MP: बीहड़ की बागी छवि से उबरा चंबल लेकिन तासीर में बगावत बरकरार, तोमर-सिंधिया और दिग्विजय की प्रतिष्ठा पर दांव
चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में बड़े रसूख वाले सिंधिया परिवार से विजयाराजे सिंधिया और माधवराव सिंधिया से लेकर यशोधरा राजे और ज्योतिरादित्य तक भाजपा या कांग्रेस की सक्रिय राजनीति करते आए हैं। मगर, मध्य प्रदेश में सीएम की कुर्सी तक परिवार का कोई सदस्य नहीं पहुंचा।
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मध्य प्रदेश का ग्वालियर-चंबल संभाग कभी बागी बीहड़ों के लिए जाना जाता था। उस छवि से यह इलाका अब उबरा नजर आता है। लेकिन सियासत में बगावत का सबसे गाढ़ा रंग कहीं नजर आ रहा है, तो वह यही क्षेत्र है। बगावत का पानी और जाति के अभिमानी यहां पहले की ही तरह दिख रहे हैं। यहां विकास व अन्य मुद्दों की बात छेड़िए लेकिन मतदाता चुनावी हार-जीत के लिए जातीय समीकरण और बागियों के प्रभाव समझाने लगते हैं। कहते हैं इसके अलावा सारे मुद्दे गौण हैं।
2018 के चुनाव में चंबल-ग्वालियर ने 34 में से 26 सीटें कांग्रेस को दे दी थीं। भाजपा को सिर्फ सात सीटों से संतोष करना पड़ा था। एक सीट बसपा को मिली थीं। लेकिन, तत्कालीन कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत ने कांग्रेस की कमलनाथ सरकार गिरा दी। ज्योतिरादित्य की बगावत के बाद हुए उपचुनावों में कांग्रेस व भाजपा की सीटें लगभग बराबर हो गईं।
कांग्रेस व भाजपा ने यहां जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर प्रत्याशी दिए हैं। लेकिन, तमाम सीटों पर बागी कांग्रेस व भाजपा के समीकरण बिगाड़ने में कहीं खुद का समीकरण बनाने की स्थिति में हैं। कांग्रेस नेता व पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और भाजपा नेता व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की प्रतिष्ठा तो दांव पर है ही, बगावत के बाद से पहले विधानसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य की भी इज्जत दांव पर है। यहां कांग्रेस ज्योतिरादित्य को सबसे बड़े धोखेबाज के तौर पर पेश कर मतदाताओं से उन्हें व भाजपा को सबक सिखाने की अपील कर रही है। यहां करीब 20 सीटों पर भाजपा और कांग्रेस की सीधी लड़ाई दिख रही है तो अन्य पर त्रिकोणीय मुकाबला नजर आ रहा है। इस बार शिवपुरी से मंत्री यशोधरा राजे मैदान में नहीं हैं।
सिंधिया, तोमर और जयवर्धन को भविष्य के मुख्यमंत्री के रूप में देख रहे लोग
चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में बड़े रसूख वाले सिंधिया परिवार से विजयाराजे सिंधिया और माधवराव सिंधिया से लेकर यशोधरा राजे और ज्योतिरादित्य तक भाजपा या कांग्रेस की सक्रिय राजनीति करते आए हैं। मगर, मध्य प्रदेश में सीएम की कुर्सी तक परिवार का कोई सदस्य नहीं पहुंचा। राजनीतिक विश्लेषक देव श्रीमाली कहते हैं कि विजयाराजे और माधवराव ने कभी प्रदेश की राजनीति में रुचि ही नहीं दिखाई। ज्योतिरादित्य भी केंद्र की ही राजनीति करते रहे हैं। लेकिन, भाजपा इस चुनाव में ज्योतिरादित्य का जिस तरह उपयोग कर रही है, उससे बड़ा संदेश निकल रहा है।
ज्योतिरादित्य के एक करीबी नेता कहते हैं कि 2018 के चुनाव में प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष रहे सिंधिया को प्रदेश के युवाओं ने सीएम चेहरे के तौर पर देखा था। लेकिन, इसी क्षेत्र के गुना से निकले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने बेटे जयवर्धन सिंह को भविष्य में सीएम के तौर पर देख रहे हैं। पड़ोस के सिंधिया को जयवर्धन की सियासी राह से हटाने के लिए 2018 में दिग्विजय और कमलनाथ एक हो गए और कमलनाथ सीएम बन गए। इस नेता की मानें तो इसी सियासी चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए सिंधिया 2020 में बगावत कर भाजपा में आए और भाजपा फिर सत्ता में लौटी। सिंधिया राजघराने के एक अन्य समर्थक कहते हैं कि पीएम मोदी चुनाव से पहले तीन बार ग्वालियर आ चुके हैं। पीएम तो ज्योतिरादित्य को गुजरात का दामाद तक बता चुके हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कई बार आए। वह महराज के घर भोजन पर भी गए। इस चुनाव में महराज (ज्योतिरादित्य सिंधिया) पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा प्रचार करने वाले भाजपा के चुनिंदा नेताओं में से एक हैं। ऐसे में पार्टी को जनादेश मिला तो महाराज सीएम जरूर बनेंगे। दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के क्षेत्र दिमनी में उन्हें भविष्य के सीएम के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। वैसे दिमनी में कई लोग कहते हैं कि सत्ता फिर आने पर यदि शिवराज को सीएम पद जाता दिखा तो वह सिर्फ तोमर के नाम पर ही सहमति देंगे। दोनों गहरे मित्र हैं।
एससी और बसपा फैक्टर भी अहम
ग्वालियर-चंबल संभाग में एससी मतदाता अच्छी संख्या में हैं। यहां सात सीटें एससी के लिए रिजर्व है। कई सीटों पर बसपा की मजबूत स्थिति रहती आई है। दतिया में मिले राम सिंघासन ने बताया कि पिछले चुनाव में भिंड सीट बसपा ने जीती थी और ग्वालियर ग्रामीण में दूसरे नंबर पर थी। करेरा सीट पर तीसरे स्थान पर थी। इस बार भी पार्टी ज्यादातर सीटों पर लड़ रही है और एससी का समर्थन भी नजर आ रहा है। इसका असर कहीं भाजपा पर दिखेगा तो कहीं कांग्रेस पर।
मुख्यमंत्री पद ही नरेंद्र तोमर की एकमात्र उम्मीद
केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मुरैना के सांसद हैं और 2019 के लोकसभा चुनाव में दिमनी विधानसभा क्षेत्र से करीब 27 हजार से अधिक वोटों से लीड ली थी। मगर, अब तोमर जब दिमनी से विधायक का चुनाव लड़ रहे हैं, मुश्किलें साफ नजर आ रही हैं। बरेह में मिले सुरेश चौधरी कहते हैं कि भाजपा-कांग्रेस और आप तीनों ने ही तोमर प्रत्याशी उतारे हैं। यहां ब्राह्मण काफी संख्या में हैं। वे नारा लगा रहे हैं कि 'एक दबाओ-तीन गिराओ'। इससे बसपा प्रत्याशी बलवीर दंडोतिया ने लड़ाई को त्रिकोणीय बना दिया है। बलवीर ब्राह्मण हैं और पूर्व विधायक हैं। मंत्री तोमर के बेटे से जुड़े दो वीडियो सामने आने आए हैं, जिसे कांग्रेस मुद्दा बना रही है। गुर्जर समाज के एक युवक की हत्या भी यहां चर्चा में है, जिसके आरोपी तोमर समाज के बताए जाते हैं। इससे दिग्गज छवि वाले तोमर की चुनौती बढ़ी हुई है। हालांकि, हृदयेश कुमार कहते हैं कि नरेंद्र भाई बड़े कद के नेता हैं और प्रदेश के सीएम भी हो सकते हैं। जीतेंगे नरेंद्र ही।
दिग्विजय नहीं ले रहे कोई रिस्क, भाई के लिए कीं कई सभाएं
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह चाचौड़ा और बेटे जयवर्धन सिंह राघवगढ़ से कांग्रेस प्रत्याशी हैं। दोनों विधायक हैं। राघोगढ़ कांग्रेस का गढ़ है। यहां जयवर्धन को ज्यादा दिक्कत नजर नहीं आ रही है। लेकिन, चाचौड़ा में लक्ष्मण सिंह के सामने भाजपा की प्रियंका मीणा और भाजपा की बागी पूर्व विधायक ममता मीणा आप से आ गई हैं। ममता के पक्ष में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल सभा कर चुके हैं। यहां लड़ाई त्रिकोणीय होती दिख रही है। इसके बावजूद दिग्विजय कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने मंगलवार को लक्ष्मण के समर्थन में कई सभाएं की।
संभाग में प्रदेश के पांच मंत्री...कहीं त्रिकोणीय तो कहीं आमने-सामने की लड़ाई में उलझे
संभाग में प्रदेश के पांच मंत्री भी मैदान में हैं। सिंधिया खेमे से मंत्री बने प्रद्युम्न सिंह तोमर का ग्वालियर सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी से संघर्ष है। मंत्री अरविंद सिंह भदौरिया अटेर में कांग्रेस व सपा के साथ त्रिकोणीय मुकाबले में उलझे हैं। दतिया से गृहमंत्री डा. नरोत्तम मिश्रा के सामने कांग्रेस ने तगड़ी व्यूहरचना की है। दतिया में मिले प्रांशु पांडेय कहते हैं कि कांग्रेस ने यहां से राजेंद्र भारती को टिकट दिया है और बागी अवधेश नायक को मना लिया है। पूर्व सीएम कमलनाथ से लेकर दिग्विजय सिंह तक कांग्रेस के पक्ष में दतिया पहुंच चुके हैं। गुना की बामेरी से मैदान में डटे राज्यमंत्री महेंद्र सिंह सिसौदिया के सामने कांग्रेस के ऋषि अग्रवाल से है। बामेरी के चंचल सिंह बताते हैं कि महेंद्र, सिंधिया के खास हैं जबकि ऋषि के पिताजी भाजपा के नेता रहे हैं। मुंगावली में राज्यमंत्री बृजेंद्र सिंह यादव मैदान में हैं। ये भी सिंधिया समर्थक माने जाते हैं। यहां भाजपा से आए यादवेंद्र सिंह कांग्र्रेस प्रत्याशी हैं।
डा. गोविंद सिंह त्रिकोणीय संघर्ष में
नेता प्रतिपक्ष डा. गोविंद सिंह लहार से कांग्रेस प्रत्याशी हैं। पिछली बार भाजपा से लड़े रसाल सिंह इस बार बगावत कर बसपा से मैदान में आ गए हैं। भाजपा ने पिछले चुनाव के बसपा प्रत्याशी रहे अंबरीश पर दांव लगाया है। यहां त्रिकोणीय मुकाबला हो रहा है।
क्षेत्र के मुद्दे
- जल जीवन मिशन के तहत हर घर जल सप्लाई भ्रष्टाचार के आरोप।
- शिवराज सरकार के दतिया में पीतांबरा माई का लोक व भिंड के दंदरौआ धाम में हनुमान लोक बनाने के एलान की भी चर्चा है।
- भाजपा का अयोध्या में राम मंदिर का मुफ्त दर्शन कराने का वादा गरीब परिवारों में चर्चा में है। पिछले 10 दिन से भाजपा नेता यह प्रचार कर रहे हैं।
- सिंधिया समर्थक विधायकों के कांग्रेस से भाजपा में पालाबदल पर कई जगह प्रतिक्रिया नजर आ रही है।
- स्थानीय मुद्दे हावी हैं। पीएम मोदी और प्रियंका गांधी के भाषण जरूर चर्चा में हैं।
- ग्वालियर, शिवपुरी, गुना व मुरैना में से कहीं भाजपा ने ब्राह्मण प्रत्याशी नहीं दिया। इस पर भी नाराजगी है।
