Indore:भीतर से खोखली थी महाकाल लोक की सप्तऋषि प्रतिमाएं, फायबर की परत कमजोर रखी, इसलिए गिरते ही टूट गईं
फायबर में इस्तेमाल की मेट की मोटाई भी कमजोर थी। यदि मजबूत होती तो मूर्तियां गिरने पर टूटती नहीं, बल्कि उसमें खरोचें आती या वे घीस जाती, लेकिन महाकाल लोक की कई मूर्तियां गिरते ही टूट गई, जो बता रही है कि घटियां निर्माण से मूर्तियां बनाई गई।
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उज्जैन में रविवार को चली आंधी ने महाकाल लोक के घटिया निर्माण की पोल खोल कर रख दी। गुजरात की जिस कंपनी को प्रतिमाएं बनाने के लिए सरकार ने महंगी कीमत चुकाई। उसने गुणवत्ता को ताक पर रख प्रतिमाएं बनाने में जमकर खेल किए। न मजबूती का ध्यान रखा, न हवा के प्रेशर की चिंता की। अब परिणाम सबके सामने है, जबकि पांच फीट से ज्यादा ऊंचाई पर प्रतिमाएं स्थापित करने पर उसे हवा के प्रेशर के हिसाब से डिजाइन किया जाता है।
खोखली प्रतिमाएं लगाना लापरवाही
पहले ही साल में ये हाल
प्रति प्रतिमा 15 लाख का भुगतान!
पत्थर की प्रतिमा में समय लगता, इसलिए फायबर की लगाई
फायबर की प्रतिमाओं के भीतर भी मार्बल की टुकड़ियां भरकर उसे मजबूत किया जाता है, ताकि वे हवा का प्रेशर झेल सकें, लेकिन महाकाल लोक में सप्तऋषि की प्रतिमाएं खोखली रखीं। यह बात भी प्रतिमाएं टूटने पर ही उजागर हुई। महाकाल लोक की प्रतिमाओं की मजबूती के मुद्दे पर अमर उजाला ने कुछ मूर्तिकारों से बात की तो उन्होंने महाकाल लोक में लगी मूर्तियों की कमजोरी गिनाई।
मूर्तिकार सुंदर गुर्जर बताते हैं कि आमतौर पर तीन-चार फीट की जो फायबर की मूर्तियां बनाई जाती हैं, वो पतली रहती हैं, लेकिन महाकाल लोक में 10 फीट से ज्यादा ऊंचाई की प्रतिमाओं में पतली परत के फायबर का इस्तेमाल हुआ। इसी वजह से मूर्तियां गिरने के कारण टूट गईं। पांच फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर स्थापित करने के दौरान हवा के प्रेशर के हिसाब से मूर्तियों को भीतर से मजबूत किया जाता है। मूर्ति के बेस से सिर तक स्टील की मजबूती दी जाती है और फिर भीतर मार्बल की टुकडियों से प्रतिमाओं को भरा जाता है, ताकि मजबूती बने रहे और वे हवा का प्रेशर झेल सकें, लेकिन महाकाल लोक की मूर्तियां खोखली रखी गईं, इसी वजह से वे हवा का प्रेशर नहीं झेल पाईं। खोखली मूर्ति लगाना लापरवाही है।
मूर्तिकार किशोर कोडवानी का कहना है कि फायबर की मूूर्तियां खुले में सार्वजनिक स्थानों पर नहीं लगाई जातीं। महाकाल लोक में इसका ध्यान नहीं रखा गया। खुले में रखी गई फायबर की प्रतिमाएं आसमान की बिजली गिरने से जल जाती हैं। फायबर कुछ समय बाद कमजोर हो जाता है और दरारें भी आ जाती हैं। महाकाल लोक में फायबर की मूर्तियां लगवाने वाले अफसरों की सोच पर तरस आता है। अभी तो महाकाल लोक का पहला साल है, उसमे ही ये हाल है। हवा की गति यदि 50 किलोमीटर प्रति घंटा होती फिर महाकाल लोक को हवा महल बनते देर नहीं लगेगी।
350 करोड़ की लागत से बने महाकाल लोक में मूर्तियां बनाने का ठेका गुजरात की कंपनी को दिया गया था। बताते हैं कि प्रति प्रतिमा 15 लाख रुपये का भुगतान किया गया। सात माह बाद जब महाकाल लोक में फायबर की प्रतिमाएं उड़कर टूट गई तो अफसर यह कहते नजर आए कि पत्थर की मूर्तियां लगाई जाना है। लोक के लोकार्पण के समय फायबर की मूर्तियां लगाई गई।
कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम ने कहा कि पत्थर की मूर्तियां बनाने में समय लगता है, इसलिए फायबर की मूर्तियां लगाई गई। धीरे-धीरे उन्हें बदल कर पत्थर की मूर्तियां लगाई जाएंगी। सभी को पता है कि फायबर की मूर्ति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रहती हैं।
