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जिजीविषा: खुद को विचारों में डूबा पाएं या किसी समस्या के हल को लेकर कर रहे हैं संघर्ष, तब रखें स्फोट का ध्यान
सार
Survival: जिस तरह एक शांत झील चंद्रमा को पूरी तरह से प्रतिबिंबित करती है, उसी तरह एक शांत मन स्फोट के लिए आदर्श भूमि बन जाता है। स्फोट हमें सिखाता है कि सत्य का निर्माण नहीं किया जाता है- यह प्रकट होता है।
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डॉ. अनन्या मिश्रा का कॉलम
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी जटिल समस्या को हल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और समाधान लगभग मिल ही चुका है पर स्पष्ट नहीं है? या कोई गीत याद करने की कोशिश कर रहे हैं और उसके बोल कुछ-कुछ याद हैं, किन्तु पूरा गीत याद नहीं आ रहा? फिर कुछ समय बाद, अचानक, स्पष्टता आती है। समाधान पूरी तरह से तैयार हो कर, कहीं अन्य स्थान और स्थिति से प्रकट होता है या वह गीत अचानक से रेडियो पर आ जाता है और आपका मन प्रसन्न हो जाता है। यह क्षण जहां काफी समय के संघर्ष के बाद सुकून मिलता है- यह ‘स्फोट’ का सार है।
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स्फोट प्राचीन भारतीय व्याकरण में भाषा के दर्शन में निहित एक अवधारणा है, जिसका आध्यात्मिक महत्व भाषाई उत्पत्ति से भी परे है। यह रहस्योद्घाटन है, ध्वनि, विचार या अनुभव की परतों से प्रस्फुटित होता हुआ। यह एक बीज की तरह है, जो भीतर के अव्यक्त वृक्ष को प्रकट करने के लिए खुलता है और अप्रकट के प्रकट होने का प्रतिनिधित्व करता है। 5वीं शताब्दी के भारतीय भाषाविद् और दार्शनिक भर्तृहरि के कार्यों में, स्फोट को शब्दों या वाक्यों में निहित अर्थ के अविभाज्य पूर्णता के रूप में वर्णित किया गया था। भर्तृहरि के वाक्यपदीय के अनुसार, बोला गया शब्द केवल वाहन है; सच्चा अर्थ अक्षरों से परे है, जो श्रोता की चेतना में एक तात्कालिक अंतर्दृष्टि के रूप में प्रस्फुटित होता है। यह विचार उपनिषदों में सत्य की खोज को दर्शाता है।
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स्फोट शब्द संस्कृत मूल 'स्फुट' से लिया गया है, जिसका अर्थ है "फटना" या "खुलना"। यह अज्ञान और ज्ञान के बीच, सांसारिक और पारलौकिक के मध्य की सीमाओं को समाप्त करने का प्रतीक है। यह भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक स्पष्टता, रचनात्मक सफलताओं और यहां तक कि आत्म-साक्षात्कार के क्षणों पर भी लागू होता है। छांदोग्य उपनिषद में, हम उद्दलक और श्वेतकेतु की कहानी में भी स्फोट की प्रतिध्वनि पाते हैं। जब उद्दलक श्वेतकेतु से कहते हैं "तत् त्वम् असि" (वह तुम हो), तो यह वाक्यांश ही नहीं है जो शिष्य को रूपांतरित करता है। इसके बजाय, शब्द स्फोट के लिए उत्प्रेरक का काम करते हैं- ब्रह्म के साथ उसकी एकता का एक गहन अहसास कराता है। समझ या ज्ञान का यह विस्फोट वेदान्तिक शिक्षा का सार है।
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अब प्रश्न यह उठता है कि स्फोट आज हमारे जीवन से कैसे संबंधित है? आज हर समय सूचना के अतिभार की कोई सीमा ही नहीं है। हम डेटा और नोटिफिकेशन की अंतहीन धाराओं से घिरे हुए हैं- ईमेल, समाचार, सोशल मीडिया अपडेट सभी हमारा ध्यान आकर्षित करने की होड़ में हैं। फिर भी सत्य अक्सर हमसे दूर रहता है। स्फोट हमें याद दिलाता है कि अंतर्दृष्टि संचय का उत्पाद नहीं बल्कि ज्ञान का उत्पाद है। यह इस बारे में नहीं है कि आप कितना उपभोग करते हैं बल्कि इस बारे में है कि आप कितनी गहराई से उस जानकारी, उस सत्य से स्वयं को जोड़ते हैं।
उदाहरण के लिए, जब आप एक कविता पढ़ते हैं या संगीत सुनते हैं तो प्रारंभ में आप तकनीकी पहलुओं पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं- तुकबंदी, धुन या गीत। लेकिन फिर, धीरे-धीरे आप कविता या गीत का सार समझने लगते हैं और यह आपको प्रभावित करता है। यह कुछ ऐसा विशेष नहीं है जिसे आप ‘डिकोड’ करते हैं या जिसके लिए आपको अत्यधिक ज्ञान आवश्यक है, यह कुछ ऐसा है जिसे आप अनुभव करते हैं। यह स्फोट है: वह क्षण जब कला एक बाहरी वस्तु नहीं रह जाती और एक आंतरिक सत्य बन जाती है।
आध्यात्मिक अभ्यास में, ध्यान करते समय भी मन में कंपन होता है। उदाहरण के लिए आप जब ओम् का उच्चारण करते हैं, तो शब्दांश दोहरावदार और सांसारिक प्रतीत होते है। किन्तु, उनकी असली शक्ति निराकार, अनंत वास्तविकता की ओर संकेत देने की उनकी क्षमता में निहित है। जब मन मंत्र से परे होता है और अनंत को स्पर्श करता है तो जो अहसास होता है, वह स्फोट ही है। पतंजलि के योग सूत्र भी स्फोट की अंतर्निहित समझ प्रदान करते हैं। समाधि (परम तल्लीनता की स्थिति) में, साधक शब्दों और अवधारणाओं से परे प्रत्यक्ष अनुभव में चला जाता है। मन की परतें उतर जाती हैं, और वास्तविकता की सच्ची प्रकृति स्वयं प्रकट हो जाती है। यह क्षण, जब ज्ञान खंडित होना बंद हो जाता है और संपूर्ण हो जाता है, स्फोट के विचार के साथ खूबसूरती से संरेखित होता है।
समकालीन अर्थ में, स्फोट को रचनात्मक प्रेरणा के रूपक के रूप में भी देखा जा सकता है। लेखक, कलाकार और नवोन्मेषक अक्सर ऐसे क्षणों की बात करते हैं जब विचार पूर्ण रूप से तैयार हो जाते हैं। यह घटना प्राचीन भारतीय ज्ञान से मेल खाती है, जहां स्फोट केवल एक संज्ञानात्मक घटना नहीं है, बल्कि ज्ञान के सार्वभौमिक स्रोत से जुड़ाव है। इसी प्रकार सौंदर्यशास्त्र में एक कलात्मक अनुभव का सार या स्वाद, स्फोट के ही समान है। एक कुशल कलाकार दर्शकों को विवरणों से नहीं बल्कि स्फोट के जरिए रस को जगाता है। इसी से दर्शक के ह्रदय में भावना और अर्थ का विस्फोट होता है।
आधुनिक वैज्ञानिक शोध में भी, एपीफेनी या अंग्रेजी के “अहा! मोमेंट” की घटना का बड़े पैमाने पर अध्ययन किया गया है। तंत्रिका विज्ञान बताता है कि ऐसे क्षण तब होते हैं जब मस्तिष्क बिखरी हुई जानकारी को सुसंगत कर के पूरा करने में सफल होता है। यह भर्तृहरि के दृष्टिकोण के समान है- जहां स्फोट अविभाज्य सार का प्रतिनिधित्व करता है। यह तब तक उभरने की प्रतीक्षा करता है जब तक मन इसे ग्रहण करने के लिए तैयार होता है।
हम अपने जीवन में स्फोट को कैसे आमंत्रित कर सकते हैं? इसकी कुंजी शांति और ध्यान विकसित करने में निहित है। कठोपनिषद में कहा गया है, "आत्मा मंदबुद्धि, विचारहीन या बहुत अधिक सीखने में संलग्न लोगों द्वारा प्राप्त नहीं होती है। यह उसे प्राप्त होती है जो प्रयास करता है, जिसका मन नियंत्रण में है और जिसका ध्यान स्थिर है।" यह प्राचीन ज्ञान हमें याद दिलाता है कि अंतर्दृष्टि केवल प्रयास से नहीं, बल्कि ग्रहणशीलता की स्थिति से उत्पन्न होती है। जिस तरह एक शांत झील चंद्रमा को पूरी तरह से प्रतिबिंबित करती है, उसी तरह एक शांत मन स्फोट के लिए आदर्श भूमि बन जाता है। स्फोट हमें सिखाता है कि सत्य का निर्माण नहीं किया जाता है- यह प्रकट होता है। चाहे वह हमारी दिव्य प्रकृति की प्राप्ति हो, मंत्र के पीछे का अर्थ हो या रचनात्मक प्रतिभा की चमक हो, स्फोट हमें मौन और रहस्योद्घाटन के बीच के जुड़ाव का स्मरण कराता है।
तो अगली बार जब आप स्वयं को विचारों में डूबा हुआ पाएं या किसी समस्या को हल करने के लिए संघर्ष करते हुए पाएं, तो स्फोट का ध्यान रखें। आप जो उत्तर खोज रहे हैं, वह शायद आपके भीतर पहले से ही मौजूद हैं, जो फूटने के लिए सही समय का इंतज़ार कर रहे हैं। उस क्षण में, आपको एहसास होगा कि खोज की यात्रा उतनी ही दिव्य है जितनी कि अंतर्दृष्टि।
(लेखक आईआईएम इंदौर में सीनियर मैनेजर, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया रिलेशन पर सेवाएं दे रही हैं।)
