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Indore News: जब छत्रियों के साये में ठहरी अहिल्या बाई, इंदौर की 27 दिन की कहानी
सार
देवी अहिल्या बाई होल्कर एक प्रसिद्ध रियासत की शासक थीं। उन्होंने महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया क्योंकि वे भगवान शिव की भक्त थीं और उन्हें नर्मदा नदी के किनारे का शांत इलाका बहुत पसंद था।
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अहिल्याबाई होल्कर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
देवी अहिल्या बाई होल्कर एक प्रसिद्ध रियासत की प्रमुख थीं। उन्होंने महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया था क्योंकि वे शिव की भक्त थीं और नर्मदा नदी के किनारे का इलाका उन्हें पसंद था। राजधानी बनने की वजह से महेश्वर का अपना एक खास महत्व था, लेकिन इंदौर भी बहुत जरूरी जगह थी। इंदौर में सेना से जुड़ी गतिविधियां होती थीं और राज्य के कई बड़े सरकारी काम भी यहीं से चलते थे।
चूंकि इंदौर सैन्य गतिविधियों का केंद्र था, इसलिए होल्कर सेना के सेनापति तुकोजीराव प्रथम भी यहीं रहते थे। एक बार किसी बात को लेकर तुकोजीराव प्रथम और अहिल्या बाई के बीच मतभेद हो गया। इंदौर की स्थिति और वहां के हालात को समझने के लिए देवी अहिल्या बाई ने इंदौर जाने का फैसला किया।
देवी अहिल्या बाई कब आईं इंदौर?
देवी अहिल्या बाई 26 मई 1784 को महेश्वर से इंदौर आई थीं और 21 जून 1784 तक यानी कुल 27 दिन तक इंदौर में रुकी थीं। उनके इस प्रवास के दौरान पेशवा वकील भीखाजी उनके साथ थे। भीखाजी रोज़ की घटनाओं की रिपोर्ट पुणे भेजते थे, जो आगे चलकर इतिहासकारों के लिए बहुत उपयोगी साबित हुई।
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अहिल्या बाई कहां ठहरी थीं?
जब देवी अहिल्या बाई 26 मई 1784 को इंदौर आईं, तब नगर के प्रमुख अधिकारी (कमाविसदार) खंडो बाबूराव ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया और ठहरने के लिए अच्छी व्यवस्था की थी। उस समय मई का महीना था और भीषण गर्मी पड़ रही थी। हालांकि भवन में ठहरने का इंतजाम था, फिर भी देवी अहिल्या बाई ने वहां न रुककर छत्रीबाग में टेंट में रुकने का निर्णय लिया। उनका तंबू स्वर्गीय गौतमा बाई (उनकी सास) और स्वर्गीय मालेराव (उनके पुत्र) की छतरियों के बीच लगाया गया था।
नगर में किनसे मिली थीं देवी अहिल्या बाई?
इंदौर में अपने प्रवास के दौरान देवी अहिल्या बाई छत्रीबाग में रुकी थीं, और यह स्थान उन्होंने खुद चुना था क्योंकि यहां उनके परिजनों की छतरियां थीं। इस जगह को देखकर वे भावुक हो गई थीं। उस दिन उन्होंने सिर्फ नगर के प्रमुख अधिकारी (कमाविसदार) से ही मुलाकात की।
यह भी पढ़ें: भाजयुमो नेता कपिल गोयल गिरफ्तार, 49 लाख की ठगी और फर्जी रजिस्ट्री का बड़ा खुलासा
अगले दिन, उन्होंने इंदौर के प्रमुख सेठ-साहूकारों से मुलाकात की। फिर 14 जून 1784 को वे जूनी इंदौर जाकर वहां के जमींदारों (मंडलोई) से मिलीं। इसी दौरान वे देवगुराड़िया स्थित प्रसिद्ध शिव मंदिर (जिसे गरुड़ तीर्थ भी कहते हैं) भी गईं थीं, जहाँ उन्होंने भगवान शिव की पूजा की और संध्या तक नगर लौट आई थीं।
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चूंकि इंदौर सैन्य गतिविधियों का केंद्र था, इसलिए होल्कर सेना के सेनापति तुकोजीराव प्रथम भी यहीं रहते थे। एक बार किसी बात को लेकर तुकोजीराव प्रथम और अहिल्या बाई के बीच मतभेद हो गया। इंदौर की स्थिति और वहां के हालात को समझने के लिए देवी अहिल्या बाई ने इंदौर जाने का फैसला किया।
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देवी अहिल्या बाई कब आईं इंदौर?
देवी अहिल्या बाई 26 मई 1784 को महेश्वर से इंदौर आई थीं और 21 जून 1784 तक यानी कुल 27 दिन तक इंदौर में रुकी थीं। उनके इस प्रवास के दौरान पेशवा वकील भीखाजी उनके साथ थे। भीखाजी रोज़ की घटनाओं की रिपोर्ट पुणे भेजते थे, जो आगे चलकर इतिहासकारों के लिए बहुत उपयोगी साबित हुई।
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अहिल्या बाई कहां ठहरी थीं?
जब देवी अहिल्या बाई 26 मई 1784 को इंदौर आईं, तब नगर के प्रमुख अधिकारी (कमाविसदार) खंडो बाबूराव ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया और ठहरने के लिए अच्छी व्यवस्था की थी। उस समय मई का महीना था और भीषण गर्मी पड़ रही थी। हालांकि भवन में ठहरने का इंतजाम था, फिर भी देवी अहिल्या बाई ने वहां न रुककर छत्रीबाग में टेंट में रुकने का निर्णय लिया। उनका तंबू स्वर्गीय गौतमा बाई (उनकी सास) और स्वर्गीय मालेराव (उनके पुत्र) की छतरियों के बीच लगाया गया था।
नगर में किनसे मिली थीं देवी अहिल्या बाई?
इंदौर में अपने प्रवास के दौरान देवी अहिल्या बाई छत्रीबाग में रुकी थीं, और यह स्थान उन्होंने खुद चुना था क्योंकि यहां उनके परिजनों की छतरियां थीं। इस जगह को देखकर वे भावुक हो गई थीं। उस दिन उन्होंने सिर्फ नगर के प्रमुख अधिकारी (कमाविसदार) से ही मुलाकात की।
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अगले दिन, उन्होंने इंदौर के प्रमुख सेठ-साहूकारों से मुलाकात की। फिर 14 जून 1784 को वे जूनी इंदौर जाकर वहां के जमींदारों (मंडलोई) से मिलीं। इसी दौरान वे देवगुराड़िया स्थित प्रसिद्ध शिव मंदिर (जिसे गरुड़ तीर्थ भी कहते हैं) भी गईं थीं, जहाँ उन्होंने भगवान शिव की पूजा की और संध्या तक नगर लौट आई थीं।
