहले इस बच्चे को अस्पताल लाया गया था। कई जगह उपचार के बाद भी उसे लाभ नहीं मिला था। बच्चा दो वर्ष से एनीमिया का रोगी था। उसे बार-बार ब्लड चढ़ने और दो साल में 22 लीटर रक्त का नुकसान होने की जानकारी मिली तो यह चौंकाने वाली थी। एंडिस्कोपी जांच सामान्य थी।
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डॉ. अरोड़ा ने बताया कि कैप्सूल एंडिस्कोपी की गई तो पता चला कि छोटी आंत में कई सारे कीड़े एक तरह से नृत्य सा कर रहे हैं और उसका खून चूस रहे हैं। यह स्थिति अत्यंत गंभीर और चौंकाने वाली थी। आलम यह था कि खून पी-पीकर कीड़ों का रंग भी लाल हो चुका था, जबकि ये सफेद रंग के होते हैं। इसके बाद बच्चे का उपचार किया गया और अब उसका हीमोग्लोबिन 11 है। 

यह होती है कैप्सूल एंडिस्कोपी

22 liters blood Suck in stomach worms in two years
प्रतीकात्मक तस्वीर
देश में कैप्सूल एंडिस्कोपी 4-5 वर्ष पहले ही शुरू हुई है। डॉक्टरों के अनुसार, छोटी आंत में किसी भी तरह की गतिविधि का पता लगाने के लिए यह सबसे बेहतर पद्घति है। इस कैप्सूल में एक कैमरा लगा होता है, जो शरीर के अंदर जाकर प्रति सेकंड दो तस्वीर लेता है। यह कैमरा 12 घंटे तक ही काम करता है और इसके बाद मल के रास्ते निकल जाता है। इस दौरान कैमरा छोटी आंत की करीब 70 हजार तस्वीरें लेता है। यह सभी तस्वीरें पेट के ऊपरी हिस्से पर बंधी बैल्ट में लगे एक रिकॉर्डर में सुरक्षित होती हैं। 

...तो नहीं चढ़ाना पड़ता खून

डॉ. अरोड़ा का कहना है कि समय रहते बच्चे की सही जांच हो जाती तो उसे दो साल में 22 लीटर खून चढ़ाना नहीं पड़ता। उनका कहना है कि कैप्सूल एंडिस्कोपी की सुविधा और इसकी विशेषज्ञता बहुत ही कम अस्पतालों में है। वहीं, लोगों को भी इसकी जानकारी भी नहीं है। उन्होंने बताया कि यह केस मेडिकल जर्नल ऑफ इन्फेक्शन एंड थैरेपी में प्रकाशित भी हो चुका है।
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