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इंदौर: 4 साल में भी नहीं जागा MYH अस्पताल प्रबंधन, सीएम के डर से हादसे के निशान मिटाए
टीम डिजिटल, अमर उजाला
Updated Sat, 25 Nov 2017 03:39 PM IST
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महाराजा यशवन्तराव होलकर अस्पताल
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इंदौर के सबसे बड़े अस्पताल महाराजा यशवंतराव होलकर चिकित्सालय (एमवायएच) के एनआईसीयू (नवजात बच्चों का आईसीयू) में हुए हादसे के बाद अस्पताल प्रबंधन की आंख खुली है। अस्पताल प्रशासन ने शुक्रवार को पीडब्ल्यूडी को पत्र लिखकर अस्पताल के वार्डों में बिजली के लोड की जांच करने को कहा है। चार साल पहले भी अस्पताल में ऐसा हादसा हो चुका है फिर भी अस्पताल प्रशासन ने सुरक्षा संबंधी उपायों की अनदेखी की।
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में इंदौर के एमवायएच अस्पताल के एनआईसीयू में 23 नवंबर गुरुवार शाम अचानक आग लग गई थी। उस समय वहां 47 बच्चे भर्ती थे और सुरक्षा कर्मियों की मदद से बच्चों को छत के रास्ते बाहर निकाला गया था। कुछ बच्चों को चाचा नेहरू अस्पताल और पीआईसीयू में शिफ्ट किया गया था। हालांकि एक बच्चे की मौत भी हुई थी जिसके मौत पर अस्पताल प्रशासन ने कहा कि आग लगने से पहले ही बच्चे की मौत हो चुकी थी।
एमवायएच अस्पताल का एनआईसीयू करीब 20 साल पुराना है। और यहां भर्ती मरीज तय संख्या से ज्यादा होते हैं। सरकारी अस्पताल में इलाज की समुचित सुविधाओं की कमी के कारण ही मरीज निजी अस्पतालों का रुख करते हैं। एनआईसीयू समेत आईसीयू में कई तरह के उपकरण लगातार चालू रहते हैं जिनमें मॉनिटर, वेंटिलेटर, एसी, वार्मर जैसी मशीनें शामिल हैं। अस्पताल प्रशासन को इस बात की पूरी जानकारी थी कि बिजली की खपत भी ज्यादा हो रही है, लेकिन बिजली के लोड और तारों की क्षमता की जांच कराने की तरफ ध्यान नहीं दिया गया।
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अस्पताल प्रशासन की इस लापरवाही का सीधा असर आईसीयू में लगने वाले तारों पर पड़ा। ओवरलोड होने पर हीटिंग की वजह से बिजली के तार पिघल गए और शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लग गई। अस्पताल प्रशासन के सूत्रों ने बताया कि सबसे पहले आग वेंटिलेटर के नजदीक लगी। वेंटिलेटर में हो रही ऑक्सीजन लीकेज से आग जल्दी फैल गई।
मामले को रफा दफा करने की कोशिश
शुक्रवार को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान इंदौर में थे। ऐसी खबर थी कि गुरुवार को हादसे के बाद वे अस्पताल का दौरा कर सकते हैं। इसलिए शुक्रवार को अस्पताल प्रबंधन ने सामान्य से तीन गुना कर्मचारियों को एनआईसीयू की सफाई के लिए लगाया। अस्पताल प्रबंधन चाहता थी कि सीएम के आ जाने तक मामले को रफा दफा कर दिया जाए। शाम होने से पहले ही एनआईसीयू की दीवारों पर आग से लगी कालिख साफ कर दी गई।
प्रशासन ने नहीं दिए मजिस्ट्रेट जांच के आदेश
हादसे की जांच के लिए मुख्यमंत्री ने जांच समिति का एलान कर दिया जिसमें बड़े अधिकारी शामिल किए गए थे। जिसके बाद कलेक्टर ने मजिस्ट्रेट जांच के आदेश नहीं दिए।
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गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में इंदौर के एमवायएच अस्पताल के एनआईसीयू में 23 नवंबर गुरुवार शाम अचानक आग लग गई थी। उस समय वहां 47 बच्चे भर्ती थे और सुरक्षा कर्मियों की मदद से बच्चों को छत के रास्ते बाहर निकाला गया था। कुछ बच्चों को चाचा नेहरू अस्पताल और पीआईसीयू में शिफ्ट किया गया था। हालांकि एक बच्चे की मौत भी हुई थी जिसके मौत पर अस्पताल प्रशासन ने कहा कि आग लगने से पहले ही बच्चे की मौत हो चुकी थी।
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एमवायएच अस्पताल का एनआईसीयू करीब 20 साल पुराना है। और यहां भर्ती मरीज तय संख्या से ज्यादा होते हैं। सरकारी अस्पताल में इलाज की समुचित सुविधाओं की कमी के कारण ही मरीज निजी अस्पतालों का रुख करते हैं। एनआईसीयू समेत आईसीयू में कई तरह के उपकरण लगातार चालू रहते हैं जिनमें मॉनिटर, वेंटिलेटर, एसी, वार्मर जैसी मशीनें शामिल हैं। अस्पताल प्रशासन को इस बात की पूरी जानकारी थी कि बिजली की खपत भी ज्यादा हो रही है, लेकिन बिजली के लोड और तारों की क्षमता की जांच कराने की तरफ ध्यान नहीं दिया गया।
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अस्पताल प्रशासन की इस लापरवाही का सीधा असर आईसीयू में लगने वाले तारों पर पड़ा। ओवरलोड होने पर हीटिंग की वजह से बिजली के तार पिघल गए और शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लग गई। अस्पताल प्रशासन के सूत्रों ने बताया कि सबसे पहले आग वेंटिलेटर के नजदीक लगी। वेंटिलेटर में हो रही ऑक्सीजन लीकेज से आग जल्दी फैल गई।
मामले को रफा दफा करने की कोशिश
शुक्रवार को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान इंदौर में थे। ऐसी खबर थी कि गुरुवार को हादसे के बाद वे अस्पताल का दौरा कर सकते हैं। इसलिए शुक्रवार को अस्पताल प्रबंधन ने सामान्य से तीन गुना कर्मचारियों को एनआईसीयू की सफाई के लिए लगाया। अस्पताल प्रबंधन चाहता थी कि सीएम के आ जाने तक मामले को रफा दफा कर दिया जाए। शाम होने से पहले ही एनआईसीयू की दीवारों पर आग से लगी कालिख साफ कर दी गई।
प्रशासन ने नहीं दिए मजिस्ट्रेट जांच के आदेश
हादसे की जांच के लिए मुख्यमंत्री ने जांच समिति का एलान कर दिया जिसमें बड़े अधिकारी शामिल किए गए थे। जिसके बाद कलेक्टर ने मजिस्ट्रेट जांच के आदेश नहीं दिए।
