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Omkareshwar: ओंकारेश्वर-ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग में उमड़ी आस्था, श्रद्धालुओं ने नर्मदा स्नान करके की पूजा अर्चना

Mon, 08 Sep 2025 11:51 AM IST
तरुणेंद्र चतुर्वेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खंडवा/ ओंकारेश्वर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खंडवा/ ओंकारेश्वर Published by: तरुणेंद्र चतुर्वेदी Updated Mon, 08 Sep 2025 11:51 AM IST
सार

Omkareshwar-Mamleshwar Jyotirling :  रविवार रात चंद्रग्रहण समाप्ति के बाद नर्मदा तट पर स्थित भगवान ओंकारेश्वर और ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग पर भक्तों की लंबी कतारें देखने को मिली।  पुजारियों ने भगवान शंकर का विशेष अभिषेक, पूजन और आरती संपन्न कर मंदिर के पट दर्शनार्थियों के लिए खोल दिए। भक्तगण भी सुबह नर्मदा स्नान करके भगवान शंकर की विशेष पूजा-अर्चना करने के लिए पहुंचे।
 

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MP Khandwa News After lunar eclipse huge crowd of devotees gathered at Omkareshwar Mamleshwar Jyotirlinga
ओंकारेश्वर-ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग में श्रद्धालुओं की लगी कतारें। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्य प्रदेश की पवित्र नगरी ओंकारेश्वर में रविवार रात चंद्रग्रहण समाप्ति के बाद श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ पड़ी। नर्मदा तट पर स्थित भगवान ओंकारेश्वर और ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिरों के पट जैसे ही खुले, हजारों श्रद्धालुओं ने पहले नर्मदा स्नान किया और फिर शिवलिंग के दर्शन-पूजन कर मंगलकामनाएं कीं। ग्रहण समाप्त होते ही परंपरा अनुसार, मंदिर परिसर का शुद्धिकरण किया गया। मंदिर कर्मचारियों ने पूरे परिसर को नर्मदा के पवित्र जल से धोया और पुजारियों ने भगवान शंकर का विशेष अभिषेक, पूजन और आरती संपन्न कर मंदिर के पट दर्शनार्थियों के लिए खोल दिए।

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भक्तों ने आस्था की डुबकी लगाई
पूरी रात श्रद्धालु नर्मदा घाटों पर एकत्रित होकर ग्रहण समाप्ति की प्रतीक्षा करते रहे। जैसे ही ग्रहण समाप्त हुआ, भक्तों ने आस्था की डुबकी लगाई और ज्योतिर्लिंग के दर्शन हेतु मंदिर पहुंचे। यह दृश्य आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम प्रतीत हो रहा था।

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स्नान, दान और विशेष पूजा का महत्व

धर्मग्रंथों के अनुसार, ग्रहण काल में सभी मंदिरों के पट बंद रहते हैं। इस दौरान पूजा-पाठ और स्पर्श वर्जित माना जाता है। ग्रहण समाप्ति पर स्नान, दान और विशेष पूजा का महत्व बताया गया है। ओंकारेश्वर का महत्व और बढ़ जाता है क्योंकि यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है तथा नर्मदा तट पर स्थित है। यहां श्रद्धालुओं को एक साथ नर्मदा स्नान और ज्योतिर्लिंग दर्शन का विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

ग्रहण उपरांत साधु-संतों, पुजारियों और श्रद्धालुओं ने दूध, दही, घी, शहद, मिश्री, चंदन और बेलपत्र से भगवान शंकर का अभिषेक किया। विद्वानों का कहना है कि यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रहेगी। ओंकारेश्वर में बने इस आध्यात्मिक माहौल ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि ग्रहण केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक एकजुटता का उत्सव भी है।

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