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Best Milk: अच्छी जलवायु और हरे चारे से बढ़ रहा दूध का उत्पादन, सरकार लगाएगी गैस पेट्रोल इंडस्ट्री, विरोध तेज
Thu, 26 Sep 2024 10:35 AM IST
अर्जुन रिछारिया
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: अर्जुन रिछारिया
Updated Thu, 26 Sep 2024 10:35 AM IST
सार
यहां के किसान परिवार के सदस्यों की तरह पशुओं का ध्यान रखते हैं, दूध उद्योग यहां पर फल फूल रहा लेकिन अब संकट छा रहा। यहां पर पेट्रोल और गैस इंडस्ट्री लगने वाली हैं। किसान कर रहे हैं विरोध।
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आष्टा के भंवरी गांव में किसानों से चर्चा।
- फोटो : अमर उजाला, डिजिटल, इंदौर
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विस्तार
मप्र के सीहोर के आसपास के गांवों का दूध बेहद खास है। यहां के दूध की डिमांड इतनी अधिक है कि वह महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान समेत देश के कई राज्यों तक जाता है। यहां पर सर्वश्रेष्ठ दूध होने का कारण यहां की जलवायु, काली मिट्टी, पानीदार भूमि और सालभर की फसलें हैं। इनसे पशु स्वस्थ रहते हैं और उच्च क्वालिटी का दूध देते हैं। हालांकि अब यहां के दुग्ध उद्योग पर संकट भी छा रहा है, क्योंकि यहां पर मप्र सरकार का गेल इंडिया प्रोजेक्ट आ रहा है जिसकी वजह से यहां के किसान बड़ी संख्या में यह काम करने से वंचित होने वाले हैं। किसानों का कहना है कि सरकार को दूध की नदियों वाले इस क्षेत्र में पेट्रोल और गैस इंडस्ट्री लगाने के बजाय इसी दूध उद्योग को आगे बढ़ाना चाहिए ताकि देश की जनता को अच्छा दूध मिले।
गाय, भैंसों को मच्छर से भी बचाते हैं
सीहोर के आसपास के कई गांव की काली मिट्टी बेहद उपजाऊ है। यहां पर एक साल में तीन फसलें होती हैं और भीषण गर्मी के समय में भी यहां पर पानी की कोई कमी नहीं है। दस से 15 फिट पर पानी निकल आता है। इसलिए गाय, भैंसों को गर्मी के समय में भी हरा चारा खाने को मिलता है। गांव के किसान गाय, भैंसों का परिवार के सदस्यों की तरह ध्यान रखते हैं। उन्हें मच्छर नहीं काटें यह तक ध्यान रखा जाता है। भंवरी गांव के रवि परमार ने बताया कि गौशाला में सभी किसानों ने साल के तीनों मौसम के हिसाब से व्यवस्था कर रखी है। गर्मी, बारिश हो या फिर ठंड। गाय, भैंसों का पूरा ध्यान रखा जाता है। रात में कंडे जलाए जाते हैं ताकि उन्हें कीट पतंगे या मच्छर नहीं काटें।
दूध उद्योग संकट में
यहां का दूध उद्योग संकट में है। भंवरी गांव के किसान लक्ष्मीनारायण बताते हैं कि हमारी आजीविका का प्रमुख साधन दूध उद्योग ही है। यहां पर मप्र सरकार का गेल इंडिया प्रोजेक्ट आ रहा है जिसके लिए हमारे गांवों की काली मिट्टी की उपजाऊ जमीनें अधिग्रहित का जा रही हैं। हम अपनी खेती की जमीनें नहीं देना चाहते और लंबे समय से इसका विरोध कर रहे हैं। जिन गांवों का दूध अन्य राज्यों में जाता है वहां पर तो सरकार को दूध उद्योग को विकसित करने के लिए काम करना चाहिए। आसपास की बंजर जमीन पर भी उद्योग लगाए जा सकते हैं पर सरकार उपजाऊ जमीन क्यों ले रही है, यह समझ से परे है।
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सीहोर से रोज 7 लाख लीटर दूध जाता है देशभर में
दूध व्यापारी हरिओम परमार और अशोक परमार ने बताया कि आष्टा से रोज दो लाख लीटर अन्य राज्यों में जाता है। वहीं सीहोर से रोज 7 लाख लीटर दूध देशभर के राज्यों में जाता है। दोनों ने बताया कि आष्टा में ही दूध की पांच कंपनियां हैं। किसान को फैट के हिसाब से दूध के 40 रुपए से 80 रुपए लीटर तक दाम मिलते हैं। इसके बाद अपना मुनाफा जोड़कर ज्यादा दाम में कंपनियों यह दूध ग्राहकों को देती हैं। दोनों दूध व्यापारी हैं और उनका मानना है कि यहां पर सरकार को दूध कारोबार को बढ़ाने के लिए और भी प्रयास करने चाहिए। इससे रोजगार बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था भी बेहतर होगी।
क्यों खास है यहां का दूध
उपजाऊ काली मिट्टी में सालभर चारा मिलता है।
पानीदार जमीन होने से कभी भी फसलें नहीं सूखती।
पर्यावरण और जलवायु बेहतर होने से मवेशी स्वस्थ रहते हैं।
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गाय, भैंसों को मच्छर से भी बचाते हैं
सीहोर के आसपास के कई गांव की काली मिट्टी बेहद उपजाऊ है। यहां पर एक साल में तीन फसलें होती हैं और भीषण गर्मी के समय में भी यहां पर पानी की कोई कमी नहीं है। दस से 15 फिट पर पानी निकल आता है। इसलिए गाय, भैंसों को गर्मी के समय में भी हरा चारा खाने को मिलता है। गांव के किसान गाय, भैंसों का परिवार के सदस्यों की तरह ध्यान रखते हैं। उन्हें मच्छर नहीं काटें यह तक ध्यान रखा जाता है। भंवरी गांव के रवि परमार ने बताया कि गौशाला में सभी किसानों ने साल के तीनों मौसम के हिसाब से व्यवस्था कर रखी है। गर्मी, बारिश हो या फिर ठंड। गाय, भैंसों का पूरा ध्यान रखा जाता है। रात में कंडे जलाए जाते हैं ताकि उन्हें कीट पतंगे या मच्छर नहीं काटें।
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दूध उद्योग संकट में
यहां का दूध उद्योग संकट में है। भंवरी गांव के किसान लक्ष्मीनारायण बताते हैं कि हमारी आजीविका का प्रमुख साधन दूध उद्योग ही है। यहां पर मप्र सरकार का गेल इंडिया प्रोजेक्ट आ रहा है जिसके लिए हमारे गांवों की काली मिट्टी की उपजाऊ जमीनें अधिग्रहित का जा रही हैं। हम अपनी खेती की जमीनें नहीं देना चाहते और लंबे समय से इसका विरोध कर रहे हैं। जिन गांवों का दूध अन्य राज्यों में जाता है वहां पर तो सरकार को दूध उद्योग को विकसित करने के लिए काम करना चाहिए। आसपास की बंजर जमीन पर भी उद्योग लगाए जा सकते हैं पर सरकार उपजाऊ जमीन क्यों ले रही है, यह समझ से परे है।
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सीहोर से रोज 7 लाख लीटर दूध जाता है देशभर में
दूध व्यापारी हरिओम परमार और अशोक परमार ने बताया कि आष्टा से रोज दो लाख लीटर अन्य राज्यों में जाता है। वहीं सीहोर से रोज 7 लाख लीटर दूध देशभर के राज्यों में जाता है। दोनों ने बताया कि आष्टा में ही दूध की पांच कंपनियां हैं। किसान को फैट के हिसाब से दूध के 40 रुपए से 80 रुपए लीटर तक दाम मिलते हैं। इसके बाद अपना मुनाफा जोड़कर ज्यादा दाम में कंपनियों यह दूध ग्राहकों को देती हैं। दोनों दूध व्यापारी हैं और उनका मानना है कि यहां पर सरकार को दूध कारोबार को बढ़ाने के लिए और भी प्रयास करने चाहिए। इससे रोजगार बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था भी बेहतर होगी।
क्यों खास है यहां का दूध
उपजाऊ काली मिट्टी में सालभर चारा मिलता है।
पानीदार जमीन होने से कभी भी फसलें नहीं सूखती।
पर्यावरण और जलवायु बेहतर होने से मवेशी स्वस्थ रहते हैं।
