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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   MP Election: Why does BJP lose after the announcement of elections in Pitru Paksha, what was the trend

Polls 2023: पितृ पक्ष में चुनाव के एलान का MP में कैसा रहा है ट्रेंड? पिछले चार बार के आंकड़ों से समझिए सबकुछ

Tue, 10 Oct 2023 04:52 PM IST
Rahul Sampal राहुल संपाल
Updated Tue, 10 Oct 2023 04:52 PM IST
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सार
आम तौर पर भाजपा ने कभी भी कोई शुभ काम पितृपक्ष में नहीं किया। ताज़ा उदाहरण देखें तो नई संसद में कार्यकाल भी गणेश चतुर्थी के दिन शुरू किया गया। भाजपा के बड़े नेता इस बात का ज़िक्र भी अपनी सभाओं में करते हैं। मगर इस बार तो शिवराज सरकार ने एक ही दिन में 53 हजार करोड़ रुपये की योजनाओं का लोकार्पण और भूमिपूजन एक ही दिन में कर दिया...
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MP Election: Why does BJP lose after the announcement of elections in Pitru Paksha, what was the trend
MP Election 2023 - फोटो : अमर उजाला, इंदौर

विस्तार

हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष में कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता है। चाहे नया सामान खरीदना हो या फिर घर में कोई मांगलिक कार्य, सभी श्राद्ध के बाद ही किए जाते हैं। भाजपा हमेशा से ही सनातन धर्म और संस्कृति की बात करती है। इन बातों को पार्टी अमल में भी लाती है। लेकिन पहली बार पार्टी में सब कुछ बदला हुआ नजर आ रहा है। तारीखों के एलान से पहले पार्टी सूची जारी कर रही है। केंद्रीय मंत्री-सांसदों को चुनावी मैदान में उतार रही है। वहीं श्राद्ध पक्ष में उम्मीदवारों की सूची जारी कर रही है।

क्या कहता है पिछले 4 चुनावों का ट्रेंड

2003 से लेकर 2018 के विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा और उम्मीदवारों की सूची की विस्तार से पड़ताल की, तो सामने आया कि भाजपा-कांग्रेस दोनों ने श्राद्ध में प्रत्याशियों की सूची जारी नहीं की है। लेकिन 2023 के चुनाव में यह पहला मौका है जब भाजपा ने पितृ पक्ष में अपने उम्मीदवारों के नामों का एलान किया है। लेकिन चुनाव आयोग जरूर 2023 की तरह 2018 में श्राद्ध के दौरान जरूर चुनाव की घोषणा कर चुका है। चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि आयोग को श्राद्ध पक्ष से कोई लेना देना नहीं होता है। आयोग का फोकस सिर्फ चुनाव की तैयारियों पर होता है। राज्यों में चुनाव संबंधी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं, इसलिए आयोग ने चुनाव की घोषणा कर दी।

पिछले चार विधानसभा चुनावों में आचार संहिता लगने के ट्रेंड देखें तो सामने आता है कि 2018 के चुनाव को छोड़कर बाकी के 2013, 2008 और 2003 के चुनावों की आचार संहिता श्राद्ध पक्ष के बाद लगी है। इन तीनों ही चुनावों में भाजपा को जबरदस्त जीत हासिल हुई थी। जबकि 2018 के चुनावों में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा था। अब सबकी निगाहें एक बार फिर 2023 के चुनाव पर हैं। क्योंकि 2018 की तरह इस बार भी आचार संहिता श्राद्ध पक्ष (9 अक्टूबर) में लगी है। इस साल 29 सितंबर से शुरू हुआ पितृपक्ष 14 अक्तूबर तक चलेगा। राज्य में मतदान 17 नवंबर को होगा। जबकि मतगणना 3 दिसंबर को होगी।

2018: श्राद्ध में घोषणा, भाजपा के हाथ से चली गई सरकार

साल 2018 में पितृपक्ष 25 सितंबर से लेकर 9 अक्तूबर तक था। इस दौरान चुनाव आयोग ने तारीखों का एलान 6 अक्तूबर को किया था। 28 नवंबर को राज्य में मतदान हुआ। भाजपा ने अपने 2 नवंबर को 177 उम्मीदवारों की सूची जारी की थी। इसमें सीएम शिवराज सिंह चौहान समेत कई कद्दावर मंत्री थे। जबकि कांग्रेस 3 नवंबर को 155 उम्मीदवारों की सूची जारी की थी। परिणामों में भाजपा को 109, कांग्रेस को 114 अन्य को 7 सीटें मिली थीं। कमलनाथ राज्य के नए मुख्यमंत्री बने, लेकिन 15 माह बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायक भाजपा में शामिल हो गए। राज्य में फिर शिवराज सीएम बने।

2013: पितृपक्ष के आखिरी दिन घोषणा, भाजपा को मिली जीत

2013 में पितृपक्ष 19 सितंबर 2013 से 4 अक्तूबर तक था। इस दौरान चुनाव आयोग ने चुनाव की तारीखों का एलान चार अक्तूबर को किया था। जबकि भाजपा ने पहली सूची 31 अक्तूबर और कांग्रेस ने पहली सूची 1 नवंबर को जारी की थी। चुनाव में भाजपा को 165 सीट, कांग्रेस को 58 और अन्य को 7 सीट हासिल हुई थीं। आयोग ने पितृपक्ष के आखिरी दिन चुनाव की घोषणा की थी। चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी।

2008: श्राद्ध पक्ष के बाद घोषणा, भाजपा ने जीती 143 सीटें

2008 में श्राद्ध पक्ष 15 सितंबर से 29 सितंबर 2008 तक था। चुनाव आयोग ने तारीखों की घोषणा 14 अक्तूबर को की थी। भाजपा ने पहली सूची 3 नवंबर और कांग्रेस ने पहली सूची 15 अक्तूबर 2008 को जारी की थी। भाजपा ने इस चुनाव में 143 सीट जीती थी। इन चुनावों में उमा भारती ने भाजपा से अलग होकर भारतीय जनशक्ति पार्टी बनाई थी। प्रहलाद पटेल, रघुनंदन शर्मा जैसे नेता उमा के दल में शामिल हुए थे। इसके बाद भी भाजपा को जीत हासिल हुई।

2003: पितृ पक्ष के बाद घोषणा, भाजपा को मिली सत्ता

2003 में पितृ पक्ष 10 सितंबर से 25 सितंबर 2003 तक था। चुनाव आयोग ने तारीखों की घोषणा अक्तूबर के पहले सप्ताह में की थी। भाजपा की पहली सूची 20 अक्तूबर, जबकि कांग्रेस की पहली सूची 17 अक्तूबर 2003 को आई थी। राज्य में मतदान 27 नवंबर को मतदान हुआ था। 2003 में भाजपा को सबसे ज्यादा 173, कांग्रेस को 38, सपा को 7, बसपा को दो और अन्य दलों को 11 सीट हासिल हुई थी। 2003 का चुनाव छत्तीसगढ़ अलग होने के बाद पहला चुनाव था।

नवरात्र में आएगा पार्टी का घोषणा पत्र

पितृपक्ष के चलते ही भाजपा ने घोषणा पत्र को टाल दिया है। पहले पार्टी की ये तैयारी थी कि चुनाव की घोषणा होने के 48 घंटे बाद ही घोषणा पत्र का एलान किया जाएगा, लेकिन ज्योतिषियों की राय पर पार्टी ने ये फैसला आगे बढ़ा लिया है। संभवतया अब भाजपा नवरात्र में ही पार्टी का घोषणा पत्र जारी करेगी। नवरात्र में घोषणा पत्र जारी करने को भी पार्टी एक बड़ा इवेंट बना सकती है। इसमें भाजपा ये बताएगी कि कैसे उनकी सरकार ने महिलाओं और बेटियों की बेहतरी के लिए काम किया है।

आम तौर पर भाजपा ने कभी भी कोई शुभ काम पितृपक्ष में नहीं किया। ताज़ा उदाहरण देखें तो नई संसद में कार्यकाल भी गणेश चतुर्थी के दिन शुरू किया गया। भाजपा के बड़े नेता इस बात का ज़िक्र भी अपनी सभाओं में करते हैं। मगर इस बार तो शिवराज सरकार ने एक ही दिन में 53 हजार करोड़ रुपये की योजनाओं का लोकार्पण और भूमिपूजन एक ही दिन में कर दिया। इसे लेकर भाजपा के पास कोई खास जवाब भी नहीं था। यहां तक कि महाकाल कॉरिडोर दो का उद्घाटन भी हो गया।

पितृपक्ष के बाद आएगी कांग्रेस की लिस्ट!

कांग्रेस ने अब तक अपने उम्मीदवारों को कोई लिस्ट जारी नहीं की है। हालांकि कहा जा रहा है कि कांग्रेस की सूची तैयार है। लेकिन पितृपक्ष के कारण जारी नहीं हो रही है। जैसे ही पितृ पक्ष खत्म होंगे और नवरात्रि का पर्व शुरू होगा, कांग्रेस अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर देगी।

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