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MP HC: ट्राइबल विभाग के शिक्षकों के लिए च्वाइस फिलिंग का पोर्टल ओपन करने का आदेश, परिणाम घोषित करने पर रोक
Tue, 21 Feb 2023 10:08 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: हिमांशु प्रियदर्शी
Updated Tue, 21 Feb 2023 10:08 PM IST
सार
मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में पदस्थ माध्यमिक शिक्षक आरती सिंह और कुलदीप पाराशर सहित 68 लोगों की ओर से मामले दायर किए गए हैं। उनपर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने ट्राइबल विभाग के माध्यमिक शिक्षकों के लिए स्कूल शिक्षा विभाग में च्वाइस फिलिंग पोर्टल ओपन करने के निर्देश दिए हैं।
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट
विस्तार
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश से ट्राइबल विभाग के माध्यमिक शिक्षकों के लिए स्कूल शिक्षा विभाग में च्वाइस फिलिंग पोर्टल ओपन करने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि याचिका के अंतिम निराकरण तक रिजल्ट जारी न किया जाए।
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यह मामले प्रदेश के विभिन्न जिलों में पदस्थ माध्यमिक शिक्षक आरती सिंह और कुलदीप पाराशर सहित 68 लोगों की ओर से दायर किए गए हैं। इनमें कहा गया है कि प्रदेश में शिक्षकों की भर्ती विगत अक्टूबर 2021 से चल रही है। व्यापम द्वारा पात्रता परीक्षा 2019 में कराकर डीपीआई और ट्राइबल विभाग द्वारा सयुंक्त काउंसलिंग न करके अलग-अलग काउंसलिंग की गई। इसके कारण एक अभ्यर्थी अलग-अलग जगह चयनित हो गया। जिस विभाग ने पहले नियुक्ति पत्र जारी किया उसने उस विभाग में ज्वाइन कर लिया। उसके बाद डीपीआई द्वारा चयन सूची जारी की गई।
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चयन सूची के मुताबिक, अनेक शिक्षक अपने ग्रह निवास के पास के स्कूलों में पदस्थापाना चाहते हैं, क्योंकि ट्राइबल विभाग के स्कूल अधिसूचित क्षेत्रों में ही संचालित होते है तथा शिक्षकों का एक विभाग से दूसरे अर्थात लोक शिक्षण विभाग से ट्राइबल में स्थानांतरण का नियम नहीं है। इसलिए ट्राइबल विभाग में कार्यरत शिक्षक डीपीआई द्वारा संचालित शालाओं में अपनी पसंद की पोस्टिंग चाह रहे हैं।
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इसे स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा यह कहते हुए उनको शालाओं के चयन से वंचित कर दिया गया है कि संबधित शिक्षक (याचिकाकर्ता) पहले से नियुक्त हैं। जबकि इससे पहले एक माह का वेतन जमा करके शिक्षकों को डीपीआई तथा ट्राइबल विभाग ने मौका दिया है। इस पर डीपीआई के उक्त आदेश को चुनौती देते हुए ये याचिकाएं दायर की गई हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19 तथा 21 के तहत उनका यह मौलिक अधिकार है कि उन्हें कहां तथा किस विभाग में नौकरी करना है। पूर्व में अन्य अभ्यर्थियों को एक माह का वेतन अदा करके उन्हें मौका दिया जा चुका है। इसलिए समानता के आधार पर याचिकाकर्ताओं के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। सुनवाई के बाद न्यायालय ने उक्त अंतरिम आदेश दिए। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने पक्ष रखा।
हाई कोर्ट एडवोकेट बार से मांगा गया जवाब
मप्र हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रवि विजय मलिमठ और जस्टिस विशाल मिश्रा की युगल पीठ ने वर्ष 2016 से लंबित याचिका पर हाई कोर्ट एडवोकेट बार को जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं। यह याचिका एडवोकेट अमित पटेल की ओर से दायर की गई है। इसमें आरोप है कि उपरोक्त बार को स्टेट बार काउंसिल से मान्यता प्राप्त न होते हुए भी
गैर कानूनी रूप से कॉपी सेक्शन के सामने हाई कोर्ट द्वारा बड़ा हॉल अलॉट कर दिया गया। उसे खाली कराने के राहत मामले में चाही गई है। याचिका में आरोप है कि उक्त बार 'वन वोट वन बार' के सुप्रीम कोर्ट के न्याय सिद्धांत का पालन नहीं करती है। इतना ही नहीं हाई कोर्ट बार एसोसिएशन जो कि मान्यता प्राप्त संघ है। उसके सदस्यों के बीच में वर्ग वार पैदा करती है, जो कि गलत है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सतीश वर्मा ने बताया कि उक्त गैर कानूनी बार का बकाया बिजली बिल एक करोड़ के करीब पहुंच चुका है। जो कि जनता और सरकार का पैसा है। लेकिन एक अंतरिम आदेश के तहत बिजली कंपनी को बकाया वसूल करने से सालों से रोका जा रहा है। जब भी उक्त केस लगता है संगठन के सदस्य एक साथ खड़े होकर केस बढ़वा लेते हैं, जो कि गलत है।
इस पर न्यायालय ने कहा कि इस तरह के केसों को अब नहीं बढ़ाया जाएगा। अदालत ने सभी केसों को एक साथ सुनवाई का आदेश देते हुए सभी में जवाब पेश करने के आदेश दिया।इसकी सुनवाई चार हफ्ते बाद की जाएगी। याचिकाकर्ता की ओर से सतीश वर्मा, हाई कोर्ट की ओर से बीएन शुक्ला और एडवोकेट बार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल खरे, वरिष्ठ अधिवक्ता संजय अग्रवाल और अधिवक्ता प्रवीण दुबे उपस्थित हुए।
