झाबुआ ब्लास्टः अस्पताल में पड़े तड़प रहे हैं घायल
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मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले के पेटलावाद क़स्बे में शनिवार को हुए विस्फोट में घायल हुए लोग अब भी बेहतर इलाज के लिए तरस रहे हैं। इस हादसे में 85 लोगों की मौत हो गई थी और 39 लोग घायल हुए थे। घायलों का इंदौर, झाबुआ और रतलाम के अस्पतालों में इलाज चल रहा है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रविवार को पेटलावद में कहा था कि अगर घायलों को इलाज के लिए प्रदेश के बाहर भी ले जाना पड़ा तो सरकार उसका ख़र्च उठाएगी। लेकिन झाबुआ के ज़िला अस्पताल में भर्ती घायलों को देखकर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लग रहा है।
हादसे के दूसरे दिन ही अस्पताल प्रबंधन इलाज के लिए गंभीर नज़र नहीं आ रहा है। इस हादसे में घायल हुए 35 साल के नरसिंह सेठिया रेस्टोरेंट में काम करते थे। इस रेस्टोरेंट में मौजूद अधिकांश लोगों की मौत हो गई थी।
नरसिंह ने बताया, ''उस दिन हमने एक पटाख़े जैसी आवाज़ सुनी, उसके बाद मैं दुकान में ऊपर आया। मकान मालिक ने अपने किरायदार जो कि खाद वग़ैरह रखता था, उसे फ़ोन कर बुलाया।
वो आया और दुकान का शटर खोलकर चला गया, मैं भी समोसे की रोटी बनाने तलघर में चला गया। उसी वक़्त मैंने ज़ोर का धमाका सुना और मैं दब गया।''
नरसिंह जैसे-तैसे बाहर निकले, अब उनकी दोनों आखें ठीक से खुल नहीं पा रही हैं। अस्पताल में वो सुबह से आंख की दवा का इंतज़ार कर रहे हैं, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
पटाख़े की आवाज़
18 साल के बलराम भी सेठिया रेस्तरां में काम करते थे. वो भी झाबुआ के अस्पताल में भर्ती हैं। उन्होंने बताया, ''हम लोग काम करने सुबह सात बजे दुकान पर आ जाते थे, उस दिन भी हम लोग आ गए थे। पहले एक बार पटाख़े की तरह आवाज़ आई, उसके थोड़ी देर बाद बहुत बड़ा धमाका हुआ, उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ नहीं मालूम, मुझे अस्पताल में ही होश आया।''
हादसे की ख़बर
क़रीब 35 साल के कैलाश पास के गांव हमीरगढ़ से अपनी पत्नी को इंजेक्शन लगवाने पेटलावद के स्वास्थ्य केंद्र आए थे, उनके साथ उनके बहनोई भी थे।
इस हादसे में कैलाश ने न सिर्फ़ अपनी पत्नी और बहनोई को खो दिया बल्कि उनकी याददाश्त भी जाती रही। कैलाश को उनकी पत्नी और बहनोई की मौत के बारे में नहीं बताया गया है।
बच्चों की मौत
इस हादसे में 30 साल के उस्मान भी घायल हुए हैं। वो लोडिंग ऑटो से आसपास के बच्चों को लेकर आए थे। वो उसी चौराहे पर बच्चों को उतार कर किराया वसूल रहे थे, इसी दौरान धमाका हुआ। उस्मान ने बताया, ''मेरे साथ आए दो-तीन बच्चों की मौत वहीं पर हो गई, मुझे भी चोटें आईं।''
कौन लेगा सुध
झाबुआ के सामाजिक कार्यक्रता कुलदीप घुड़ावत इस कोशिश में लगे हैं कि घायलों का बेहतर इलाज हो सके। वो कहते हैं, ''पहले दिन हमने देखा था कि पूरा अस्पताल प्रबंधन इनकी देखरेख में लग गया था। लेकिन अब इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है, ये बहुत ही ग़रीब लोग हैं। कोई इनकी सुनने वाला नहीं है।''
वो बताते हैं, ''कई मरीज़ बहुत ही गंभीर थे, लेकिन उन्हें बड़े शहर भेजने की बजाय यहीं रखा गया था। जब मैंने इस पर ऐतराज़ किया तब उन्हें इंदौर रेफ़र किया गया।''
