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MP News : भावांतर की कागजी राहत पर किसानों ने जाहिर की मायूसी, खड़े किए सवाल; आखिर क्यों कम हैं दाम?
Wed, 08 Oct 2025 06:44 PM IST
सीहोर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
Published by: सीहोर ब्यूरो
Updated Wed, 08 Oct 2025 06:44 PM IST
सार
मध्य प्रदेश में भावांतर योजना किसानों के लिए राहत की बजाय परेशानी बनती जा रही है। वहीं सरकार इस योजना को किसानों के हित बता रही है।
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सोयाबीन किसानों ने निकाली ट्रैक्टर रैली, योजना पर जताया भरोसा नहीं।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मध्य प्रदेश की बहुचर्चित भावांतर योजना किसानों के लिए राहत का विषय बनने के बजाय परेशानी का कारण बनती जा रही है। हजारों किसान अब भी इसके खिलाफ विरोध दर्ज करा रहे हैं। वहीं सरकार के अनुसार, यह योजना किसानों को मंडी के मॉडल रेट और समर्थन मूल्य के बीच का अंतर देने के लिए है। दीपावली नजदीक है। इस वजह से किसान और ज्यादा चिंतित हैं। उनको फसल के सही दाम मिलने की उम्मीद कम है क्योंकि बारिश ने भी फसल की गुणवत्ता पर असर डाला है।
पंजीयन की रफ्तार बेहद धीमी, प्रशासन भी चिंतित
सिहोर जिले में कुल 3,13,000 हेक्टेयर में सोयाबीन की बुवाई हुई है, लेकिन अब तक केवल 26,936 हेक्टेयर की फसल का पंजीयन हुआ है। यानी करीब 10% ही किसान योजना में शामिल हुए हैं। प्रशासन के पास 17 अक्तूबर तक का समय है, लेकिन किसान योजना से दूरी बनाए हुए हैं। कृषि विभाग के अधिकारी उम्मीद जता रहे हैं कि अंतिम तिथि तक पंजीयन में तेजी आएगी, लेकिन किसानों की अनिच्छा उन्हें बेचैन कर रही है।
मंडी में भाव गिरे, किसान हुए मायूस
सोयाबीन की मंडियों में लंबी कतारें हैं, लेकिन भाव बेहद कम मिल रहे हैं। 3,500 से 4,200 रुपए प्रति क्विंटल मिलने से किसान मायूस हैं। समर्थन मूल्य 5,328 रुपए प्रति क्विंटल तय होने के बावजूद उन्हें इसका लाभ नहीं मिल रहा। व्यापारियों का कहना है कि लगातार बारिश से क्वॉलिटी खराब हो गई है, दाने काले पड़ गए हैं और नमी अधिक है।
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त्योहारों की मजबूरी, भावांतर से पहले ही बेच रहे उपज
सरकार ने घोषणा की है कि 24 अक्टूबर से खरीदी गई उपज पर ही योजना का लाभ मिलेगा। लेकिन किसानों की जेब खाली है और दीपावली नज़दीक। इसलिए अधिकतर किसान त्योहार के खर्चों के लिए अभी ही उपज बेचने को मजबूर हैं। इसका अर्थ यह है कि वे योजना के लाभ से वंचित रहेंगे। किसान कहते हैं कि त्योहार मनाने के लिए पैसा चाहिए, योजना की रकम कब आएगी कौन जाने।
सरकार के प्रयास, पर जनता में भरोसा नहीं
कृषि विभाग और प्रशासन गांव-गांव जाकर चौपालों के माध्यम से किसानों को योजना समझाने की कोशिश कर रहे हैं। हेल्प डेस्क बनाई गई, रैलियां और जागरूकता कार्यक्रम चल रहे हैं। वहीं, किसान गजराज सिंह भेरूंदा और खरसानिया के ओमप्रकाश विश्वकर्मा कहते हैं कि भावांतर योजना में पारदर्शिता नहीं है, क्योंकि अब तक मॉडल रेट तय नहीं किए गए। जब अंतर की राशि तय ही नहीं, तो हमें क्या मिलेगा? सरकार समझाने में लगी है, लेकिन भरोसे की दीवार धीरे-धीरे दरक रही है।
किसानों के पुराने बीमा राशि का ही भुगतान नहीं हो रहा
चंदेरी एमएस मेवाडा और प्रतीम मेवाड़ा कहते हैं कि सितंबर और अक्टूबर में हुई अतिवृष्टि ने फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। खेतों में पानी भर गया, फलियों में नमी बढ़ी और बीज काले पड़ गए। कई किसानों को एक एकड़ से मात्र 2 से 3 क्विंटल ही उपज मिली है। इसके बाद भी किसानों को सोयाबीन के भाव नहीं मिल रहे हैं। सरकार का कोई ध्यान नहीं है। किसानों के पुराने बीमा राशि का ही भुगतान नहीं हो रहा है।
छिदगांव के किसान विष्णु प्रसाद कहते हैं कि सोयाबीन में काफी नुकसान के बाद भी जब मंडी में भी उम्मीद के भाव नहीं मिले, तो किसानों की आंखों में निराशा और होठों पर बस यही सवाल रह गया हमारा पसीना आखिर किस कीमत पर बिकेगा?
बारिश से डूबा सोयाबीन का सपना
इस साल मानसून ने किसानों के साथ धोखा किया। सितंबर और अक्टूबर में हुई अतिवृष्टि ने फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया। खेतों में पानी भर गया, फलियों में नमी बढ़ गई और बीज काले पड़ गए। कई किसानों को एक एकड़ से केवल 2-3 क्विंटल उपज मिली। पिछले वर्ष की तुलना में रकबा 5-7 हजार हेक्टेयर घट गया क्योंकि किसानों ने मक्का की ओर रुख किया।
ये भी पढ़ें- कफ सिरप कांड: तीन और मासूमों की गई जान, MP में अब तक 20 बच्चों की मौत; 'कोल्ड्रिफ' के मालिक होंगे गिरफ्तार
योजना का उद्देश्य
भावांतर योजना का उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना था, लेकिन हकीकत में किसान भ्रमित और निराश दिख रहे हैं। जिस योजना को आर्थिक सुरक्षा कवच कहा गया था, वही अब संदेह और चिंता का कारण बन गई है। खेतों में लहलहाती फसलें अब चिंता के साए में हैं। किसान इंतजार कर रहे हैं कि या तो भाव मिले, या सरकार उनका दर्द समझे।
कृषि विभाग के डीडीए अशोक उपाध्याय का कहना है कि भावांतर योजना किसानों के लिए हितकारी है। अभी करीब 10 दिन का समय पंजीयन के लिए है और किसान लगातार योजना में पंजीयन कर रहे हैं।
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पंजीयन की रफ्तार बेहद धीमी, प्रशासन भी चिंतित
सिहोर जिले में कुल 3,13,000 हेक्टेयर में सोयाबीन की बुवाई हुई है, लेकिन अब तक केवल 26,936 हेक्टेयर की फसल का पंजीयन हुआ है। यानी करीब 10% ही किसान योजना में शामिल हुए हैं। प्रशासन के पास 17 अक्तूबर तक का समय है, लेकिन किसान योजना से दूरी बनाए हुए हैं। कृषि विभाग के अधिकारी उम्मीद जता रहे हैं कि अंतिम तिथि तक पंजीयन में तेजी आएगी, लेकिन किसानों की अनिच्छा उन्हें बेचैन कर रही है।
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मंडी में भाव गिरे, किसान हुए मायूस
सोयाबीन की मंडियों में लंबी कतारें हैं, लेकिन भाव बेहद कम मिल रहे हैं। 3,500 से 4,200 रुपए प्रति क्विंटल मिलने से किसान मायूस हैं। समर्थन मूल्य 5,328 रुपए प्रति क्विंटल तय होने के बावजूद उन्हें इसका लाभ नहीं मिल रहा। व्यापारियों का कहना है कि लगातार बारिश से क्वॉलिटी खराब हो गई है, दाने काले पड़ गए हैं और नमी अधिक है।
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त्योहारों की मजबूरी, भावांतर से पहले ही बेच रहे उपज
सरकार ने घोषणा की है कि 24 अक्टूबर से खरीदी गई उपज पर ही योजना का लाभ मिलेगा। लेकिन किसानों की जेब खाली है और दीपावली नज़दीक। इसलिए अधिकतर किसान त्योहार के खर्चों के लिए अभी ही उपज बेचने को मजबूर हैं। इसका अर्थ यह है कि वे योजना के लाभ से वंचित रहेंगे। किसान कहते हैं कि त्योहार मनाने के लिए पैसा चाहिए, योजना की रकम कब आएगी कौन जाने।
सरकार के प्रयास, पर जनता में भरोसा नहीं
कृषि विभाग और प्रशासन गांव-गांव जाकर चौपालों के माध्यम से किसानों को योजना समझाने की कोशिश कर रहे हैं। हेल्प डेस्क बनाई गई, रैलियां और जागरूकता कार्यक्रम चल रहे हैं। वहीं, किसान गजराज सिंह भेरूंदा और खरसानिया के ओमप्रकाश विश्वकर्मा कहते हैं कि भावांतर योजना में पारदर्शिता नहीं है, क्योंकि अब तक मॉडल रेट तय नहीं किए गए। जब अंतर की राशि तय ही नहीं, तो हमें क्या मिलेगा? सरकार समझाने में लगी है, लेकिन भरोसे की दीवार धीरे-धीरे दरक रही है।
किसानों के पुराने बीमा राशि का ही भुगतान नहीं हो रहा
चंदेरी एमएस मेवाडा और प्रतीम मेवाड़ा कहते हैं कि सितंबर और अक्टूबर में हुई अतिवृष्टि ने फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। खेतों में पानी भर गया, फलियों में नमी बढ़ी और बीज काले पड़ गए। कई किसानों को एक एकड़ से मात्र 2 से 3 क्विंटल ही उपज मिली है। इसके बाद भी किसानों को सोयाबीन के भाव नहीं मिल रहे हैं। सरकार का कोई ध्यान नहीं है। किसानों के पुराने बीमा राशि का ही भुगतान नहीं हो रहा है।
छिदगांव के किसान विष्णु प्रसाद कहते हैं कि सोयाबीन में काफी नुकसान के बाद भी जब मंडी में भी उम्मीद के भाव नहीं मिले, तो किसानों की आंखों में निराशा और होठों पर बस यही सवाल रह गया हमारा पसीना आखिर किस कीमत पर बिकेगा?
बारिश से डूबा सोयाबीन का सपना
इस साल मानसून ने किसानों के साथ धोखा किया। सितंबर और अक्टूबर में हुई अतिवृष्टि ने फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया। खेतों में पानी भर गया, फलियों में नमी बढ़ गई और बीज काले पड़ गए। कई किसानों को एक एकड़ से केवल 2-3 क्विंटल उपज मिली। पिछले वर्ष की तुलना में रकबा 5-7 हजार हेक्टेयर घट गया क्योंकि किसानों ने मक्का की ओर रुख किया।
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योजना का उद्देश्य
भावांतर योजना का उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना था, लेकिन हकीकत में किसान भ्रमित और निराश दिख रहे हैं। जिस योजना को आर्थिक सुरक्षा कवच कहा गया था, वही अब संदेह और चिंता का कारण बन गई है। खेतों में लहलहाती फसलें अब चिंता के साए में हैं। किसान इंतजार कर रहे हैं कि या तो भाव मिले, या सरकार उनका दर्द समझे।
कृषि विभाग के डीडीए अशोक उपाध्याय का कहना है कि भावांतर योजना किसानों के लिए हितकारी है। अभी करीब 10 दिन का समय पंजीयन के लिए है और किसान लगातार योजना में पंजीयन कर रहे हैं।
