{"_id":"6aacc1e3d76a8310ff0bd850","slug":"sehore-school-repair-case-two-former-beos-charged-over-rs81-lakh-irregularities-sehore-news-c-1-1-noi1381-4737577-2026-09-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"सीहोर: कागजों में मरम्मत, खाते में भुगतान? 81 लाख के स्कूल महाघोटाले में दो तत्कालीन BEO पर गिरी गाज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सीहोर: कागजों में मरम्मत, खाते में भुगतान? 81 लाख के स्कूल महाघोटाले में दो तत्कालीन BEO पर गिरी गाज
Fri, 18 Sep 2026 04:41 PM IST
सीहोर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
Published by: सीहोर ब्यूरो
Updated Fri, 18 Sep 2026 04:41 PM IST
सार
जिले में सरकारी स्कूलों की मरम्मत के नाम पर जारी करीब 81 लाख रुपए की राशि पर सवाल उठे हैं। टेंडर प्रक्रिया, काम के भौतिक सत्यापन और भुगतान में कथित अनियमितताओं को लेकर आष्टा और सीहोर के तत्कालीन दो BEO के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई है।
विज्ञापन
जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय, सीहोर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सरकारी स्कूलों की मरम्मत के नाम पर जारी 81 लाख रुपये की राशि ने शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा दिया है। टेंडर प्रक्रिया से लेकर काम के भौतिक सत्यापन और भुगतान तक सामने आई कथित वित्तीय अनियमितताओं पर लोक शिक्षण संचालनालय ने आष्टा और सीहोर के तत्कालीन दो BEO के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी है।
विज्ञापन
जांच के घेरे में 81 लाख
जानकारी के अनुसार विभाग द्वारा आष्टा विकासखंड के 11 स्कूलों के लिए 49.50 लाख रुपये और सीहोर विकासखंड के सात स्कूलों के लिए 31.50 लाख रुपये स्वीकृत किए गए थे। यानी दोनों विकासखंडों में कुल 18 स्कूलों से जुड़ी करीब 81 लाख रुपये की राशि जांच के केंद्र में है। विभागीय आरोप-पत्र के अनुसार तत्कालीन बीईओ आष्टा प्रमोद कुशवाह और तत्कालीन बीईओ सीहोर दीपा कीर ने निर्धारित टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं किया। आरोप है कि चुनिंदा फर्मों से कोटेशन लेकर कार्य आवंटित कर दिए गए। इसी नियम विरुद्ध प्रक्रिया को लेकर विभाग ने दोनों अधिकारियों से जवाब मांगा है।
विज्ञापन
आष्टा में 49.50 लाख के भुगतान पर सवाल
आष्टा के 11 स्कूलों में लोरसकलां, मैना, सामरदा, पगारिया हाट, खामखेड़ा बैजनाथ सहित अन्य स्कूल शामिल हैं। विभागीय जांच में कार्यादेश, तकनीकी प्रक्रिया और भुगतान से संबंधित कई बिंदुओं पर आपत्ति दर्ज की गई है। दस्तावेजों के अनुसार करीब 49.49 लाख रुपये का भुगतान किया गया।
विज्ञापन
इसी तरह सीहोर विकासखंड के संग्रामपुर, पीएम श्री श्यामपुर, गुडभेला, बरखेड़ी, जताखेड़ा, मोगराराम और मुस्करा स्कूलों के लिए 31.50 लाख रुपये जारी हुए थे। यहां भी खुली निविदा के बजाय कोटेशन के आधार पर काम दिए जाने और भुगतान की प्रक्रिया को लेकर विभागीय जांच बैठाई गई है।
भौतिक सत्यापन ने खोलीं परतें
लोक शिक्षण संचालनालय के निर्देश पर कराए गए भौतिक सत्यापन में कुछ स्कूलों के कार्यों की गुणवत्ता पर गंभीर टिप्पणियां सामने आईं। जांच टीम ने कुछ मामलों में कार्य को असंतोषजनक बताते हुए पुनर्मूल्यांकन की जरूरत बताई। इससे सरकारी राशि के वास्तविक उपयोग को लेकर सवाल और गहरे हो गए।
ये भी पढ़ें: एमपी में 1.04 लाख सरकारी पद खाली: जीतू पटवारी बोले- युवा प्रवचन नहीं, अपने भविष्य पर चाहते हैं जवाब
शासकीय उमावि खजूरिया कासम के संबंध में सत्यापन रिपोर्ट में भवन में मरम्मत की आवश्यकता नहीं होने की बात दर्ज की गई, जबकि करीब 4.49 लाख रुपये के भुगतान का मामला सामने आया। अब विभागीय जांच में इसी तरह के भुगतान और कार्य की वास्तविकता की पड़ताल की जा रही है। इसी तरह शासकीय उमावि मोगराराम को लेकर सत्यापन रिपोर्ट में भवन नया होने और मरम्मत की आवश्यकता नहीं होने की टिप्पणी दर्ज की गई। इसके बावजूद भुगतान किए जाने के मामले ने पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कार्य की वास्तविक मात्रा और भुगतान की दरों की भी जांच की जा रही है।
दोनों BEO से मांगा जवाब
लोक शिक्षण आयुक्त अभिषेक सिंह ने मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियमों के तहत दोनों अधिकारियों को आरोप-पत्र जारी कर लिखित जवाब मांगा है। अधिकारियों को निर्धारित अवधि में अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है। जवाब नहीं देने की स्थिति में विभागीय नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
लोक शिक्षण आयुक्त अभिषेक सिंह के अनुसार BEO पद पर रहते हुए स्कूलों की मरम्मत कराई गई थी, जिसमें टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। भुगतान से पहले भौतिक सत्यापन नहीं कराना भी वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आता है। इसी आधार पर दोनों अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा गया है।
जांच के बाद तय होगी जिम्मेदारी
फिलहाल मामला विभागीय जांच के चरण में है। आरोप-पत्र जारी होना अंतिम दोषसिद्धि नहीं है। दोनों अधिकारियों के जवाब और जांच में सामने आने वाले दस्तावेजों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी। 81 लाख रुपये की मरम्मत राशि से जुड़े इस मामले ने शिक्षा विभाग की वित्तीय निगरानी और सरकारी निर्माण कार्यों की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
