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Jabalpur: नियम विरुद्ध हुई कुलपति के निज सचिव की नियुक्ति निरस्त, नानाजी देशमुख पशु विज्ञान विवि का मामला
Fri, 16 Dec 2022 10:34 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Fri, 16 Dec 2022 10:34 PM IST
सार
नानाजी देशमुख पशु विज्ञान विवि में कुलपति के निज सचिव पद पर नियमों ताक पर रखकर सतीश दुबे की नियुक्ति को हाईकोर्ट ने अवैध ठहराया है।
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(सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
नानाजी देशमुख पशु विज्ञान विवि में कुलपति के निज सचिव पद पर नियमों ताक पर रखकर सतीश दुबे की नियुक्ति को हाईकोर्ट ने अवैध ठहराया है। जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने निज सचिव सतीश दुबे को सेवा से पृथक करने के आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट में यह याचिका किरण अहिरवार व किशोर देवलिया की ओर से दायर की गई थी। इसमें आरोप था कि सतीश दुबे का भाई विश्वविद्यालय कार्यपरिषद का सदस्य था। विश्वविद्यालय द्वारा 19 सितंबर 2014 को कुलपति के निजी सचिव की 6 माह के लिए संविदा नियुक्ति हेतु विज्ञापन प्रकाशित किया गया। जिसके अनुसार केवल योग्यताधारी सेवानिवृत्त निजी सचिवों की नियुक्ति नियत वेतन पर की जानी थी। लेकिन सतीश दुबे को योग्यता न होने के बावजूद न केवल अवैध रूप से नियुक्ति दे दी गई बल्कि गत 8 वर्षों से उसकी सेवा निरंतर जारी रखी गई। इतना ही नहीं प्रतिवर्ष वेतन वृद्धि देकर वेतनमान का 90 प्रतिशत वेतन स्वीकृत किया गया। जबकि निज सचिव का पद नियमित प्रकृति का है। जिसके लिए सीधी नियुक्ति का प्रावधान है।
याचिकाकर्ताओं द्वारा सतीश दुबे को निरंतर सेवा में रखे जाने के विरुद्ध इस आधार पर आपत्ति की गई कि उक्त सतीश दुबे की अवैध नियुक्ति व सेवा में निरंतरता के कारण नियमित पद पर उनकी पदोन्नति प्रभावित हो रही है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर याचिकाकर्ताओं द्वारा उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई। जिसे स्वीकार करते हुए न्यायालय ने सतीश दुबे की नियुक्ति इस आधार पर निरस्त कर दी कि सतीश दुबे की नियुक्ति विज्ञापन की शर्तों के विपरीत की गई तथा बिना कुलपति के निजी सचिव के पद की उपलब्धता के उसे सेवा में निरंतर रखा गया। जो विधि विरुद्ध तथा निरस्त किए जाने योग्य है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अरविंद श्रीवास्तव ने पक्ष रखा।
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हाईकोर्ट में यह याचिका किरण अहिरवार व किशोर देवलिया की ओर से दायर की गई थी। इसमें आरोप था कि सतीश दुबे का भाई विश्वविद्यालय कार्यपरिषद का सदस्य था। विश्वविद्यालय द्वारा 19 सितंबर 2014 को कुलपति के निजी सचिव की 6 माह के लिए संविदा नियुक्ति हेतु विज्ञापन प्रकाशित किया गया। जिसके अनुसार केवल योग्यताधारी सेवानिवृत्त निजी सचिवों की नियुक्ति नियत वेतन पर की जानी थी। लेकिन सतीश दुबे को योग्यता न होने के बावजूद न केवल अवैध रूप से नियुक्ति दे दी गई बल्कि गत 8 वर्षों से उसकी सेवा निरंतर जारी रखी गई। इतना ही नहीं प्रतिवर्ष वेतन वृद्धि देकर वेतनमान का 90 प्रतिशत वेतन स्वीकृत किया गया। जबकि निज सचिव का पद नियमित प्रकृति का है। जिसके लिए सीधी नियुक्ति का प्रावधान है।
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याचिकाकर्ताओं द्वारा सतीश दुबे को निरंतर सेवा में रखे जाने के विरुद्ध इस आधार पर आपत्ति की गई कि उक्त सतीश दुबे की अवैध नियुक्ति व सेवा में निरंतरता के कारण नियमित पद पर उनकी पदोन्नति प्रभावित हो रही है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर याचिकाकर्ताओं द्वारा उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई। जिसे स्वीकार करते हुए न्यायालय ने सतीश दुबे की नियुक्ति इस आधार पर निरस्त कर दी कि सतीश दुबे की नियुक्ति विज्ञापन की शर्तों के विपरीत की गई तथा बिना कुलपति के निजी सचिव के पद की उपलब्धता के उसे सेवा में निरंतर रखा गया। जो विधि विरुद्ध तथा निरस्त किए जाने योग्य है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अरविंद श्रीवास्तव ने पक्ष रखा।
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