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Ujjain News: सद्भावना व्याख्यानमाला में पर्यावरणविद बोले- युवा पीढ़ी को जीवन बीमा से अधिक जल बीमा की आवश्यकता
Tue, 26 Nov 2024 11:32 AM IST
उज्जैन ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: उज्जैन ब्यूरो
Updated Tue, 26 Nov 2024 11:32 AM IST
सार
पद्मश्री पांडेय ने कहा कि जल न केवल सजीवों को जोड़ता है, बल्कि निर्जीव वस्तुओं को भी एक सूत्र में बांधता है। ईंट, चूना, पत्थर के साथ मकान का जोड़ तब तक मजबूत नहीं हो सकता, जब तक उसमें जल का उपयोग न हो। पानी में यह शक्ति है कि वह हर वस्तु को जोड़ता और सहेजता है।
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जल योद्धा प्रसिद्ध पर्यावरणविद् पद्मश्री उमाशंकर पांडेय
विस्तार
जीवन बीमा हमारे भविष्य को आर्थिक रूप से सुरक्षित करता होगा। लेकिन, यह सुरक्षा किस काम की, जब हमारे अस्तित्व और आपसी सद्भावना का आधार अर्थात् जल ही सुरक्षित नहीं रहेगा? आज की युवा पीढ़ी को विरासत में जीवन-बीमा की जगह जल-बीमा देने की आवश्यकता है। जल-बीमा का अर्थ है जल के संरक्षण, संचयन और विवेकपूर्ण उपयोग की दिशा में सशक्त प्रयास करना। जल न केवल जीवन का आधार है, बल्कि यह समाज में सद्भावना और एकता का भी प्रतीक है। जलाशय कभी किसी धर्म, जाति या वर्ग को देखकर पानी नहीं देते; वे सभी के लिए समान रूप से खुले होते हैं। यह समाज को जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
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सनातन परंपरा में गंगा जल की पवित्रता से लेकर कुरान, बाइबल और अन्य धर्मग्रंथों में जल को संजीवनी के रूप में देखा गया है। हमारे देश में जल का विश्वविद्यालय नहीं है, जबकि इसकी सख्त जरूरत है। हमें गांव-गांव में जल पाठशालाएं लगाकर लोगों को जल के संरक्षण और इसके महत्व के प्रति जागरूक करना चाहिए। उक्त विचार जल योद्धा के रूप में प्रसिद्ध पर्यावरणविद पद्मश्री उमाशंकर पांडेय ने भारतीय ज्ञानपीठ (माधव नगर) में कर्मयोगी स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ की प्रेरणा एवं पद्मभूषण डॉ. शिवमंगल 'सुमन' की स्मृति में आयोजित 22वीं अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के प्रमुख वक्ता के रूप में व्यक्त किए।
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विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए पद्मश्री पांडेय ने कहा कि जल न केवल सजीवों को जोड़ता है, बल्कि निर्जीव वस्तुओं को भी एक सूत्र में बांधता है। ईंट, चूना, पत्थर के साथ मकान का जोड़ तब तक मजबूत नहीं हो सकता, जब तक उसमें जल का उपयोग न हो। पानी में यह शक्ति है कि वह हर वस्तु को जोड़ता और सहेजता है। यही कारण है कि इसे जीवन का आधार कहा गया है।
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समारोह की अध्यक्षता करते हुए माधव विज्ञान महाविद्यालय, उज्जैन के प्राचार्य डॉ. हरिश व्यास ने कहा कि हमारे जीवन के पांच मुख्य तत्वों में जल का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। एक ओर हम लगातार सीमेंट की सड़कों का निर्माण कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई सौ फीट गहरे बोरवेल खोदने को अपनी शान समझते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि पृथ्वी के अंदर जल जाने के सारे रास्ते हम बंद करते जा रहे हैं और पृथ्वी के अंदर के बचे हुए जल को हम पृथ्वी की छाती में छेद करके निकालते जा रहे हैं। तो फिर यह सवाल उठता है कि अंततः यह जल स्तर बचेगा कैसे...?
डॉ. व्यास ने कहा कि विज्ञान के अनुसार, कोई भी पदार्थ अपना स्वरूप बदल सकता है, वह समाप्त नहीं होता। पानी भी विद्यमान रहेगा, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह पानी पीने योग्य रहेगा? यदि हम जल के संरक्षण की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं करते तो पानी का स्तर घटने से इसका स्वरूप बदल सकता है। आजकल हम औद्योगिकरण की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन, क्या हम जल को बचाने की दिशा में भी उतने ही प्रयास कर रहे हैं? प्रकृति ने हमें जल मुफ्त में दिया, लेकिन अब हम इसे व्यावसायिक बना चुके हैं। पानी को अब हम खरीदते और बेचते हैं।
डॉ. व्यास ने कहा कि मालवा क्षेत्र में "पग-पग नीर" की कहावत कही जाती है, जो हमें पानी की महत्ता और उसकी उपलब्धता की याद दिलाती है। लेकिन क्या हम इस कहावत से दूर होते जा रहे हैं? व्याख्यानमाला के आरंभ में संस्थान की शिक्षिकाओं द्वारा सद्भावना गीतों की प्रस्तुति दी गई। वरिष्ठ शिक्षाविद दिवाकर नातु, संस्थान प्रमुख युधिष्ठिर कुलश्रेष्ठ, श्रीमती अमृता कुलश्रेष्ठ सहित संस्थान के पदाधिकारियों द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, कविकुलगुरु डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन और कर्मयोगी स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित कर दीप प्रज्वलित किया गया।
