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MP Election Results: इंदौर में नोटा ने बनाया रिकॉर्ड, देश में सबसे ज्यादा वोट लाकर मुकाबले में दूसरे नंबर पर
Tue, 04 Jun 2024 02:06 PM IST
दिनेश शर्मा
अमर उजाला, न्यूज डेस्क, इंदौर
अमर उजाला, न्यूज डेस्क, इंदौर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Tue, 04 Jun 2024 02:06 PM IST
सार
मत देना भी है, और उसे कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है तो वह यह विकल्प चुन सकता है। वोटिंग मशीन में नोटा का विकल्प का बटन जोड़ा गया। नोटा का विकल्प लागू करने वाला भारत विश्व का 14वां देश था। जबकि रूस ने 2006 में इस विकल्प को हटा दिया है। भारत में 2014 के लोकसभा चुनाव में नोटा के विकल्प की सुविधा मतदाताओं को चुनाव आयोग ने उपलब्ध कराई थी।
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नोटा ने इंदौर में बनाया रिकॉर्ड
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
लोकसभा चुनाव के परिणाम सामने आते जा रहे हैं। इंदौर लोकसभा सीट पर अलग ही नतीजे देखने को मिल रहे हैं। नोटा को दो लाख वोट मिले हैं, जो अपने आप में रिकॉर्ड है। नोटा को लेकर कई जिज्ञासाएं होंगी, आइए यहां गणित समझा रहे हैं।
आखिर इंदौर में नोटा को इतन वोट क्यों
बता दें कि इंदौर में कांग्रेस के प्रत्याशी अक्षय बम ने नामवापसी के दिन कांग्रेस के साथ दगा करते हुए भाजपा की सदस्यता ले ली थी। इसके बाद कांग्रेस ने किसी को भी समर्थन नहीं देते हुए कहा था कि जनता के पास नोटा विकल्प है। कांग्रेस ने नोटा दबाने के लिए एक तरह से अभियान भी चलाया था। वहीं अक्षय बम को भाजपा में लेने पर कुछ भाजपाई भी नाराज नजर आ रहे थे। इन सभी कारणों से इंदौर में नोटा को अब तक के सर्वाधिक मत मिलने का अनुमान लगाया जा रहा था। दोपहर 12 बजे तक ही नोटा को एक लाख वोट मिल चुके थे।
नोटा है क्या
जब चुनाव मैदान में खड़े उम्मीदवार पसंद के नहीं हों तो आखिर किसे वोट दिया जाए। यह एक गंभीर प्रश्न रहता है मतदाता के सामने। मत देना एक मौलिक दायित्व है। मतदान प्रक्रिया पर सरकार एक बड़ी राशि व्यय करती है। कुछ देशो में मत न देने पर जुर्माने का प्रावधान है। अंग्रेजी के नोटा संक्षिप्त रूप का अर्थ ही है ‘नन ऑफ द अबोव’ यानी उपरोक्त में कोई भी नहीं। इसकी शुरुआत 1976 में अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य की सांता बारबरा काउंटी की म्यूनिसिपल इंफॉर्मेशन काउंसिल में लागू करने से हुई थी। बाद में भारत में पीयूसीएल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर यहां भी नोटा लागू करने की मांग की थी। हमारे देश में 2013 नोटा (उपरोक्त में से कोई नहीं) का प्रावधान लागू हुआ था। मत देना भी है, और उसे कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है तो वह यह विकल्प चुन सकता है। वोटिंग मशीन में नोटा का विकल्प का बटन जोड़ा गया। नोटा का विकल्प लागू करने वाला भारत विश्व का 14वां देश था। जबकि रूस ने 2006 में इस विकल्प को हटा दिया है। भारत में 2014 के लोकसभा चुनाव में नोटा के विकल्प की सुविधा मतदाताओं को चुनाव आयोग ने उपलब्ध कराई थी।
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प्रदेश में नोटा
मध्य प्रदेश में 2014 के चुनाव में 3 लाख 91 हजार 771 मत नोटा को प्राप्त हुए थे, जो राज्य में कुल वैध मतों का 0.81 प्रतिशत था, जबकि 2019 में 3 लाख 40 हजार 984 मत नोटा को मिले जो 0.66 प्रतिशत था। 2019 में प्रदेश में नोटा का सबसे कम उपयोग करने वाले संसदीय क्षेत्र मुरैना, सतना, रीवा, इंदौर और बालाघाट थे। इस तरह 2014 में नोटा का कम प्रयोग करने वाले क्षेत्र ग्वालियर, मुरैना, भोपाल, इंदौर और भिंड थे। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में मुरैना और इंदौर में नोटा का प्रयोग कम हुआ।
देश में नोटा
2019 के लोकसभा चुनाव में देश में नोटा को मतदाताओं ने 65 लाख 22 हजार 772 मत दिए थे, जो देश में डाले गए कुल वैध मतों का 1.06 प्रतिशत थे। देश में नोटा का प्रयोग करने में बिहार अग्रणी था। बिहार में 8 लाख 16 हजार 950 मतदाताओं ने नोटा में वोट दिया था। 2014 के लोकसभा के मुकाबले प्रदेश और देश में नोटा ने कम मत प्राप्त किए हैं, इससे स्पष्ट होता है कि मतदाता पसंद के उम्मीदवार को मत देना पसंद कर रहा है। वैसे वह कहीं भी मत दे पर अपने मत का उपयोग करना चाहिए। मतदान करना हमारा मौलिक अधिकार है। इंदौर में दो लाख से अधिक वोट मिल गए हैं। नोटा का सबसे अधिक वोट का रिकार्ड बिहार की गोपालगंज सीट का है। यहां पर नोटा को 51 हजार 660 वोट मिले थे। दूसरे क्रम पर पश्चिम चंपारण में 45,609 वोट नोटा को मिले थे।
जीत नहीं सकता नोटा
सवाल उठ रहा है कि क्या नोटा को सर्वाधिक वोट मिल सकने की स्थिति में विजेता कौन होगा? दूसरे, क्या नोटा को भी पूर्ण प्रत्याशी माना जाना चाहिए? तीसरे, अगर ‘राइट टू रिजेक्ट’ के तौर पर चुनाव में अगर नोटा की कोई वास्तविक अहमियत नहीं है तो ईवीएम में इसके प्रावधान का औचित्य क्या है?
एक सवाल ये भी है कि इंदौर के वोटरों ने बड़ी संख्या में नोटा का बटन दबाया तो क्या चुनाव में नोटा जीतेगा? वर्तमान नियमों के तहत यह संभव नहीं है, क्योंकि चुनाव आयोग का नियम कहता है कि अगर अपवाद स्वरूप किसी चुनाव में नोटा को सर्वाधिक वोट मिलते हैं तो चुनाव में प्राप्त वोटों की संख्या के हिसाब से नंबर दो पर रहा प्रत्याशी ही विजयी घोषित होगा। इसके अनुसार भाजपा के शंकर लालवानी ही दूसरी बार विजयी घोषित हो सकते हैं, बशर्तें वो सभी निर्दलीयों से ज्यादा वोट हासिल कर लें। हालांकि, यह जीत जश्न मनाने वाली नहीं होगी। कहने का आशय यही है कि नोटा सर्वाधिक वोट तो ले सकता है, लेकिन चुनाव नहीं जीत सकता।
नोटा ‘राइट टू रिजेक्ट’(नकारने के अधिकार) के तहत मतदाता के पास एक विकल्प है, जो किसी भी प्रत्याशी को वोट देना न चाहता हो, वो नोटा को वोट दे सकता है। लेकिन नोटा भौतिक प्रत्याशी नहीं है। चुनाव प्रत्याशी कोई हाड़ मांस का व्यक्ति ही हो सकता है। ऐसे में नोटा की मौजूदगी किसी को भी वोट न देने के अधिकार के तहत एक आभासी विकल्प के रूप में है।
लोकसभा चुनाव में नोटा में डाले गए मतों का विवरण
2019 - लोकसभा में सर्वाधिक नोटा का प्रयोग
2014 - लोकसभा में सर्वाधिक नोटा का प्रयोग
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आखिर इंदौर में नोटा को इतन वोट क्यों
बता दें कि इंदौर में कांग्रेस के प्रत्याशी अक्षय बम ने नामवापसी के दिन कांग्रेस के साथ दगा करते हुए भाजपा की सदस्यता ले ली थी। इसके बाद कांग्रेस ने किसी को भी समर्थन नहीं देते हुए कहा था कि जनता के पास नोटा विकल्प है। कांग्रेस ने नोटा दबाने के लिए एक तरह से अभियान भी चलाया था। वहीं अक्षय बम को भाजपा में लेने पर कुछ भाजपाई भी नाराज नजर आ रहे थे। इन सभी कारणों से इंदौर में नोटा को अब तक के सर्वाधिक मत मिलने का अनुमान लगाया जा रहा था। दोपहर 12 बजे तक ही नोटा को एक लाख वोट मिल चुके थे।
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नोटा है क्या
जब चुनाव मैदान में खड़े उम्मीदवार पसंद के नहीं हों तो आखिर किसे वोट दिया जाए। यह एक गंभीर प्रश्न रहता है मतदाता के सामने। मत देना एक मौलिक दायित्व है। मतदान प्रक्रिया पर सरकार एक बड़ी राशि व्यय करती है। कुछ देशो में मत न देने पर जुर्माने का प्रावधान है। अंग्रेजी के नोटा संक्षिप्त रूप का अर्थ ही है ‘नन ऑफ द अबोव’ यानी उपरोक्त में कोई भी नहीं। इसकी शुरुआत 1976 में अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य की सांता बारबरा काउंटी की म्यूनिसिपल इंफॉर्मेशन काउंसिल में लागू करने से हुई थी। बाद में भारत में पीयूसीएल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर यहां भी नोटा लागू करने की मांग की थी। हमारे देश में 2013 नोटा (उपरोक्त में से कोई नहीं) का प्रावधान लागू हुआ था। मत देना भी है, और उसे कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है तो वह यह विकल्प चुन सकता है। वोटिंग मशीन में नोटा का विकल्प का बटन जोड़ा गया। नोटा का विकल्प लागू करने वाला भारत विश्व का 14वां देश था। जबकि रूस ने 2006 में इस विकल्प को हटा दिया है। भारत में 2014 के लोकसभा चुनाव में नोटा के विकल्प की सुविधा मतदाताओं को चुनाव आयोग ने उपलब्ध कराई थी।
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प्रदेश में नोटा
मध्य प्रदेश में 2014 के चुनाव में 3 लाख 91 हजार 771 मत नोटा को प्राप्त हुए थे, जो राज्य में कुल वैध मतों का 0.81 प्रतिशत था, जबकि 2019 में 3 लाख 40 हजार 984 मत नोटा को मिले जो 0.66 प्रतिशत था। 2019 में प्रदेश में नोटा का सबसे कम उपयोग करने वाले संसदीय क्षेत्र मुरैना, सतना, रीवा, इंदौर और बालाघाट थे। इस तरह 2014 में नोटा का कम प्रयोग करने वाले क्षेत्र ग्वालियर, मुरैना, भोपाल, इंदौर और भिंड थे। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में मुरैना और इंदौर में नोटा का प्रयोग कम हुआ।
देश में नोटा
2019 के लोकसभा चुनाव में देश में नोटा को मतदाताओं ने 65 लाख 22 हजार 772 मत दिए थे, जो देश में डाले गए कुल वैध मतों का 1.06 प्रतिशत थे। देश में नोटा का प्रयोग करने में बिहार अग्रणी था। बिहार में 8 लाख 16 हजार 950 मतदाताओं ने नोटा में वोट दिया था। 2014 के लोकसभा के मुकाबले प्रदेश और देश में नोटा ने कम मत प्राप्त किए हैं, इससे स्पष्ट होता है कि मतदाता पसंद के उम्मीदवार को मत देना पसंद कर रहा है। वैसे वह कहीं भी मत दे पर अपने मत का उपयोग करना चाहिए। मतदान करना हमारा मौलिक अधिकार है। इंदौर में दो लाख से अधिक वोट मिल गए हैं। नोटा का सबसे अधिक वोट का रिकार्ड बिहार की गोपालगंज सीट का है। यहां पर नोटा को 51 हजार 660 वोट मिले थे। दूसरे क्रम पर पश्चिम चंपारण में 45,609 वोट नोटा को मिले थे।
जीत नहीं सकता नोटा
सवाल उठ रहा है कि क्या नोटा को सर्वाधिक वोट मिल सकने की स्थिति में विजेता कौन होगा? दूसरे, क्या नोटा को भी पूर्ण प्रत्याशी माना जाना चाहिए? तीसरे, अगर ‘राइट टू रिजेक्ट’ के तौर पर चुनाव में अगर नोटा की कोई वास्तविक अहमियत नहीं है तो ईवीएम में इसके प्रावधान का औचित्य क्या है?
एक सवाल ये भी है कि इंदौर के वोटरों ने बड़ी संख्या में नोटा का बटन दबाया तो क्या चुनाव में नोटा जीतेगा? वर्तमान नियमों के तहत यह संभव नहीं है, क्योंकि चुनाव आयोग का नियम कहता है कि अगर अपवाद स्वरूप किसी चुनाव में नोटा को सर्वाधिक वोट मिलते हैं तो चुनाव में प्राप्त वोटों की संख्या के हिसाब से नंबर दो पर रहा प्रत्याशी ही विजयी घोषित होगा। इसके अनुसार भाजपा के शंकर लालवानी ही दूसरी बार विजयी घोषित हो सकते हैं, बशर्तें वो सभी निर्दलीयों से ज्यादा वोट हासिल कर लें। हालांकि, यह जीत जश्न मनाने वाली नहीं होगी। कहने का आशय यही है कि नोटा सर्वाधिक वोट तो ले सकता है, लेकिन चुनाव नहीं जीत सकता।
नोटा ‘राइट टू रिजेक्ट’(नकारने के अधिकार) के तहत मतदाता के पास एक विकल्प है, जो किसी भी प्रत्याशी को वोट देना न चाहता हो, वो नोटा को वोट दे सकता है। लेकिन नोटा भौतिक प्रत्याशी नहीं है। चुनाव प्रत्याशी कोई हाड़ मांस का व्यक्ति ही हो सकता है। ऐसे में नोटा की मौजूदगी किसी को भी वोट न देने के अधिकार के तहत एक आभासी विकल्प के रूप में है।
लोकसभा चुनाव में नोटा में डाले गए मतों का विवरण
| क्रमांक | चुनाव वर्ष | सामान्य सीट- 19 | अजा ,सीट -4 | अजजा सीट -6 | योग | प्रदेश में प्रतिशत |
| 1 | 2014 | 209254 | 38167 | 144350 | 391771 | 0.81 |
| 2 | 2019 | 159687 | 34460 | 146837 | 340984 | 0.66 |
2019 - लोकसभा में सर्वाधिक नोटा का प्रयोग
| क्षेत्र | मत | वैध मत प्रतिशत |
| रतलाम | 35431 | 1.91 |
| मंडला | 32240 | 1.65 |
| छिंदवाड़ा | 20324 | 1.34 |
| बैतूल | 22787 | 1.31 |
| शहडोल | 20027 | 1.21 |
2014 - लोकसभा में सर्वाधिक नोटा का प्रयोग
| क्षेत्र | मत | वैध मत प्रतिशत |
| छिंदवाड़ा | 25499 | 1.82 |
| रतलाम | 30364 | 1.78 |
| बैतूल | 26726 | 1.66 |
| मंडला | 28306 | 1.55 |
| शहडोल | 21376 | 1.37 |
