MP News: राधा रानी विवाद, महामंडलेश्वर शैलेशानंद बोले-संत प्रेमानंदजी की बातों का गहरा संकेत समझे पंडित मिश्रा
जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर श्री शैलेशानंद महाराज ने खास बातचीत में कहा कि बिना वजह किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न करना सनातन के खिलाफ है। राष्ट्र का प्रमुख ढांचा सनातन धर्म का है, ऐसे विवादों से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। इससे जनता सिर्फ भ्रमित होती है और ऐसे विवादों का में पुरजोर विरोध करता हूं।
विस्तार
मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा और बरसाना के संत प्रेमानंद महाराज के बीच राधा रानी को लेकर एक वाक युद्ध चल रहा है। इस वाक युद्ध में पंडित प्रदीप मिश्रा द्वारा राधा रानी को लेकर कहा गया कि राधा रानी भगवान श्री कृष्ण की 1008 पटरानियों में नहीं थी, उनका विवाह रावल गांव में हुआ था। बरसाना में राधा जी के पिताजी की कचहरी थी, इसीलिए वह सिर्फ वर्ष में एक बार ही यहां आई थी। राधा रानी के बारे में इस प्रकार की बातें कहे जाने के बाद संत प्रेमानंदजी ने इन सभी बातों को झूठ बताते हुए पंडित प्रदीप मिश्रा को यहां तक कह दिया है कि राधा रानी तत्व आखिर क्या होता है? अगर, कथावाचक प्रदीप मिश्रा यह जानना चाहते हैं तो वह हमारे पास आए हम उन्हें बताएंगे कि राधा रानी आखिर क्या है और उनका साक्षात्कार आखिर कैसे होता है।
पंडित प्रदीप मिश्रा और संत प्रेमानंद के बीच चल रहे इस वाक युद्ध को लेकर जब जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर श्री शैलेशानंद महाराज से विशेष चर्चा की गई तो उनका कहना था कि बिना वजह किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न करना सनातन के खिलाफ है। राष्ट्र का प्रमुख ढांचा सनातन धर्म का है, ऐसे विवादों से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। इससे जनता सिर्फ भ्रमित होती है, ऐसे विवादों का में पुरजोर विरोध करता हूं। उन्होंने कहा कि संतों और कथाकारों कि यदि किसी विषय पर सहमति नहीं बनती है तो एक ऐसा विद्वत परिषद और सनातन बोध जैसी केंद्रीय समिति होना चाहिए जो की ज्ञान, ध्यान, सनातन और प्राकट्य के विषयों पर विद्वतजनों के साथ मिलकर कोई निर्णय ले। शंकराचार्य जी के समय में भी ऐसी व्यवस्थाएं थी।
प्रश्न: व्यासपीठ से इस प्रकार राधा जी के बारे में कहे जाने को आप क्या मानते हैं?
उत्तर: हमारे लिए जंगल में बैठे एक साधु भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने लाखों अनुयायियों वाले कथावाचक, सभी को सत्य पर चलना होगा। वर्तमान समय में किसी भी ग्रंथ को सही मानकर उसके तथ्यों पर बिना किसी विचार किए प्रस्तुत करना गलत है। आज के पूर्व भी चार वेदों की विशेष परिकल्पनाएं हैं, जिन्हें ही सबसे उच्च माना गया है। वर्तमान में सनातन धर्म का प्रचार प्रसार तो बहुत हुआ है, लेकिन यह आचरण का नहीं आवरण का विषय है। जो लोग व्याख्यान करके धार्मिक विषय की कुछ बातों को बिना विचारे प्रस्तुत करते हैं, उन्हें मर्यादित रहना चाहिए। यह उनके लिए भी ठीक रहेगा।
प्रश्न: धर्म के अंदर अतिक्रमण को आप क्या मानते हैं
उत्तर: आपने कहा कि हमारे कई ग्रंथ हैं, जिसमें पूजा विधि के बारे में विस्तृत वर्णन है। यदि, कोई इसका उल्लंघन करता है तो वह धर्म विरोधी होता है। धर्म के अंदर वर्तमान में जो अतिक्रमण हो रहा है मैं इसका पुरजोर विरोध करता हूं। लेकिन, यह विषय विवाद का नहीं बल्कि अनुसंधान का है।
प्रश्न: पंडित प्रदीप मिश्रा सही या संत प्रेमानंद जी?
उत्तर: ज्ञानमार्गी ज्ञान के आधार पर चलते हैं, कथाकार ग्रन्थों के रोचक विषयों के बारे में अपने अनुयायियों को बताते हैं और बाद में जब इस प्रकार का कोई बखेड़ा खड़ा होता है तो ऐसे ग्रन्थों को प्रस्तुत भी करते हैं। लेकिन, इस प्रकार की सस्ती लोकप्रियता हासिल करने वाले संतों को चाहिए कि वह धार्मिक विषय की इस प्रकार की बातों को जन-जन तक पहुचाने के पहले यह सोच लें कि इसके अच्छे और बुरे क्या परिणाम हो सकते हैं। संत प्रेमानंद जी महान तपस्वी हैं, जिनके पास ज्ञान के साथ तपस्या का भी बल है। उनके द्वारा कही गई बातों को सत्य माना जाता है। अगर, प्रेमानंद जी ने कोई बात कही है तो पंडित प्रदीप मिश्रा जी को इस बात का गहरा संकेत समझना चाहिए।
