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MP Foundation Day: संगीत में एमपी का रहा अतुलनीय योगदान, रियासतों के जमाने से बरसते रहे कलाओं के रंग

Sat, 01 Nov 2025 07:00 AM IST
Kamlesh Sen कमलेश सेन
Updated Sat, 01 Nov 2025 07:00 AM IST
सार

इंदौर होलकर रियासत समय से संगीत व संगीतकारों को संरक्षण देने में प्रमुख रहा है। संपूर्ण मालवा क्षेत्र में रानी रूपमती की स्वर लहरियों का जादू यहां के शासकों पर बरकरार रहा। होलकर महाराजा तुकोजीराव के दरबार में प्रति वर्ष रंग पंचमी और गुड़ी पड़वा पर संगीत सभा का आयोजन होता था।

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MP's contribution to music has been unparalleled, with its artistic influences extending back to princely era.
संगीत में एमपी का रहा अतुलनीय योगदान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय संगीत के इतिहास में मध्य प्रदेश का योगदान अतुलनीय है 1956 में मध्य प्रदेश का गठन हुआ तो विभिन्न देसी रियासतों की बहुत समृद्ध संगीत की परंपरा रही है, जो मध्य प्रदेश में शामिल हुई। अलग-अलग रियासतों की अलग-अलग संगीत शैली हुआ करती थी।
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ग्वालियर शास्त्रीय संगीत का गढ़ बना
ग्वालियर भारतीय संगीत का ऐतिहासिक केंद्र रहा है। यह ध्रुपद गायन की जन्मस्थली माना जाता है। मध्य कालीन राजा मानसिंह तोमर के काल में संगीत के क्षेत्र में विशेष ध्यान दिया गया। ग्वालियर को तानसेन और ध्रुपद गायन शैली की जन्म स्थली माना जाता है। बाबा हरिदास, मोहम्मद गौसे का ग्वालियर से नाता रहा है। ग्वालियर में ख्याल और ध्रुपद के हद्दू खां और नाथू खां ने ख्याल शैली विकसित की, फिर इस कड़ी में कई नाम जुड़ते गए। बाद में उस्ताद अमजद अली खान ने यह परंपरा जारी रखी राज्य का सबसे पुराना माधव संगीत विद्यालय 1918 में आरंभ हुआ था, ग्वालियर में हर साल होने वाला तानसेन समारोह देशभर में प्रसिद्ध है।
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मालवा में गूंजती थी स्वलहरियां
इंदौर होलकर रियासत समय से संगीत व संगीतकारों को संरक्षण देने में प्रमुख रहा है। संपूर्ण मालवा क्षेत्र में रानी रूपमती की स्वर लहरियों का जादू यहां के शासकों पर बरकरार रहा। होलकर महाराजा तुकोजीराव के दरबार में प्रति वर्ष रंग पंचमी और गुड़ी पड़वा पर संगीत सभा का आयोजन होता था। मृदंगाचार्य नाना साहब पानसे, बीन वादक मुराद खां दरबार में लंबे समय तक जुड़े रहे। मृदंग वादकों में पानसे घराने के गोविंदराम राजवैद्य से मृदंग सीखना अनिवार्य था। ध्रुपद-धमार गायक बेहराम खां इंदौर के निवासी थे। जाकिरुद्दीन खां, नसीरुद्दीन खां से लेकर डागर बंधुओं तक बेहराम खां ने संगीत जगत की अनमोल सेवा की। प्रसिद्ध ध्रुपद गायक केशव नारायण आप्टे, मृदंग वादक सखाराम पंत, हारमोनियम वादक माधव राव चौगुले की प्रसिद्धि थी।
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आमिर खां ने इंदौर घराने को खास स्थान दिलाया
उस्ताद आमिर खां का जिक्र किए बिना इंदौर का संगीत अधूरा है, उन्होंने अपने गायन की विशिष्ट शैली से इंदौर घराने को भारतीय संगीत में विशिष्ट स्थान दिलाया। तबला वादक उस्ताद जहांगीर खां मध्य प्रदेश ही नहीं देशभर में जाने जाते हैं। सितार वादक विलायत खां, प्रसिद्ध बीनकर उस्ताद बाबू खां के शिष्य अब्दुल हलीम जाफर खां (जावरा वाले) सितार वादक पंडित कृष्ण राव (आष्टा), उस्ताद रज्जब अली खां, उस्ताद यासीन खां और कुमार गंधर्व (देवास) भारतीय संगीत के वे नाम हैं, जिनकी चर्चा बिना प्रदेश का संगीत अधूरा है। स्वर कोकिला लता मंगेशकर और किशोर कुमार भी मध्य प्रदेश के निवासी ही थे, जिन्होंने भारतीय फिल्मी संगीत में अपना नाम रोशन किया।


कबीर गायकी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नया आयाम
 देश में कबीर गायकी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नया आयाम देने के लिए मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध कबीर गायक प्रहलाद सिंह टिपानिया, कालूराम बामनिया, भेरुजी चौहान ने अलग ख्याति अर्जित की और कबीर गायकी को जनता तक नए तरीके से पहुंचाया है।
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