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मध्यप्रदेश: पूरा गांव बना दशरथ मांझी, सड़क बनाने के लिए काट दिया पहाड़

Wed, 20 Jun 2018 02:40 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सतना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सतना Updated Wed, 20 Jun 2018 02:40 PM IST
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MP padho ghati village people cut a road on hill like Dashrath Manjhi

जब भी प्यार की निशानी ताजमहल की बात करें तो शाहजहां का नाम आना लाजमी है। लेकिन हमारे देश में केवल शाहजहां ही ऐसे नहीं थे जिन्होंने अपनी पत्नी की याद में अतुल्नीय काम किया हो। बल्कि दशरथ मांझी जैसे लोग भी हैं जिन्होंने अपनी पत्नी की याद में पहाड़ी पर एक सड़क का निर्माण कर गांव और अस्पताल के बीच की दूरी को कम किया। आज उनसे दुनिया में हर कोई प्रेरणा लेना चाहता है।

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मध्य प्रदेश के सतना जिले में बसे पढ़ो घाटी गांव के लोगों ने भी दशरथ मांझी से प्रेरणा लेकर एक सड़क का निर्माण किया है। गांव के लोगों ने पहाड़ी पर एक ऐसी सड़क का निर्माण किया है जिससे गांव से नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र की दूरी 16 किमी से कम होकर 5 किमी हो गई है। इस कार्य में उन्हें एक साल से भी अधिक समय का वक्त लगा। इससे गांव की महिलाएं अब आसानी से सांस ले पा रही हैं।
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पहले सही समय पर अस्पताल ना पहुंचने के कारण कई बार महिलाओं की जान चले जाती थी लेकिन अब इस सड़क के द्वारा वह समय पर अस्पताल पहुंचने में सक्षम हो गई हैं। पहले इस गांव के लोगों को इमरजेंसी के समय अस्पताल पहुंचने में बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। जिसके चलते गर्भवती महिलाओं का प्रसव घर पर ही किया जाता था।
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इस गांव की निवासी राजकुमारी मावासी (30) इस बार सही वक्त पर मझगांव ब्लॉक के सामूहिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंच गई। जहां उसने अपने छोटे बच्चे को जन्म दिया। इस बार राजकुमारी को पहले की तरह कोई परेशानी नहीं हुई। अपने पहले बच्चों को जन्म देने के दौरान राजकुमारी के लिए पहाड़ी को पार करके जाना बेहद ही मुश्किल था।

22 सालों के परिश्रम के बाद बनाई थी इतनी लंबी सड़क

MP padho ghati village people cut a road on hill like Dashrath Manjhi

इस नए मार्ग का लाभ ना केवल पढ़ो घाटी गांव के निवासियों को हो रहा है बल्कि इसका लाभ पड़ोसी गांव रामनगर खोकला के निवासियों भी उठा रहे हैं। ये दोनों गांव अब इस नए मार्ग का प्रयोग कर रहे हैं। पहाड़ी पर बनाई गई इस सड़क का निर्माण कार्य दिसंबर 2016 में शुरू हुआ था और कार्य बीते साल दिसंबर में पूरा हुआ।

गांव के ही एक निवासी ने बताया, "इस काम को करने में एक साल से भी अधिक समय का वक्त लगा। यह एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य था, पर हम सबको पता था कि ये कई लोगों की जिंदगी बचाएगा, खासकर की उन महिलाओं की जो मां बनने वाली हैं। इस काम को खत्म करने में महिलाओं और पुरुषों दोनों ने ही कंधे से कंधे मिलाकर प्रतिदिन 8 घंटे तक काम किया।"

सड़क बनने के बाद भी एम्बुलेंस का गांव तक पहुंचना काफी मुश्किल है। इस परेशानी से बचने के लिए गांव वाले ट्रैक्टर का प्रयोग करते हैं। जब भी कोई इमरजेंसी होती है तो वे 108 नंबर पर फोन कर एंबुलेंस को पहाड़ी के दूसरी सरफ आने के लिए कहते हैं। फिर मरीज को इस मार्ग से पहाड़ी पार कर एंबुलेंस तक पहुंचाया जाता है जिससे वह स्वास्थ्य केंद्र तक आसानी से पहुंच जाती हैं।

जानकारी के लिए बता दें बिहार के गया के करीब गहलौर गांव में मजदूरी करने वाले दशरथ मांझी ने केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर अकेले ही 360 फुट लंबी 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊंचे पहाड़ को काट कर एक सड़क बनाई थी। दशरथ के 22 सालों के किए परिश्रम के बाद बनी इस सड़क से अतरी और वजीरगंज ब्लॉक की दूरी 55 किमी से कम होकर 15 किमी हो गई।  दशरथ की पत्नी की मृत्यु सही समय पर अस्पताल ना पहुंच पाने के कारण हो गई थी इसलिए उसने गांव और अस्पताल के बीच की दूरी कम करने के लिए सड़क का निर्माण किया।

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