MP election: नर्मदापुरम में कोई जीते कोई हारे...विधायकी तो शर्मा जी के घर में ही रहेगी!
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
सुबह के दस बज रहे हैं। चटक धूप निकल चुकी है। नर्मदापुरम के बीच शहर में बने नेहरू पार्क के सामने भारतीय जनता पार्टी की रैली निकल रही है। जैसे भारतीय जनता पार्टी की रैली निकली, उसके ठीक पीछे कांग्रेस का जत्था भी प्रचार करते हुए निकलने लगा। पार्क के गेट पर खड़े यहां के डिग्री कॉलेज में पढ़ने वाले शुभम शर्मा कहते हैं...रैली कोई भी निकाल ले...लेकिन जीतेगा तो शर्मा जी का परिवार ही यहां पर। बीते तीन दशक से शर्मा परिवार का ही इस विधानसभा सीट पर राज रहा है। इस बार सियासी गणित बदल गया तो, शर्मा जी के एक भाई कांग्रेस से ताल ठोंक रहे हैं, तो दूसरे भारतीय जनता पार्टी से। फिलहाल जीत यहां पर "शर्मा परिवार" की ही मानी जा रही है। अमर उजाला डॉट कॉम ने मध्यप्रदेश की इस सबसे चर्चित सीट का जायजा लिया।
नर्मदा नदी के किनारे बसे होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) में इस बार का चुनाव बहुत ही दिलचस्प हो गया है। दरअसल यहां सीधा चुनाव भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच है। इससे भी दिलचस्प बात यह है कि दोनों पार्टियों के प्रत्याशी सगे भाई हैं। यह दोनों लोग बीते तीन दशक से होशंगाबाद की इस विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी का परचम विधानसभा में लहराते आए हैं। लेकिन इस बार यहां समीकरण कुछ ऐसे बदले कि एक भाई की पार्टी बदल गई। अब नर्मदापुरम की सीट पर भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी सीतासरन शर्मा और कांग्रेस के प्रत्याशी गिरिजा शंकर शर्मा आमने-सामने ताल ठोंक रहे हैं। होशंगाबाद के वरिष्ठ पत्रकार सत्यव्रत सिंह कहते हैं कि दरअसल शुरुआती दौर में इस विधानसभा सीट पर कुछ ऐसे समीकरण बैठे, जिसमें यह लगने लगा कि बीते तीन दशक से चली आ रही शर्मा परिवार की सियासत इस बार खत्म होने वाली है।
अनुमान यह लगाया जाने लगा कि भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान विधायक सीतासरन शर्मा को भाजपा से टिकट नहीं मिल सका है। इसी दौरान कुछ ऐसी सियासी परिस्थितियां बनीं कि भारतीय जनता पार्टी के पूर्व विधायक रहे सीतासरन शर्मा के भाई गिरिजा शंकर शर्मा कांग्रेस के प्रत्याशी बनाकर सियासी मैदान में आ गए। दोनों परिवार नर्मदापुरम विधानसभा सीट पर अपनी अपनी जीत का दावा करते हैं और सियासी मैदान में जमकर पसीना भी बहा रहे हैं। नर्मदापुरम से स्नातक कर रहे शुभम शर्मा कहते हैं कि बीते 33 सालों से इस सीट पर शर्मा परिवार का ही दबदबा रहा है। सियासी गोटियां ऐसी सेट हुई हैं कि भाजपा जीते या कांग्रेस जीते लेकिन सत्ता शर्मा परिवार के हिस्से में ही आनी है। वह कहते हैं कि मुकाबला रोचक इसलिए भी है कि यहां दोनों पार्टियां जी-जान से चुनाव प्रचार भी कर रही हैं और अपने मुद्दों को भी आगे बढ़ा रही हैं।
नर्मदापुरम के सर्राफा बाजार में दुकान करने वाले अभिषेक कहते हैं कि इस विधानसभा क्षेत्र में 1990 से लेकर 1998 तक के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के हिस्से से सीतासरन शर्मा विधायक रहे। उसके बाद उनके भाई 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव में गिरजा शंकर शर्मा भाजपा से चुनाव लड़े और विधानसभा में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। फिर 2013 और 2018 के विधानसभा चुनाव में सीतासरन शर्मा भाजपा से चुनाव लड़े और विधायक हो गए। अब मुकाबला रोचक इसलिए हो गया है कि दोनों भाई अलग-अलग पार्टियों से आमने-सामने सियासत में उतर चुके हैं। हालांकि वह कहते हैं यह विधानसभा क्षेत्र इसलिए भी और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसके एकदम बगल में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान का विधानसभा क्षेत्र आ जाता है।
चुनावी मुद्दों को लेकर बात करते हुए यहां के बुक सेलर्स संगठन से जुड़े चंद्रकांत दीमा कहते हैं कि नर्मदापुरम के घाटों के सौंदर्यीकरण के साथ-साथ इलाके की सड़कों और अतिक्रमण की समस्या तो जरूर बनी रहती है। क्षेत्र में औद्योगीकरण को और बेहतर तरीके से आगे बढ़ने का भी मुद्दा स्थानीय जनता लगातार उठाती आई है। वह कहते हैं बीते कुछ समय से इस इलाके में किताबों की अलग-अलग मार्केट बनाने की भी मांग उठती रही है। उनके संगठन की ओर से लगातार स्थानीय विधायक से लेकर जिम्मेदार अधिकारियों को भी इसके लिए मांग पत्र सौंपा जा चुका है। चंद्रकांत का मानना है कि चुनाव कोई भी जीते, लेकिन सीट शर्मा परिवार के हिस्से में ही आनी तय है।
