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जीत की मुराद लिए महाकाल के दरबार पहुंचे 'महारथी'

Mon, 11 Nov 2013 12:14 AM IST
हरीश लखेड़ा/अमर उजाला, उज्जैन
हरीश लखेड़ा/अमर उजाला, उज्जैन Updated Mon, 11 Nov 2013 12:14 AM IST
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shivraj singh and jyotiraditya scindia in mahakal temple

भगवान भोलेनाथ के 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक महाकालेश्वर के दर्शन करने देश दुनिया से तो श्रद्धालु आते ही रहते हैं, लेकिन चुनावी मौसम में इस बार यहां कुछ ज्यादा ही ‘नेताजी’ दिखाई दिए हैं।

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मध्य प्रदेश के चुनावी महाभारत में भाजपा और कांग्रेस, दोनों के महारथी भी महाकाल के दरबार में माथा टेक चुके हैं। पहले महारथी हैं भाजपा से प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, जो खुद के लिए मामा कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं।
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दूसरे हैं, ग्वालियर रियासत के श्रीमंत व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार ज्योतिरादित्य सिंधिया, जिन्हें महाराज कहकर पुकारा जाता है।
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चुनावी जंग में कूदने से पहले दोनों ही महाकाल के दरबार में मन्नत मांगने आ चुके हैं। महाकालेश्वर धाम को मामा अपने लिए बहुत शुभ मानते हैं।

यही वजह है कि चुनावी बिगुल बजाने से ठीक पहले जनता दरबार पहुंचे मामा ने अपनी जन आशीर्वाद यात्रा का शुभारंभ महाकाल मंदिर से ही किया।

मामा ने 2008 के विधानसभा चुनाव से पहले महाकाल मंदिर से ही अपनी जन दर्शन यात्रा शुरू की थी। तब उन्हें प्रदेश का तख्तोताज दोबारा मिल गया, इसलिए अब हैट्रिक बनाने की मन्नत लेकर मामा ने यहां से चुनावी बिगुल फूंका।

यहां मंदिर से कुछ दूरी पर मामा का एक बहुत बड़ा होर्डिंग भी लगा है, जिसमें वे अकेले हैं और अपने एक दशक के शासन की उपलब्धियों पर फिर से समर्थन मांग रहे हैं।

दूसरी तरफ ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए भी महाकालेश्वर उनके पुरखों के जमाने से महत्वपूर्ण रहा है। उज्जैन कभी सिंधिया रियासत का हिस्सा रहा है। इसलिए हर साल जब श्रावण माह में उज्जैन में महाकालेश्वर की यात्रा निकलती है तो आखिरी शाही यात्रा में सिंधिया भी आते हैं। वे इसके बाद भी महाकाल के दरबार में हाजिरी दे चुके हैं।

ये दो महारथी ही नहीं बल्कि प्रदेश के ज्यादातर नेता चुनाव मैदान में कूदने से पहले मंदिरों के इस शहर में मनौती मांगने आ चुके हैं। मंदिर प्रशासन के कर्मचारी बताते हैं कि जब तक चुनाव प्रचार तेज नहीं हुआ था, मंदिरों के इस शहर में रोजाना यहां कोई न कोई वीआईपी आता रहा है।

शिवराज सिंह चौहान को मिली सफलता के बाद नेताओं का महाकाल पर विश्वास और बढ़ गया। वैसे भी शिवराज को अपने एक दशक के शासन की उपलब्धियों का बखान करने और दूसरे को अपनी युवा छवि पेश करने के बावजूद भोले की शरण में आना पड़ा है।


बहरहाल, अब सोमवार को नामांकन पत्र वापस लेने का अंतिम दिन है और इसके साथ ही भाजपा और कांग्रेस चुनावी जंग फतह करने के लिए पूरी ताकत झोंक देंगे। अभी तो दोनों ही दल बागियों को मनाने में जुटे हैं। कांग्रेस की तुलना में भाजपा में ज्यादा बगावत है।

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