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Ujjain: उद्घाटन में फीता काटने की जगह दीप जलाने की परंपरा अपनाएं', कृष्णा गुरुजी का बड़ा सुझाव
Fri, 10 Jul 2026 09:32 AM IST
आशुतोष प्रताप सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: आशुतोष प्रताप सिंह
Updated Fri, 10 Jul 2026 09:32 AM IST
सार
अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक चिंतक एवं 'कलियुग पुराण' के रचयिता कृष्णकांत मिश्रा 'कृष्णा गुरुजी' ने सार्वजनिक, सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और सरकारी संस्थानों से उद्घाटन समारोहों में फीता काटने की परंपरा की जगह दीप प्रज्ज्वलन और फीते को सम्मानपूर्वक हटाकर शुभारंभ करने की अपील की है।
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डिवाइन एस्ट्रो हीलिंग के संस्थापक कृष्णा गुरुजी।
- फोटो : social media
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विस्तार
अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक चिंतक और 'कलियुग पुराण' के रचयिता कृष्णकांत मिश्रा 'कृष्णा गुरुजी' ने देशभर के सार्वजनिक, सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और सरकारी संस्थानों से उद्घाटन समारोहों को लेकर नई पहल करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि उद्घाटन किसी नई शुरुआत का प्रतीक होता है, इसलिए इसकी शुरुआत भारतीय संस्कृति के अनुरूप दीप प्रज्ज्वलन और सकारात्मक संकल्प के साथ होनी चाहिए। उनका सुझाव है कि फीता काटने के बजाय उसे सम्मानपूर्वक दोनों ओर हटाकर शुभारंभ किया जाए।
'उद्घाटन नई संभावनाओं का आरंभ है'
कृष्णा गुरुजी ने कहा कि किसी विद्यालय, अस्पताल, मंदिर, उद्योग, कार्यालय, सड़क, पुल या जनकल्याणकारी परियोजना का उद्घाटन केवल भवन का द्वार खोलना नहीं होता, बल्कि समाज के लिए नई संभावनाओं, नई आशाओं और नए संकल्पों की शुरुआत होती है। ऐसे में उद्घाटन की परंपरा भी उसी भावना को व्यक्त करने वाली होनी चाहिए।
फीता काटने की परंपरा का बताया इतिहास
उन्होंने कहा कि इतिहासकारों के अनुसार उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में यूरोप और अमेरिका में विकसित हुई थी। इसका उद्देश्य किसी भवन, कार्यालय, दुकान, पुल या सार्वजनिक सुविधा को औपचारिक रूप से जनता के लिए खोलना था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी धर्म विशेष से जुड़ा धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक आधुनिक प्रशासनिक और औपचारिक परंपरा है, जिसे बाद में दुनिया के कई देशों ने अपनाया।
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भारतीय संस्कृति में दीप का विशेष महत्व
कृष्णा गुरुजी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में हर शुभ कार्य की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन, मंगलाचरण और शुभ संकल्प के साथ होती है। दीप केवल प्रकाश का साधन नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान, अंधकार से उजाले और निराशा से आशा की यात्रा का प्रतीक माना जाता है।
फीता काटने के बजाय सम्मानपूर्वक हटाने का सुझाव
उन्होंने कहा कि परंपराएं समय के साथ बदलती और विकसित होती हैं। यदि कोई बदलाव समाज को अधिक सकारात्मक दिशा देता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि उद्घाटन के लिए प्रतीकात्मक फीता लगाया जाए, तो उसे कैंची से काटने के बजाय सम्मानपूर्वक दोनों ओर हटाकर मार्ग खोला जाए। इससे यह संदेश जाएगा कि हम किसी चीज का अंत नहीं कर रहे, बल्कि नए अवसरों, नए विचारों और नई संभावनाओं के द्वार खोल रहे हैं।
हर उद्घाटन के साथ लिया जाए सामाजिक संकल्प
कृष्णा गुरुजी ने कहा कि हर उद्घाटन के साथ एक सामाजिक संकल्प भी जोड़ा जाना चाहिए। विद्यालय में शिक्षा का संकल्प, अस्पताल में सेवा का संकल्प, उद्योग में ईमानदारी और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प तथा सार्वजनिक परियोजनाओं में पारदर्शिता और जनसेवा का संकल्प लिया जाए। उनका कहना है कि इससे उद्घाटन केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं रहेगा, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा का माध्यम भी बनेगा।
'भारत नई सांस्कृतिक परंपरा की शुरुआत कर सकता है'
उन्होंने कहा कि भारत ने विश्व को योग, आयुर्वेद, ध्यान और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का संदेश दिया है। अब समय आ गया है कि भारत उद्घाटन की भी ऐसी सांस्कृतिक परंपरा विकसित करे, जिसमें दीप, संकल्प, सेवा और भारतीय संस्कृति का सुंदर समन्वय दिखाई दे। कृष्णा गुरुजी ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी परंपरा का विरोध करना नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप एक सकारात्मक विकल्प प्रस्तुत करना है, जिसे आने वाली पीढ़ियां भी अपनाने योग्य समझें।
'नई शुरुआत की पहचान दीप का प्रकाश बने'
अपने संदेश के अंत में कृष्णा गुरुजी ने कहा कि उद्घाटन किसी वस्तु को काटने का नहीं, बल्कि नई संभावनाओं का द्वार खोलने का प्रतीक है। उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा, "आइए, नई शुरुआत की पहचान कैंची नहीं, दीप का प्रकाश बनाएं। दीप जलाकर और फीते को सम्मानपूर्वक हटाकर नई शुरुआत करें।"
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'उद्घाटन नई संभावनाओं का आरंभ है'
कृष्णा गुरुजी ने कहा कि किसी विद्यालय, अस्पताल, मंदिर, उद्योग, कार्यालय, सड़क, पुल या जनकल्याणकारी परियोजना का उद्घाटन केवल भवन का द्वार खोलना नहीं होता, बल्कि समाज के लिए नई संभावनाओं, नई आशाओं और नए संकल्पों की शुरुआत होती है। ऐसे में उद्घाटन की परंपरा भी उसी भावना को व्यक्त करने वाली होनी चाहिए।
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फीता काटने की परंपरा का बताया इतिहास
उन्होंने कहा कि इतिहासकारों के अनुसार उद्घाटन में फीता काटने की परंपरा उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में यूरोप और अमेरिका में विकसित हुई थी। इसका उद्देश्य किसी भवन, कार्यालय, दुकान, पुल या सार्वजनिक सुविधा को औपचारिक रूप से जनता के लिए खोलना था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी धर्म विशेष से जुड़ा धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक आधुनिक प्रशासनिक और औपचारिक परंपरा है, जिसे बाद में दुनिया के कई देशों ने अपनाया।
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भारतीय संस्कृति में दीप का विशेष महत्व
कृष्णा गुरुजी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में हर शुभ कार्य की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन, मंगलाचरण और शुभ संकल्प के साथ होती है। दीप केवल प्रकाश का साधन नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान, अंधकार से उजाले और निराशा से आशा की यात्रा का प्रतीक माना जाता है।
फीता काटने के बजाय सम्मानपूर्वक हटाने का सुझाव
उन्होंने कहा कि परंपराएं समय के साथ बदलती और विकसित होती हैं। यदि कोई बदलाव समाज को अधिक सकारात्मक दिशा देता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि उद्घाटन के लिए प्रतीकात्मक फीता लगाया जाए, तो उसे कैंची से काटने के बजाय सम्मानपूर्वक दोनों ओर हटाकर मार्ग खोला जाए। इससे यह संदेश जाएगा कि हम किसी चीज का अंत नहीं कर रहे, बल्कि नए अवसरों, नए विचारों और नई संभावनाओं के द्वार खोल रहे हैं।
हर उद्घाटन के साथ लिया जाए सामाजिक संकल्प
कृष्णा गुरुजी ने कहा कि हर उद्घाटन के साथ एक सामाजिक संकल्प भी जोड़ा जाना चाहिए। विद्यालय में शिक्षा का संकल्प, अस्पताल में सेवा का संकल्प, उद्योग में ईमानदारी और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प तथा सार्वजनिक परियोजनाओं में पारदर्शिता और जनसेवा का संकल्प लिया जाए। उनका कहना है कि इससे उद्घाटन केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं रहेगा, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा का माध्यम भी बनेगा।
'भारत नई सांस्कृतिक परंपरा की शुरुआत कर सकता है'
उन्होंने कहा कि भारत ने विश्व को योग, आयुर्वेद, ध्यान और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का संदेश दिया है। अब समय आ गया है कि भारत उद्घाटन की भी ऐसी सांस्कृतिक परंपरा विकसित करे, जिसमें दीप, संकल्प, सेवा और भारतीय संस्कृति का सुंदर समन्वय दिखाई दे। कृष्णा गुरुजी ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी परंपरा का विरोध करना नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप एक सकारात्मक विकल्प प्रस्तुत करना है, जिसे आने वाली पीढ़ियां भी अपनाने योग्य समझें।
'नई शुरुआत की पहचान दीप का प्रकाश बने'
अपने संदेश के अंत में कृष्णा गुरुजी ने कहा कि उद्घाटन किसी वस्तु को काटने का नहीं, बल्कि नई संभावनाओं का द्वार खोलने का प्रतीक है। उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा, "आइए, नई शुरुआत की पहचान कैंची नहीं, दीप का प्रकाश बनाएं। दीप जलाकर और फीते को सम्मानपूर्वक हटाकर नई शुरुआत करें।"
