{"_id":"67a760ce6844baed26085779","slug":"three-day-holy-river-festival-concludes-in-maihar-2025-02-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"MP News: महेश्वर में तीन दिवसीय पवित्र नदी महोत्सव का समापन, मैहर के बैंड-वायलिन वादन ने मन मोहा; जानें","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
MP News: महेश्वर में तीन दिवसीय पवित्र नदी महोत्सव का समापन, मैहर के बैंड-वायलिन वादन ने मन मोहा; जानें
Sat, 08 Feb 2025 07:20 PM IST
शबाहत हुसैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, महेश्वर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, महेश्वर
Published by: शबाहत हुसैन
Updated Sat, 08 Feb 2025 07:20 PM IST
सार
MP News: तीन दिवसीय कार्यक्रम के समापन पर सभी संगीत कलाकारों को देवी श्री अहिल्याबाई होलकर मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष शिवाजी राव होलकर एवं अहिल्या कोर्ट महेश्वर के डायरेक्टर युवराज यशवंत राव होलकर द्वारा अंग वस्त्र एवं दुपट्टा भेंट कर सम्मानित किया गया।
विज्ञापन
पवित्र नदी महोत्सव
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
मैहर के बैंड एवं वायलिन वादक के साथ महेश्वर में तीन दिवसीय पवित्र नदी महोत्सव का समापन हो गया। नदी उत्सव का प्रारंभ 22 वर्ष पहले होल्कर परिवार ने किया था, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत और दुनिया भर के कलाकारों को महेश्वर वासियों तथा आगंतुकों के लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत और जीवन से जुड़े वाद्य गायन व नृत्य प्रदर्शन कलाओं को अंतरंग व प्रेरणादायक रूप में प्रस्तुत करना है।
देवस्थलों से सुसज्जित छतरियां और किले की दीवारें बेजोड़ ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक धरोहर हैं। ऐसे शांत माहौल में कलाकारों की प्रस्तुतियां जीवंत हो उठती हैं। संस्थापक प्रिंस रिचर्ड होल्कर का कथन है कि पारंपरिक संगीत और नृत्य से लेकर समकालीन व्याख्याओं तक उत्कृष्ट प्रदर्शन, मानस पटल पर संस्कृति एवं संगीत का अनूठा प्रभाव छोड़ता है। शनिवार शाम को मैहर बैंड एवं वायलिन वादन के साथ तीन दिवसीय पवित्र नदी महोत्सव का समापन हुआ। अंतिम दिन डॉ. अशोक बाड़ोलिया और उनके साथी कलाकारों ने प्रसिद्ध मैहर बैंड की प्रस्तुति दी।
डॉ. बाड़ोलिया ने बताया कि प्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब ने 1918 में मैहर रियासत के तत्कालीन राजा बृजनाथ सिंह जूदेव की प्रेरणा से मैहर वाद्य वृंद की स्थापना की थी। भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को कायम रखने में इस वाद्य वृंद की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
विज्ञापन
स्थापना काल से अब तक मैहर वाद्य वृंद अपनी अनूठी और गौरवशाली परंपरा का निर्वाह कर रहा है। उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों के अलावा दुर्लभ वाद्य यंत्रों को भी इस वाद्य वृंद में शामिल किया था, जिसमें नलतरंग प्रमुख है। नलतरंग, बंदूक की नलियों को काटकर स्वरबद्ध कर एक नए शास्त्रीय वाद्य के रूप में निर्मित किया गया था, जो पूरी दुनिया में अपने तरह का एकमात्र शास्त्रीय वाद्य माना जाता है।
मैहर वाद्य वृंद में सितार, इसराज, सरोद, वायलिन, चेलो, बैंजो, नलतरंग, हारमोनियम और तबला आदि वाद्य शामिल हैं। इन वाद्यों के लिए उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब ने अलग-अलग रागों पर आधारित अनेक रचनाएँ तैयार की थीं। डॉ. बाड़ोलिया बचपन से ही इस विधा में सक्रिय हैं और यह उनकी दूसरी पीढ़ी है। इस वाद्य वृंद में 11 कलाकार विभिन्न वाद्य यंत्र बजाते हैं। बाड़ोलिया ने कार्यक्रम की शुरुआत राग सिंदूरा काफी से की। साथ ही मार्च पास्ट के साथ निमाड़ी धुन भी प्रस्तुत की, जिसने श्रोताओं का मन मोह लिया। उनकी प्रस्तुतियों का समापन बागेश्वरी कन्हड़ा नहान से हुआ।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में प्रसिद्ध वायलिन वादिका अनुप्रिया देवताले ने वायलिन वादन प्रस्तुत किया। उनका वादन हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत पर आधारित था। अनुप्रिया जी ने सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान एवं पंडित रामनारायण जी से संगीत सीखा है। वे बचपन से ही इस विधा से जुड़ी हुई हैं।
उनके साथी कलाकारों में तबले पर पंडित गंधार राजहंस और तानपुरे पर शुभम तिवारी मौजूद रहे। उन्होंने भीम पलासी आलाप बजाया और अपनी स्वयं की रचित प्रायोगिक संगीत रचना भी प्रस्तुत की। अनुप्रिया अब तक लगभग 40 देशों में प्रस्तुति दे चुकी हैं। उन्हें पाकिस्तान के सबसे प्रतिष्ठित उस्ताद सलामत अली खान एवं नजाकत अली खान अवार्ड से सम्मानित किया गया है, जो अब तक किसी अन्य हिंदुस्तानी कलाकार को प्राप्त नहीं हुआ।
विज्ञापन
देवस्थलों से सुसज्जित छतरियां और किले की दीवारें बेजोड़ ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक धरोहर हैं। ऐसे शांत माहौल में कलाकारों की प्रस्तुतियां जीवंत हो उठती हैं। संस्थापक प्रिंस रिचर्ड होल्कर का कथन है कि पारंपरिक संगीत और नृत्य से लेकर समकालीन व्याख्याओं तक उत्कृष्ट प्रदर्शन, मानस पटल पर संस्कृति एवं संगीत का अनूठा प्रभाव छोड़ता है। शनिवार शाम को मैहर बैंड एवं वायलिन वादन के साथ तीन दिवसीय पवित्र नदी महोत्सव का समापन हुआ। अंतिम दिन डॉ. अशोक बाड़ोलिया और उनके साथी कलाकारों ने प्रसिद्ध मैहर बैंड की प्रस्तुति दी।
विज्ञापन
डॉ. बाड़ोलिया ने बताया कि प्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब ने 1918 में मैहर रियासत के तत्कालीन राजा बृजनाथ सिंह जूदेव की प्रेरणा से मैहर वाद्य वृंद की स्थापना की थी। भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को कायम रखने में इस वाद्य वृंद की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
विज्ञापन
स्थापना काल से अब तक मैहर वाद्य वृंद अपनी अनूठी और गौरवशाली परंपरा का निर्वाह कर रहा है। उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों के अलावा दुर्लभ वाद्य यंत्रों को भी इस वाद्य वृंद में शामिल किया था, जिसमें नलतरंग प्रमुख है। नलतरंग, बंदूक की नलियों को काटकर स्वरबद्ध कर एक नए शास्त्रीय वाद्य के रूप में निर्मित किया गया था, जो पूरी दुनिया में अपने तरह का एकमात्र शास्त्रीय वाद्य माना जाता है।
मैहर वाद्य वृंद में सितार, इसराज, सरोद, वायलिन, चेलो, बैंजो, नलतरंग, हारमोनियम और तबला आदि वाद्य शामिल हैं। इन वाद्यों के लिए उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब ने अलग-अलग रागों पर आधारित अनेक रचनाएँ तैयार की थीं। डॉ. बाड़ोलिया बचपन से ही इस विधा में सक्रिय हैं और यह उनकी दूसरी पीढ़ी है। इस वाद्य वृंद में 11 कलाकार विभिन्न वाद्य यंत्र बजाते हैं। बाड़ोलिया ने कार्यक्रम की शुरुआत राग सिंदूरा काफी से की। साथ ही मार्च पास्ट के साथ निमाड़ी धुन भी प्रस्तुत की, जिसने श्रोताओं का मन मोह लिया। उनकी प्रस्तुतियों का समापन बागेश्वरी कन्हड़ा नहान से हुआ।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में प्रसिद्ध वायलिन वादिका अनुप्रिया देवताले ने वायलिन वादन प्रस्तुत किया। उनका वादन हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत पर आधारित था। अनुप्रिया जी ने सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान एवं पंडित रामनारायण जी से संगीत सीखा है। वे बचपन से ही इस विधा से जुड़ी हुई हैं।
उनके साथी कलाकारों में तबले पर पंडित गंधार राजहंस और तानपुरे पर शुभम तिवारी मौजूद रहे। उन्होंने भीम पलासी आलाप बजाया और अपनी स्वयं की रचित प्रायोगिक संगीत रचना भी प्रस्तुत की। अनुप्रिया अब तक लगभग 40 देशों में प्रस्तुति दे चुकी हैं। उन्हें पाकिस्तान के सबसे प्रतिष्ठित उस्ताद सलामत अली खान एवं नजाकत अली खान अवार्ड से सम्मानित किया गया है, जो अब तक किसी अन्य हिंदुस्तानी कलाकार को प्राप्त नहीं हुआ।
