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Ganesh Chaturthi:सीहोर में मौजूद है 2000 साल पुराना चमत्कारी गणेश मंदिर,सम्राट विक्रमादित्य से जुड़ा है इतिहास
Mon, 25 Aug 2025 04:07 PM IST
सीहोर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
Published by: सीहोर ब्यूरो
Updated Mon, 25 Aug 2025 04:07 PM IST
सार
Ganesh Chaturthi 2025: सीहोर का चिंतामन गणेश मंदिर देश के चार स्वयंभू गणेश स्थलों में से एक है। यहां भगवान की प्रतिमा आधी जमीन में धंसी है। भक्त उल्टा स्वास्तिक बनाकर मन्नत मांगते हैं और पूरी होने पर सीधा स्वास्तिक बनाते हैं। मंदिर का इतिहास दो हजार वर्ष पुराना है।
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आस्था का अद्भुत केंद्र, चिंतामन गणेश मंदिर
विस्तार
मध्यप्रदेश का सीहोर जिला सिर्फ एक साधारण जगह नहीं, बल्कि आस्था का वह धाम है, जहां करोड़ों दिलों की धड़कन बसी हुई हैं। यहां स्थित चमत्कारी चिंतामन गणेश मंदिर देशभर में श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। भक्त मानते हैं कि यहां गणेशजी के दरबार में जो भी जाता है, उसकी झोली कभी खाली नहीं लौटती।
देश में सिर्फ चार स्वयंभू चिंतामन गणेश
धार्मिक मान्यता के अनुसार पूरे देश में चिंतामन सिद्ध गणेश की केवल चार ही स्वयंभू प्रतिमाएं हैं। राजस्थान के रणथंभौर, मध्यप्रदेश के उज्जैन, गुजरात के सिद्धपुर और चौथा स्थल सीहोर। इनमें से सबसे अधिक ख्याति सीहोर के चिंतामन गणेश मंदिर को मिली है। यहां की प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह जमीन में आधी धंसी हुई है, जो इसे अद्वितीय और चमत्कारी बनाती है।
विक्रमादित्य की कथा से जुड़ा इतिहास
कहा जाता है कि लगभग दो हजार वर्ष पूर्व सम्राट विक्रमादित्य सीवन नदी से कमल पुष्प लेकर रथ में लौट रहे थे। जैसे ही सुबह हुई, रथ अचानक जमीन में धंस गया और वह कमल पुष्प भगवान गणेश की प्रतिमा में परिवर्तित हो गया। प्रतिमा का आधा हिस्सा भूमि में समा गया और उसी स्थान पर राजा विक्रमादित्य ने मंदिर का निर्माण कराया। यही स्थान आज श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा धाम बन चुका है।
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श्रीयंत्र के अनुरूप बना मंदिर
इतिहासकार बताते हैं कि विक्रम संवत 155 में इस मंदिर का निर्माण श्रीयंत्र की संरचना के अनुरूप कराया गया था। बाद में बाजीराव पेशवा प्रथम, राजा भोज, कृष्ण राय और गौंड राजा नवल शाह ने इसका जीर्णोद्धार कराया। नानाजी पेशवा विठूर के समय मंदिर की ख्याति और भी बढ़ गई। समय की हर कसौटी पर यह धाम न केवल टिका रहा बल्कि इसकी महिमा दिन-ब-दिन और अधिक फैलती गई।
हीरे से जड़ी गणेश प्रतिमा की आंखें
इस मंदिर में विराजमान गणेशजी की प्रतिमा की आंखों में कभी चमचमाते हीरे जड़े हुए थे। लगभग 150 वर्ष पूर्व चोरों ने इन्हें चुरा लिया। इसके बाद एक चमत्कार हुआ। प्रतिमा की आंखों से लगातार 21 दिन तक दूध की धारा बहती रही। तब गणेशजी ने पुजारी को स्वप्न में आदेश दिया कि प्रतिमा खंडित नहीं हुई है, उनकी आंखों में चांदी के नेत्र जड़ दिए जाएं। तभी से आज तक गणेश प्रतिमा की आंखों में चांदी के नेत्र चमकते हैं।
उल्टा स्वास्तिक बनाकर पूरी होती है हर मुराद
चिंतामन गणेश मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां भक्त अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए मंदिर की दीवार पर उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं। जब उनकी इच्छा पूरी हो जाती है, तो वे पुनः यहां आकर सीधा स्वास्तिक बनाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और बिगड़े हुए काम भी संवर जाते हैं। यही कारण है कि देशभर से भक्त यहां अपनी समस्याओं का समाधान खोजने आते हैं।
सिद्धियों की भूमि
यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल ही नहीं, बल्कि सिद्धियों की भूमि भी माना जाता है। कहा जाता है कि यहां 84 सिद्धों और तपस्वियों ने साधना कर सिद्धि प्राप्त की थी। तभी से गणेशजी को चिंतामन सिद्ध गणेश के नाम से जाना जाता है। यहां की पवित्र भूमि आज भी ध्यान, साधना और मनोकामना पूर्ति का दिव्य आभास कराती है।
गणेश चतुर्दशी से भव्य मेला
हर वर्ष गणेश चतुर्दशी के अवसर पर यहां दस दिवसीय भव्य मेला आयोजित होता है। इस वर्ष यह महोत्सव 27 अगस्त से प्रारंभ होगा। दूर-दराज़ से लाखों श्रद्धालु सीहोर पहुंचेंगे और गणेश जी के दरबार में हाजिरी लगाकर अपनी मुराद मांगेंगे। पूरे परिसर में भक्ति, उत्साह और आनंद का ऐसा दृश्य होता है, मानो धरती पर स्वर्ग उतर आया हो।
ये भी पढ़ें- Ganesh Chaturthi 2025: इस बार धन वृद्धि से जुड़े विशेष योग का संयोग, गणेश चतुर्थी पर जरूर करें ये खास उपाय
भक्तों की आस्था में छिपा विश्वास
सीहोर का चिंतामन गणेश मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जीवित चमत्कार है। यहां का वातावरण, भक्तों की आस्था और प्रतिमा की दिव्य आभा हर किसी को अपने वश में कर लेती है। जिसने भी यहां आकर श्रद्धा से प्रार्थना की है, उसकी झोली भरी है। यही कारण है कि गणेशजी को यहां ‘चिंताओं को हरने वाले भगवान’ कहा जाता है।
ये भी पढ़ें- Ujjain Mahakal: वैष्णव तिलक लगाकर सजे बाबा महाकाल, भस्म आरती में हजारों श्रद्धालुओं ने किए दिव्य दर्शन
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देश में सिर्फ चार स्वयंभू चिंतामन गणेश
धार्मिक मान्यता के अनुसार पूरे देश में चिंतामन सिद्ध गणेश की केवल चार ही स्वयंभू प्रतिमाएं हैं। राजस्थान के रणथंभौर, मध्यप्रदेश के उज्जैन, गुजरात के सिद्धपुर और चौथा स्थल सीहोर। इनमें से सबसे अधिक ख्याति सीहोर के चिंतामन गणेश मंदिर को मिली है। यहां की प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह जमीन में आधी धंसी हुई है, जो इसे अद्वितीय और चमत्कारी बनाती है।
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विक्रमादित्य की कथा से जुड़ा इतिहास
कहा जाता है कि लगभग दो हजार वर्ष पूर्व सम्राट विक्रमादित्य सीवन नदी से कमल पुष्प लेकर रथ में लौट रहे थे। जैसे ही सुबह हुई, रथ अचानक जमीन में धंस गया और वह कमल पुष्प भगवान गणेश की प्रतिमा में परिवर्तित हो गया। प्रतिमा का आधा हिस्सा भूमि में समा गया और उसी स्थान पर राजा विक्रमादित्य ने मंदिर का निर्माण कराया। यही स्थान आज श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा धाम बन चुका है।
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श्रीयंत्र के अनुरूप बना मंदिर
इतिहासकार बताते हैं कि विक्रम संवत 155 में इस मंदिर का निर्माण श्रीयंत्र की संरचना के अनुरूप कराया गया था। बाद में बाजीराव पेशवा प्रथम, राजा भोज, कृष्ण राय और गौंड राजा नवल शाह ने इसका जीर्णोद्धार कराया। नानाजी पेशवा विठूर के समय मंदिर की ख्याति और भी बढ़ गई। समय की हर कसौटी पर यह धाम न केवल टिका रहा बल्कि इसकी महिमा दिन-ब-दिन और अधिक फैलती गई।
हीरे से जड़ी गणेश प्रतिमा की आंखें
इस मंदिर में विराजमान गणेशजी की प्रतिमा की आंखों में कभी चमचमाते हीरे जड़े हुए थे। लगभग 150 वर्ष पूर्व चोरों ने इन्हें चुरा लिया। इसके बाद एक चमत्कार हुआ। प्रतिमा की आंखों से लगातार 21 दिन तक दूध की धारा बहती रही। तब गणेशजी ने पुजारी को स्वप्न में आदेश दिया कि प्रतिमा खंडित नहीं हुई है, उनकी आंखों में चांदी के नेत्र जड़ दिए जाएं। तभी से आज तक गणेश प्रतिमा की आंखों में चांदी के नेत्र चमकते हैं।
उल्टा स्वास्तिक बनाकर पूरी होती है हर मुराद
चिंतामन गणेश मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां भक्त अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए मंदिर की दीवार पर उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं। जब उनकी इच्छा पूरी हो जाती है, तो वे पुनः यहां आकर सीधा स्वास्तिक बनाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और बिगड़े हुए काम भी संवर जाते हैं। यही कारण है कि देशभर से भक्त यहां अपनी समस्याओं का समाधान खोजने आते हैं।
सिद्धियों की भूमि
यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल ही नहीं, बल्कि सिद्धियों की भूमि भी माना जाता है। कहा जाता है कि यहां 84 सिद्धों और तपस्वियों ने साधना कर सिद्धि प्राप्त की थी। तभी से गणेशजी को चिंतामन सिद्ध गणेश के नाम से जाना जाता है। यहां की पवित्र भूमि आज भी ध्यान, साधना और मनोकामना पूर्ति का दिव्य आभास कराती है।
गणेश चतुर्दशी से भव्य मेला
हर वर्ष गणेश चतुर्दशी के अवसर पर यहां दस दिवसीय भव्य मेला आयोजित होता है। इस वर्ष यह महोत्सव 27 अगस्त से प्रारंभ होगा। दूर-दराज़ से लाखों श्रद्धालु सीहोर पहुंचेंगे और गणेश जी के दरबार में हाजिरी लगाकर अपनी मुराद मांगेंगे। पूरे परिसर में भक्ति, उत्साह और आनंद का ऐसा दृश्य होता है, मानो धरती पर स्वर्ग उतर आया हो।
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भक्तों की आस्था में छिपा विश्वास
सीहोर का चिंतामन गणेश मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जीवित चमत्कार है। यहां का वातावरण, भक्तों की आस्था और प्रतिमा की दिव्य आभा हर किसी को अपने वश में कर लेती है। जिसने भी यहां आकर श्रद्धा से प्रार्थना की है, उसकी झोली भरी है। यही कारण है कि गणेशजी को यहां ‘चिंताओं को हरने वाले भगवान’ कहा जाता है।
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